Maternal Deaths Rajasthan | राजस्थान में प्रसूताओं की मौत का सच

Maternal Deaths Rajasthan: राजस्थान में पिछले कुछ महीनों के दौरान मातृ स्वास्थ्य ( Maternal Health) और चिकित्सा व्यवस्था को लेकर एक बेहद गंभीर और चिंताजनक स्थिति पैदा हो गई है. राज्य के विभिन्न जिलों में प्रसूताओं की मौत और सीजेरियन डिलीवरी (C-Section) के बाद महिलाओं की तबीयत बिगड़ने की लगातार घटनाओं ने राज्य की संपूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक निगरानी और चिकित्सा प्रोटोकॉल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. कोटा, बीकानेर, जोधपुर, भीलवाड़ा और बांसवाड़ा जैसे प्रमुख जिलों में सामने आए इन हृदयविदारक मामलों के बाद अब राज्य सरकार, केंद्र सरकार, विशेषज्ञ समितियां और ड्रग कंट्रोल विभाग अलग-अलग स्तर पर गहन जांच में जुटे हुए हैं.
इस पूरी पड़ताल के दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं. कहीं जान बचाने वाली जरूरी दवाओं की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठे, कहीं ऑपरेशन थिएटर (OT) के भीतर जानलेवा बैक्टीरियल संक्रमण मिला, तो कहीं इलाज और संक्रमण नियंत्रण (Infection Control) व्यवस्था में भारी प्रशासनिक और चिकित्सीय कमियां उजागर हुईं. हालांकि, वरिष्ठ चिकित्सा विशेषज्ञों और जांच समितियों का यह भी कहना है कि सभी मामलों का कारण एक जैसा नहीं है. हर मौत की मेडिकल एंगल से बारीकी से पड़ताल की गई है. ताकि भविष्य में किसी और प्रसूता की जान से खिलवाड़ न हो.
कोटा से शुरू हुआ पूरा विवाद और स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत मई 2026 में शिक्षा और चिकित्सा के प्रमुख केंद्र माने जाने वाले कोटा जिले से हुई. कोटा के प्रतिष्ठित न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में महज कुछ ही दिनों के भीतर पांच प्रसूताओं की दर्दनाक मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया. चिकित्सा रिकॉर्ड के अनुसार, इन सभी महिलाओं की सीजेरियन डिलीवरी हुई थी. ऑपरेशन के बाद वार्ड में शिफ्ट होने पर अचानक उनकी हालत बिगड़ती चली गई और उन्होंने दम तोड़ दिया. केवल मौतें ही नहीं, बल्कि इसी अस्पताल में कई अन्य प्रसूता महिलाओं में भी गंभीर संक्रमण और किडनी फेल होने (Renal Failure) जैसी जानलेवा जटिलताएं सामने आईं.
मामले की अत्यधिक गंभीरता और जन आक्रोश को देखते हुए चिकित्सा विभाग तुरंत हरकत में आया. आनन-फानन में AIIMS दिल्ली, SMS मेडिकल कॉलेज जयपुर और अन्य राष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञों की उच्च स्तरीय टीमों ने अस्पताल का सघन निरीक्षण किया. इन टीमों ने मरीजों के इलाज के तरीके, ऑपरेशन थिएटर की स्वच्छता, अस्पताल की समग्र संक्रमण नियंत्रण प्रणाली और उपयोग की गई दवाओं की गुणवत्ता की बारीकी से जांच शुरू की. शुरुआती दौर में अस्पताल प्रशासन ने इसे महज एक संयोग बताने की कोशिश की, लेकिन मौतों के पैटर्न ने यह स्पष्ट कर दिया कि व्यवस्था में कोई बहुत बड़ी खामी मौजूद है.
ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन पर उठे सवाल और जांच की बदलती दिशा
कोटा में हुई मौतों के बाद शुरुआती जांच में सबसे बड़ा संदेह ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) इंजेक्शन पर गया. मेडिकल विज्ञान में ऑक्सीटोसिन एक अत्यंत महत्वपूर्ण दवा है, जिसका उपयोग प्रसव के दौरान गर्भाशय के संकुचन को बढ़ाने और प्रसव के तुरंत बाद होने वाले भारी रक्तस्राव (Postpartum Hemorrhage या PPH) को रोकने के लिए किया जाता है. जब महिलाओं की मौत अत्यधिक रक्तस्राव के कारण होने लगी, तो शक सीधा इस इंजेक्शन की प्रभावशीलता (Effectiveness) पर गया.
