Nagaur News: परिवार से मिली रुकावट तो मीरा ने लिखी तुलसीदास को चिट्ठी, जवाब ने बदल दी भक्ति की राह

Last Updated:August 21, 2026, 11:22 IST
मीराबाई और गोस्वामी तुलसीदास से जुड़ा एक रोचक प्रसंग भक्ति आंदोलन के इतिहास में खास महत्व रखता है. कहा जाता है कि पारिवारिक विरोध के बीच मीराबाई ने तुलसीदास को पत्र लिखकर मार्गदर्शन मांगा था. इसके जवाब में तुलसीदास ने हरि-भक्ति को सर्वोपरि बताते हुए संदेश भेजा. इस पत्राचार और उससे जुड़े पद का उल्लेख महात्मा बेनी माधव दास के ‘मूल गोसाईं चरित’ में मिलता है.
नागौर. भक्ति आंदोलन के इतिहास में मीराबाई और गोस्वामी तुलसीदास का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है. एक ओर तुलसीदास ने रामचरितमानस जैसी रचना के जरिए भगवान राम की भक्ति को जन-जन तक पहुंचाया, वहीं मीराबाई ने अपने पदों और भजनों में श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम, विरह और समर्पण को आवाज दी. दोनों की भक्ति अलग आराध्यों से जुड़ी थी, लेकिन उनके जीवन से जुड़ा एक प्रसंग भक्ति की राह में आने वाली सामाजिक और पारिवारिक बाधाओं को लेकर बेहद रोचक माना जाता है.
कहा जाता है कि जब मीराबाई को अपने परिवार की ओर से भक्ति के मार्ग में विरोध और बाधाओं का सामना करना पड़ा, तब उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास को पत्र लिखकर मार्गदर्शन मांगा. मीराबाई तुलसीदास से दीक्षा लेना चाहती थी. इस प्रसंग का उल्लेख महात्मा बेनी माधव दास द्वारा रचित मूल गोसाई चरित में मिलता है. इसके अनुसार मेवाड़ से सुखपाल नामक एक ब्राह्मण मीरा का पत्र लेकर तुलसीदास के पास पहुंचे थे.
तुलसीदास ने मीरा को जवाब भेजा
पत्र पढ़ने के बाद तुलसीदास ने मीरा को जवाब भेजा. कहा जाता है कि उन्होंने गीत और काव्य के माध्यम से ऐसा संदेश दिया, जिसमें हरि-भक्ति को सबसे ऊपर रखने की बात कही गई थी. इसी प्रसंग से जुड़ा पद राग सोरठ में बताया जाता है. इसका भाव था कि जो संबंध भगवान की भक्ति में सहायक हो, वही वास्तव में हितकारी है. यदि कोई व्यक्ति कितना भी अपना और प्रिय क्यों न हो, लेकिन वह प्रभु की भक्ति में बाधा बने तो उससे दूरी बनाना उचित है.
तुलसीदास ने पद में कई उदाहरण दिए
तुलसीदास ने अपने संदेश में प्रह्लाद, विभीषण, भरत, राजा बलि और गोपियों जैसे भक्तों के उदाहरणों का भाव भी सामने रखा. इन उदाहरणों के जरिए समझाया गया कि सच्ची भक्ति के सामने सांसारिक मोह और रिश्तों का बंधन छोटा पड़ जाता है. उनके अनुसार वही संगति सबसे श्रेष्ठ है, जिससे भगवान के चरणों में प्रेम बढ़े और मन भक्ति के रास्ते पर मजबूत हो.
सुखपाल नामक व्यक्ति मीरा बाई की पत्रिका लेकर आए
मूल गोसाईं चरित में इस घटना को दोहों के रूप में दर्ज किया गया है इसमें लिखा है कि मेवाड़ से सुखपाल नामक विप्र मीरा बाई की पत्रिका लेकर आए. इसके बाद तुलसीदास ने पत्र पढ़कर उत्तर लिखा और हरि का भजन करने का संदेश देकर उसे वापस भेज दिया. महात्मा बेनी माधव दास द्वारा रचित मूल गोसाईं चरित में तुलसीदास से जुड़े प्रसंगों का वर्णन मिलता है. इसी में मीराबाई और तुलसीदास के पत्राचार का उल्लेख है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह ग्रंथ संवत् 1620 यानी 1563 ईस्वी के आसपास रचा गया था. मीरा के पत्र के जवाब में तुलसीदास द्वारा विनय पत्रिका का यह पद लिखे जाने का उल्लेख इसी प्रसंग में मिलता है.
About the AuthorMonali Paul
नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
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Nagaur,Rajasthan
First Published :
August 21, 2026, 11:22 IST



