माउंट आबू शेरगांव ट्रेकिंग और इतिहास

Last Updated:April 25, 2026, 08:12 IST
Shergaon Mount Abu: माउंट आबू का शेरगांव एक ऐसा अनछुआ डेस्टिनेशन है जहाँ मोबाइल नेटवर्क और बिजली जैसी आधुनिक सुविधाएँ नहीं हैं. गुरुशिखर से 12 किमी की कठिन पैदल ट्रेकिंग के बाद यहाँ पहुँचा जा सकता है. यह गांव महाराणा प्रताप के अज्ञातवास का गवाह रहा है, जहाँ उनके द्वारा स्थापित प्राचीन शिवलिंग आज भी पूजनीय है. करीब 250 की आबादी वाला यह गांव कच्चे मकानों और सादगीपूर्ण जीवन के लिए जाना जाता है. एडवेंचर के शौकीन यहाँ ट्रेकिंग और कैंपिंग के लिए आते हैं. डिजिटल दुनिया से पूरी तरह कटकर सुकून बिताने के लिए यह राजस्थान की सबसे बेहतरीन जगह है.
राजस्थान के इकलौते हिल स्टेशन माउंट आबू में गुरुशिखर के समीप स्थित उतरज और शेरगांव अपनी अनूठी जीवनशैली और प्राकृतिक शांति के लिए जाने जाते हैं. समुद्र तल से करीब 4000 फीट की ऊंचाई पर बसे इन गांवों तक पहुंचने के लिए आज भी कोई पक्की सड़क नहीं है, जिसके कारण पर्यटकों और स्थानीय लोगों को ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी पगडंडियों से होकर कई किलोमीटर का पैदल सफर तय करना पड़ता है. आधुनिकता की चकाचौंध से दूर इन गांवों में मोबाइल नेटवर्क का न होना ही यहाँ की सबसे बड़ी खासियत बन गया है, जो शहर के शोर-शराबे और डिजिटल दुनिया से ब्रेक लेने वाले सुकून के चाहने वालों को अपनी ओर आकर्षित करता है. प्रकृति की गोद में बसे ये गांव आज भी अपनी पुरानी परंपराओं और शांत वातावरण को संजोए हुए हैं, जहाँ पहुंचकर लोग एक अलग ही दुनिया का अनुभव करते हैं.
माउंट आबू के ट्रैवल गाइड चिंटू यादव के अनुसार, उतरज और शेरगांव अपनी दुर्गम भौगोलिक स्थिति के कारण अब विलेज टूरिज्म के प्रमुख केंद्र के रूप में उभर रहे हैं. पहाड़ों के बीच बसे इन गांवों का रहन-सहन आज भी बेहद पारंपरिक है, जहाँ मुख्य रूप से कच्चे मकान देखने को मिलते हैं जो आधुनिक शहरी बनावट से बिल्कुल अलग हैं. इन शांत और एकांत गांवों तक पहुँचने के लिए पर्यटकों को सबसे पहले माउंट आबू शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर स्थित राजस्थान की सबसे ऊँची चोटी गुरुशिखर तक आना होता है, जिसके बाद दुर्गम रास्तों और पहाड़ियों के बीच से आगे का सफर शुरू होता है. अपनी इसी सादगी और प्राकृतिक बनावट की वजह से ये दोनों गांव उन लोगों की पहली पसंद बन रहे हैं जो ग्रामीण संस्कृति को करीब से महसूस करना चाहते हैं.
गुरुशिखर से करीब 4 किलोमीटर का कठिन पहाड़ी सफर पैदल पगडंडी के जरिए तय करने के बाद उतरज गांव पहुंच सकते हैं, जहाँ भगवान शिव और विष्णु को समर्पित केदारनाथ और बद्रीनाथ के दो प्रमुख मंदिर स्थित हैं. हालांकि इस दुर्गम ऊंचाई पर बसे गांव तक बिजली की सुविधा पहुंच चुकी है, लेकिन असली रोमांच इसके आगे शुरू होता है. उतरज से आगे लगभग 8 किलोमीटर की और अधिक चुनौतीपूर्ण पैदल यात्रा करने के बाद शेरगांव पहुंचा जा सकता है, जो पूरी तरह से बाहरी दुनिया और आधुनिक सुख-सुविधाओं से कटा हुआ है. इन गांवों की यात्रा उन साहसी पर्यटकों के लिए एक अनोखा अनुभव है, जो प्रकृति के बीच रहकर अपनी शारीरिक क्षमताओं को परखना और आत्मिक शांति प्राप्त करना चाहते हैं.
