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Last Updated:April 30, 2026, 19:48 IST

Kaladi Kashmir Mozzarella Cheese Recipe: जम्मू संभाग के पहाड़ों में गुज्जर-बकरवाल समुदायों द्वारा पीढ़ियों से तैयार की जा रही ‘कलाड़ी’ सिर्फ एक पकवान नहीं, बल्कि एक अहम सांस्कृतिक धरोहर है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में जम्मू-कश्मीर की पारंपरिक कलाड़ी को कश्मीर का मोजेरेला कहकर देश को एक नई पहचान से रूबरू कराया है. उधमपुर की इस जीआई टैग प्राप्त विरासत को अब राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशेष चर्चा मिल रही है. आइए जानते हैं कि पहाड़ों के शांत गांवों में पीढ़ियों के हुनर और मिट्टी के चूल्हे पर यह ‘देसी मोजेरेला’ आखिर कैसे तैयार होता है.

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अरुण कुमार/जम्मू: पहाड़ों के शांत गांवों से निकलकर अब देश के हर कोने में ‘कश्मीर के मोजेरेला’ की महक पहुंच रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा के बाद जम्मू-कश्मीर की ‘कलाड़ी’ रातों-रात राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गई है. उधमपुर की पहचान और जीआई टैग प्राप्त इस व्यंजन को गुज्जर-बकरवाल समुदाय पीढ़ियों से संजोए हुए हैं. मशीनी चमक-धमक से दूर, ठेठ पहाड़ी विधि से तैयार होने वाली यह कलाड़ी अपनी सांस्कृतिक मिठास और बेमिसाल स्वाद के लिए जानी जाती है. इसकी विशिष्टता के लिए जीआई (GI) टैग से भी नवाजा गया है.

लकड़ी की आंच और लोहे की कड़ाहीकलाड़ी बनाने की शुरुआत एक बेहद सादे लेकिन मेहनत भरे माहौल में होती है. रसोई में मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ियां जलाकर आंच का सही संतुलन बनाया जाता है. इस दहकते चूल्हे पर एक बड़ी लोहे की कड़ाही रखी जाती है. जिसमें गाय या भैंस का ताजा और शुद्ध दूध उबाला जाता है. दूध को लगातार चलाया जाता है ताकि वह कड़ाही की सतह पर चिपके नहीं और अच्छी तरह गर्म हो. जैसे ही दूध में उबाल आने लगता है और झाग बनने लगता है. उसमें प्राकृतिक खट्टा मिलाया जाता है. इसमें बची हुई छाछ या खट्टे दूध का इस्तेमाल होता है. जिसे स्थानीय भाषा में ‘मथ्थर’ कहते हैं. यह कोई रसायनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पूरी तरह से जैविक तरीका है. खट्टा डालते ही दूध फटने लगता है और इसका ठोस हिस्सा पानी से अलग हो जाता है.

हाथों से टिक्की का आकार और सुखाने की कलाजब ठोस हिस्सा अच्छी तरह इकट्ठा हो जाता है, तो असली कारीगरी शुरू होती है. गर्म कड़ाही से इस ठोस हिस्से को हाथों से निकालकर गूंथा जाता है. इसके बाद इसे दबाकर छोटी-छोटी और चपटी गोलियों या टिक्कियों का आकार दिया जाता है. इन तैयार टिक्कियों को एक लकड़ी की ट्रे पर सलीके से सजाया जाता है. आखिर में इन ताजी बनी कलाड़ियों से भरी ट्रे को रसोई या कमरे के ऊपरी हिस्से (शेल्फ) पर रख दिया जाता है. जहां ये हवा हल्की गर्माहट और धूप से धीरे-धीरे सूखती हैं. इसी प्राकृतिक प्रक्रिया से कलाड़ी बाहर से सख्त, जबकि अंदर से बिल्कुल ‘मोजेरेला चीज़’ जैसी नर्म और स्वादिष्ट बनती है. इसे कुलचे के साथ बड़े चाव के साथ खाया जाता है.

About the AuthorAmit ranjan

मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें

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Location :

Jammu and Kashmir

First Published :

April 30, 2026, 19:48 IST

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