40 हजार की सैलरी छोड़ी, अब सस्ती और शुद्ध थाली से मनोज जीत रहे लोगों का दिल…यहां जानिए इनकी सफलता की कहानी

अंबाला: सफलता हमेशा बड़ी कुर्सी या मोटी सैलरी से नहीं मापी जाती, बल्कि उस हौसले से तय होती है जो इंसान को अपने सपनों के पीछे चलने की ताकत देता है. दरअसल, अंबाला के हीरा नगर निवासी मनोज कुमार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. कभी माइक्रोसॉफ्ट, नोकिया और डैश मोबाइल जैसी बड़ी कंपनियों में नौकरी करने वाले मनोज आज अपनी बाइक पर बनी ‘चलती-फिरती रसोई’ के जरिए लोगों तक घर का शुद्ध और स्वादिष्ट खाना पहुंचा रहे हैं.
नौकरी छोड़ शुरू किया बिजनेस
बता दें कि करीब 40 हजार रुपये महीने की नौकरी छोड़कर अपना व्यवसाय शुरू करने का उनका फैसला आसान नहीं था, लेकिन आज उनकी मेहनत ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है.
वहीं इस बारे में लोकल 18 को ज्यादा जानकारी देते हुए मनोज बताते हैं कि उनका बचपन अभावों में बीता था, क्योंकि परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि हर जरूरत आसानी से पूरी हो सके. उनके पिता रिक्शा चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते थे और उसी मेहनत की कमाई से उन्होंने अपने बेटे को पढ़ाया.
माइक्रोसॉफ्ट कंपनी में भी किया काम
वहीं मनोज कुमार ने मास्टर डिग्री तक शिक्षा हासिल की और इसके बाद करीब 25 वर्षों तक अलग-अलग निजी कंपनियों में नौकरी की. खासतौर पर चंडीगढ़ स्थित माइक्रोसॉफ्ट कंपनी में उन्हें करीब 35 हजार रुपये वेतन मिलता था, जो इंसेंटिव मिलाकर लगभग 40 हजार रुपये तक पहुंच जाता था.
कैसे शुरू किया काम
इसके बावजूद उनके मन में हमेशा एक ही सपना था दूसरों के लिए नहीं, बल्कि खुद के लिए काम करना है ओर इस सपने को दिशा उनकी मुंहबोली बहन ने दी. उन्होंने मनोज को घर का बना शुद्ध खाना बेचने की सलाह दी, जिसमें शुरुआत में मनोज ने साइकिल पर खाना बेचने का विचार बनाया, लेकिन बाद में शाहाबाद के एक कारीगर से करीब 15 हजार रुपये खर्च कर उनकी बाइक को मॉडिफाई करवाया और उसे एक चलती-फिरती रसोई का रूप दे दिया.
सिर्फ 30 रुपए में करवाते भोजन
यही छोटी-सी शुरुआत आज उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई है. वहीं आज मनोज रोजाना अंबाला के अलग-अलग बाजारों, दफ्तरों और कॉलोनियों में पहुंचकर लोगों को घर जैसा ताजा भोजन उपलब्ध कराते हैं. उनके मेन्यू में शाही पनीर, कढ़ाई पनीर, कढ़ी-चावल, राजमा-चावल, दाल मखनी, छोले-चावल और रोटी-सब्जी जैसे व्यंजन शामिल हैं. 30 रुपये से शुरू होने वाला उनका भोजन आम आदमी की जेब के हिसाब से है, जबकि पनीर वाली स्पेशल थाली 90 रुपये में मिलती है.
शुरुआत में लोग उड़ाते थे मजाक
वहीं सबसे खास बात यह है कि इस पूरे सफर में उनकी पत्नी भी कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़ी हैं. दोनों रोज सुबह खाना तैयार करते हैं और शुरुआत में केवल 10 रोटियां बनती थीं, लेकिन आज रोजाना करीब 200 रोटियां तैयार होती हैं और लगभग 100 प्लेट भोजन बिकता है. इसके साथ ही मनोज कई कंपनियों में टिफिन सेवा भी उपलब्ध करा रहे हैं. वहीं मनोज कहते हैं कि मेहनत करने वाला इंसान किसी भी काम को छोटा नहीं समझता. शुरुआत में कुछ लोगों ने उनका मजाक उड़ाया और कई दोस्तों ने दूरी बना ली. लेकिन उन्होंने लोगों की बातों के बजाय अपने काम पर भरोसा किया.
मेहनत करने का जज्बा हो, तो कोई भी काम छोटा नहीं होता
आज वही मेहनत उन्हें सम्मान, पहचान और आत्मनिर्भरता दे रही है. उनका मानना है कि अगर इरादे मजबूत हों और मेहनत करने का जज्बा हो, तो कोई भी काम छोटा नहीं होता। आज उनकी ‘चलती-फिरती रसोई’ सिर्फ भोजन नहीं परोसती, बल्कि यह संदेश भी देती है कि सफलता पद या पैकेज से नहीं, बल्कि मेहनत, आत्मविश्वास और अपने सपनों पर भरोसा करने से मिलती है.