ड्रग कंट्रोल विभाग ने तुरंत संज्ञान लेते हुए जांच के दौरान जैक्सन लैबोरेट्रीज़ (Jackson Laboratories) से जुड़े लाइसेंस को निलंबित कर दिया और पूरी सप्लाई चेन की सघन जांच शुरू कर दी. राज्य भर के अस्पतालों से इस दवा के सैंपल लिए गए. लेकिन, बाद में उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति ने पोस्टमॉर्टम और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट किया कि केवल ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन को मौतों का एकमात्र और प्रत्यक्ष कारण नहीं माना जा सकता. समिति की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, अधिकांश मामलों में पोस्ट पार्टम हेमरेज के साथ-साथ पल्मोनरी एम्बोलिज्म, अति-गंभीर संक्रमण (Sepsis), मल्टी ऑर्गन फेल्योर और मरीजों में पहले से मौजूद हाई-रिस्क मेडिकल स्थितियां (जैसे गंभीर एनीमिया या उच्च रक्तचाप) भी मौतों का प्रमुख कारण रहीं.
प्रसव में इस्तेमाल होने वाला Dinoprostone Gel भी जांच में फेल
कोटा मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, स्वास्थ्य विभाग के सामने एक और बड़ा और चिंताजनक खुलासा सामने आया. सामान्य और सुरक्षित प्रसव प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले डायनोप्रोस्टोन जेल (Dinoprostone Gel) के एक विशिष्ट बैच का नमूना राज्य स्तरीय गुणवत्ता परीक्षण (Quality Test) में पूरी तरह फेल पाया गया. इस जेल का उपयोग प्रसव पीड़ा को प्रेरित करने (Labor Induction) के लिए किया जाता है.
दवा के फेल होने की रिपोर्ट आते ही राज्य भर में हड़कंप मच गया. इसके बाद संबंधित बैच की बिक्री, वितरण और उपयोग पर तत्काल प्रभाव से सख्त रोक लगा दी गई. हालांकि, स्वास्थ्य विभाग के शीर्ष अधिकारियों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यह स्पष्ट किया कि केवल एक दवा के फेल होने से सीधे तौर पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कोटा या अन्य जिलों में हुई सभी मौतें उसी विशिष्ट जेल के कारण हुईं. इस दवा की मौतों में क्या भूमिका रही, इसकी एक अलग और स्वतंत्र क्लिनिकल जांच अभी भी की जा रही है, ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी तकनीकी चूक से बचा जा सके.
भीलवाड़ा में ऑपरेशन थिएटर के भीतर मिला जानलेवा बैक्टीरियल संक्रमण
कोटा का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि जुलाई महीने में भीलवाड़ा जिले के सबसे बड़े महात्मा गांधी अस्पताल में एक और त्रासदी सामने आ गई. यहां महज छह दिनों के भीतर पांच प्रसूताओं की मौत ने एक बार फिर पूरे राज्य की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर और तीखे सवाल खड़े कर दिए. इस बार समस्या दवा की नहीं, बल्कि अस्पताल की साफ-सफाई और स्टरलाइजेशन (Sterilization) प्रक्रिया की थी.
जब राज्य स्तरीय टीम ने जांच शुरू की, तो ऑपरेशन थिएटर की कल्चर रिपोर्ट में खतरनाक बैक्टीरियल संक्रमण (Bacterial Infection) मौजूद होने की वैज्ञानिक पुष्टि हुई. यह एक बहुत बड़ी लापरवाही थी, क्योंकि ऑपरेशन थिएटर को पूरी तरह से कीटाणुमुक्त होना चाहिए. इस रिपोर्ट के आते ही चिकित्सा जगत में भूचाल आ गया. प्रमुख शासन सचिव ने तुरंत एक विशेष विशेषज्ञ टीम को मौके पर भेजा. संबंधित ऑपरेशन थिएटर को तुरंत प्रभाव से बंद कर दिया गया और उसे पूरी तरह से सैनिटाइज (Fumigation and Sanitization) कराया गया. साथ ही पूरे अस्पताल की संक्रमण नियंत्रण प्रक्रिया की कड़ी समीक्षा की गई.
हालांकि, किसी भी तरह की पैनिक स्थिति से बचने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल हवा या सतह पर बैक्टीरिया मिलने से मौतों का शत-प्रतिशत कारण तय नहीं हो जाता. मौत के सटीक कारणों का पता लगाने के लिए पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, माइक्रोबायोलॉजी रिपोर्ट और विस्तृत मेडिकल ऑडिट का इंतजार किया जा रहा है, जिसके बाद ही अंतिम और आधिकारिक निष्कर्ष निकाला जाएगा.