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माउंट आबू के पहाड़ों में बनी इन पगडंडियों पर रास्ता भटकने का खतरा हमेशा बना रहता है. इसलिए सुरक्षा के लिहाज से किसी प्रशिक्षित गाइड या स्थानीय व्यक्ति को साथ लेकर ही यहाँ आना चाहिए. शेरगांव की आबादी मात्र 250 लोगों के आसपास है, जहाँ पर्यटकों के लिए रात्रि विश्राम की बुनियादी सुविधा मिल जाती है. हालांकि, इस दुर्गम इलाके में संसाधनों की कमी को देखते हुए अपने साथ भोजन लेकर चलना सबसे सही रहता है. प्रकृति की गोद में बसा यह गांव उन लोगों के लिए बेहतरीन है जो डिजिटल दुनिया से दूर रहकर शांति तलाश रहे हैं.
शेरगांव में धार्मिक आस्था के प्रमुख केंद्र के रूप में ईशान भेरू मंदिर, भेरुगुफा और एक अत्यंत प्राचीन शिव मंदिर स्थित हैं. ऐतिहासिक दृष्टि से इस स्थान का विशेष महत्व है, क्योंकि लोक मान्यताओं के अनुसार हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय इसी दुर्गम क्षेत्र में बिताया था. अपनी इसी प्रवास अवधि के दौरान उन्होंने यहाँ एक शिवलिंग की स्थापना कर नियमित पूजा-अर्चना की थी. महाराणा प्रताप द्वारा स्थापित वह शिवलिंग आज भी यहाँ सुरक्षित है और स्थानीय लोगों के साथ-साथ यहाँ पहुँचने वाले श्रद्धालुओं द्वारा पूरी श्रद्धा के साथ पूजा जाता है.
शेरगांव में स्थानीय निवासी आज भी पारंपरिक कच्चे मकानों में रहते हैं, जो इस पहाड़ी इलाके की सादगी को दर्शाता है. यहाँ मोबाइल नेटवर्क की सुविधा पूरी तरह अनुपलब्ध है, जिसके कारण ग्रामीणों को फोन का उपयोग करने या बाहरी दुनिया से संपर्क करने के लिए मीलों पैदल चलकर गुरुशिखर तक आना पड़ता है. नेटवर्क और शहरी शोर से पूरी तरह कटे होने की वजह से ही यह स्थान ट्रेकिंग और कैंपिंग के शौकीनों के लिए स्वर्ग के समान है. देश के कोने-कोने से साहसी पर्यटक यहाँ केवल सुकून के पल बिताने और प्रकृति के बीच खुद को तरोताजा करने के लिए आते हैं.
शेरगांव की यात्रा के लिए सबसे उपयुक्त समय सर्दियों और मानसून का मौसम माना जाता है. इस दौरान यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य अपने चरम पर होता है और पैदल सफर भी सुखद रहता है. इसके विपरीत, गर्मियों के मौसम में यहाँ पानी की भारी कमी हो जाती है और कड़ाके की धूप में लंबी चढ़ाई करने से डिहाइड्रेशन का खतरा काफी बढ़ जाता है. चूंकि यहाँ का पूरा रास्ता ऊबड़-खाबड़ और दुर्गम चढ़ाई वाला है, इसलिए जिन लोगों को चलने-फिरने या ट्रैकिंग में किसी भी प्रकार की शारीरिक समस्या है, उन्हें इस गांव की यात्रा करने से बचना चाहिए. यहाँ की चढ़ाई केवल शारीरिक रूप से फिट और साहसी पर्यटकों के लिए ही उचित रहती है.
First Published :
April 25, 2026, 08:10 IST