बीकानेर और जोधपुर में भी सामने आईं अत्यधिक गंभीर जटिलताएं
यह स्वास्थ्य संकट केवल कोटा और भीलवाड़ा तक सीमित नहीं रहा. पश्चिमी राजस्थान के प्रमुख मेडिकल हब बीकानेर और जोधपुर से भी ऐसी ही डराने वाली खबरें सामने आईं. बीकानेर के PBM अस्पताल में दो प्रसूताओं की दुखद मौत और कई अन्य महिलाओं की तबीयत अचानक बिगड़ने के बाद प्रशासन ने वहां भी उच्च स्तरीय जांच शुरू कर दी.
इसी तरह, जोधपुर के पावटा जिला अस्पताल में सीजेरियन डिलीवरी के बाद आठ महिलाओं की हालत एक साथ बिगड़ गई. स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि इनमें से दो प्रसूताओं को तुरंत आईसीयू (ICU) में भर्ती करना पड़ा, जहां उन्हें जीवन रक्षक प्रणालियों पर रखा गया. इन सभी मामलों में राज्य सरकार ने ऑपरेशन थिएटर की स्थिति, सर्जिकल उपकरणों के स्टरलाइजेशन, अस्पताल के संक्रमण नियंत्रण प्रोटोकॉल और पोस्ट ऑपरेटिव मॉनिटरिंग (ऑपरेशन के बाद की देखभाल) की सघन जांच के आदेश दिए. इन घटनाओं के बाद, घबराई हुई राज्य सरकार ने सभी मेडिकल कॉलेजों, जिला अस्पतालों और संबद्ध स्वास्थ्य केंद्रों में संक्रमण नियंत्रण नियमों और मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP) का सख्ती से और बिना किसी चूक के पालन करने के लिखित निर्देश जारी किए.
कोटा से सबक लिया होता, तो भीलवाड़ा और बीकानेर में नहीं उजड़ते परिवार
भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में लगातार पांच प्रसूताओं की मौत के बाद जब हालात बेकाबू हुए, तो आनन-फानन में एक जांच टीम को मौके पर भेजा गया. जांच में अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर (OT) के भीतर संक्रमण मिलने की आशंका ने पूरे स्वास्थ्य महकमे की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं. सबसे बड़ा और चुभने वाला सवाल यह है कि आखिर महकमा पहले से क्यों नहीं जागा? दरअसल, इससे पहले जब कोटा में सीजेरियन डिलीवरी के बाद महिलाओं की मौतें हुई थीं, तब जांच के लिए बनी उच्च स्तरीय कमेटी ने भी ‘ओटी इंफेक्शन’ (OT Infection) को मौतों की एक बड़ी वजह बताया था. लेकिन विडंबना देखिए कि उस वक्त विभाग द्वारा कोई कठोर कदम नहीं उठाए गए.
अगर स्वास्थ्य विभाग ने कोटा की मौतों से ही सबक ले लिया होता और उसी वक्त लापरवाह लोगों पर सख्त कार्रवाई की होती, तो शायद हालात इतने नहीं बिगड़ते. अगर समय रहते प्रदेश भर के अस्पतालों के ऑपरेशन थिएटर्स को संक्रमण मुक्त कर दिया गया होता, तो आज कोटा के बाद बीकानेर और भीलवाड़ा में सीजेरियन डिलीवरी कराने वाली इन बेगुनाह महिलाओं की इस तरह जान नहीं जाती और कई नवजात बच्चे अपनी माँ के साये से महरूम होने से बच जाते.
आखिर किन मेडिकल और प्रशासनिक कारणों से हो रही हैं प्रसूताओं की मौत?
अब तक हुई विभिन्न स्तरीय जांचों, मेडिकल ऑडिट और विशेषज्ञ कमेटियों की रिपोर्ट में कोई एक अकेला या समान कारण सामने नहीं आया है. विशेषज्ञों के अनुसार, अलग-अलग अस्पतालों और अलग-अलग मामलों में इन मौतों के पीछे मुख्य रूप से ये बड़ी वजहें सामने आई हैं.
डिलीवरी के बाद अत्यधिक रक्तस्राव (Postpartum Hemorrhage – PPH): यह सीजेरियन और सामान्य डिलीवरी दोनों में मौत का एक बहुत बड़ा कारण है. गर्भाशय के ठीक से संकुचित न होने पर महिला के शरीर से भारी मात्रा में खून बह जाता है.
सेप्सिस यानी गंभीर संक्रमण (Sepsis): ऑपरेशन के दौरान गंदे उपकरणों, दूषित वातावरण या अनहाइजीनिक वार्ड के कारण शरीर में फैलने वाला यह संक्रमण खून में जहर घोल देता है, जिससे मरीज की मौत हो जाती है.
पल्मोनरी एम्बोलिज्म (Pulmonary Embolism): डिलीवरी के बाद खून का थक्का (Blood Clot) बनकर फेफड़ों की नसों में फंस जाना, जिससे अचानक सांस रुक जाती है और मरीज की मौत हो सकती है.
मल्टी ऑर्गन फेल्योर (Multi-Organ Failure): गंभीर संक्रमण या अत्यधिक खून बहने के कारण जब शरीर के प्रमुख अंग (जैसे किडनी, लिवर, दिल) एक साथ काम करना बंद कर देते हैं.
गंभीर एनीमिया (Severe Anemia): राजस्थान में महिलाओं में खून की कमी एक आम लेकिन खतरनाक समस्या है. एनीमिया से पीड़ित महिला अगर प्रसव के दौरान थोड़ा भी खून खोती है, तो उसकी जान पर बन आती है.
हाई ब्लड प्रेशर और प्री-एक्लेम्पसिया (Pre-eclampsia): गर्भावस्था के दौरान अनियंत्रित उच्च रक्तचाप जो प्रसव के समय दौरे या ब्रेन हैमरेज का कारण बन सकता है.
हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की अनदेखी: ऐसी महिलाएं जिन्हें पहले से कोई गंभीर बीमारी हो, उनकी सही समय पर पहचान कर उन्हें विशेष निगरानी में न रखना.
ऑपरेशन के बाद निगरानी में भारी कमी (Lack of Post-Operative Monitoring): डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ द्वारा सीजेरियन के बाद मरीज के वाइटल्स (BP, पल्स, यूरिन आउटपुट) की नियमित जांच न करना.
संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था में खामियां: अस्पतालों में साफ-सफाई का अभाव और वार्डों में मरीजों के बीच उचित दूरी न होना.
दवाओं की गुणवत्ता पर संदेह: जीवन रक्षक दवाओं का अपने मानक पर खरा न उतरना.
मेडिकल विशेषज्ञों का स्पष्ट रूप से कहना है कि किसी भी सीजेरियन डिलीवरी के बाद शुरुआती 24 से 48 घंटे सबसे महत्वपूर्ण और नाजुक होते हैं. इस दौरान अगर मरीज में संक्रमण, रक्तस्राव या किसी अन्य छिपी हुई जटिलता की समय रहते पहचान नहीं हो पाती है, तो उसकी स्थिति बहुत तेजी से बिगड़ सकती है और उसे बचाना लगभग असंभव हो जाता है.
केंद्र तक पहुंचा मामला, राज्य में बदली दवा जांच प्रणाली
राजस्थान में लगातार सामने आ रहे इन दुर्भाग्यपूर्ण मामलों ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है. मातृ मृत्यु दर (MMR) को कम करने के राष्ट्रीय लक्ष्यों को देखते हुए, केंद्र सरकार ने भी स्थिति की गंभीरता को समझा और राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्रालय से विस्तृत तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी. इस भारी दबाव के बीच, राजस्थान की राज्य सरकार ने डैमेज कंट्रोल करते हुए दवाओं की खरीद (Procurement) और उनकी गुणवत्ता जांच (Quality Assurance) की पूरी प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से बदल दिया है. अब राज्य में दवाओं के लिए एक नया ‘तीन-स्तरीय ड्रग टेस्टिंग सिस्टम’ (Three-Tier Drug Testing System) लागू करने का ऐतिहासिक फैसला किया गया है.
इसके तहत अस्पताल में पहुंचने से पहले दवा को तीन अलग-अलग कड़े लैब परीक्षणों से गुजरना होगा. राजस्थान के विभिन्न जिलों में प्रसूताओं की मौत के इन सिलसिलेवार मामलों ने एक बात शीशे की तरह साफ कर दी है कि यह समस्या केवल किसी एक खराब दवा, एक लापरवाह अस्पताल या किसी एक डॉक्टर की गलती तक सीमित नहीं है. यह राज्य की पूरी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की एक बड़ी विफलता की ओर इशारा करता है. इन घटनाओं की जांच में दवाओं की घटिया गुणवत्ता, अस्पतालों की जर्जर संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था, पोस्ट ऑपरेटिव केयर में स्वास्थ्य कर्मियों की लापरवाही, मेडिकल प्रोटोकॉल की अनदेखी और हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की उचित समय पर पहचान न हो पाने जैसे कई गंभीर और प्रणालीगत पहलुओं पर सवाल उठे हैं. हालांकि, मौतों के सटीक कारणों को बताने वाली अंतिम मेडिकल ऑडिट और फोरेंसिक जांच रिपोर्टों का इंतजार अभी भी किया जा रहा है.



