Rajasthan

उदयपुर में कागज के खिलौनों की वर्कशॉप

Last Updated:April 18, 2026, 12:51 IST

Manish Kumar Paper Toy Artist Udaipur: उदयपुर में दिल्ली के मनीष कुमार बच्चों को मोबाइल की लत से बचाने के लिए कागज के खिलौने बनाने की अनूठी कला सिखा रहे हैं. मनीष अब तक 3000 से अधिक प्रकार के कागज के खिलौने विकसित कर चुके हैं, जिन्हें बनाने के दौरान बच्चे खेल-खेल में विज्ञान और गणित के कठिन सिद्धांतों को आसानी से समझ लेते हैं. उदयपुर के 10 से 12 स्कूलों में ‘कश्ती फाउंडेशन’ के सहयोग से आयोजित वर्कशॉप्स में बच्चों ने भारी उत्साह दिखाया है. मनीष का उद्देश्य बच्चों के मानसिक विकास को गति देना और उनकी रचनात्मकता को डिजिटल दुनिया से बाहर निकालकर वास्तविक दुनिया से जोड़ना है. दादाजी से सीखी यह पारंपरिक कला आज के आधुनिक दौर में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और लर्निंग स्किल्स को बेहतर बनाने का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरी है.

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उदयपुर. आज के डिजिटल युग में जहाँ बचपन मोबाइल स्क्रीन, वीडियो गेम्स और सोशल मीडिया के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है, वहीं राजस्थान के उदयपुर में पारंपरिक कला की एक सुखद वापसी देखने को मिल रही है. दिल्ली के निवासी मनीष कुमार बच्चों को गैजेट्स की लत से बाहर निकालने और उनकी खोई हुई रचनात्मकता को वापस लाने के लिए ‘पेपर टॉयज’ यानी कागज के खिलौनों का सहारा ले रहे हैं. मनीष का मानना है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम के कारण बच्चों के सोचने-समझने और कुछ नया बनाने की क्षमता प्रभावित हो रही है. ऐसे में वे कागज के साधारण टुकड़ों से जादुई दुनिया रचकर न केवल बच्चों का मनोरंजन कर रहे हैं, बल्कि उनके मानसिक और बौद्धिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.

मनीष कुमार ने कागज से खिलौने बनाने की यह दुर्लभ कला अपने दादाजी से सीखी थी. बचपन में जो शौक केवल खेल-खेल में शुरू हुआ था, उसे अब उन्होंने एक मिशन बना लिया है. उनके द्वारा बनाए गए खिलौने केवल साधारण जहाज या नाव तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे इतने आकर्षक और तकनीकी रूप से उन्नत होते हैं कि बच्चे उन्हें देखते ही मंत्रमुग्ध हो जाते हैं. मनीष अब तक 3000 से भी अधिक प्रकार के कागज के खिलौने तैयार कर चुके हैं और निरंतर नए डिजाइनों पर शोध कर रहे हैं. उदयपुर में ‘कश्ती फाउंडेशन’ के सहयोग से वे अब तक 10 से 12 प्रमुख स्कूलों में कार्यशालाएं आयोजित कर चुके हैं, जहाँ बच्चों की भागीदारी और उत्साह देखते ही बनता है.

खेल-खेल में विज्ञान और गणित की शिक्षामनीष के इन खिलौनों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें विज्ञान (Science) और गणित (Maths) के कई जटिल सिद्धांत छिपे होते हैं. जब बच्चे अपने हाथों से कागज को मोड़कर एक गतिशील खिलौना बनाते हैं, तो वे अनजाने में ही संतुलन, घर्षण और ज्यामिति जैसे कॉन्सेप्ट्स को व्यवहारिक रूप से सीख लेते हैं. मनीष का कहना है कि यह ‘लर्निंग बाय डूइंग’ का सबसे बेहतरीन उदाहरण है. मोबाइल गेमिंग जहाँ बच्चों को केवल एक दर्शक तक सीमित रखती है, वहीं कागज के खिलौने उन्हें एक ‘क्रिएटर’ या निर्माता बनने का अनुभव प्रदान करते हैं. इससे बच्चों की एकाग्रता बढ़ती है और उनके भीतर आत्मविश्वास का संचार होता है.

स्क्रीन टाइम से दूरी और भविष्य की राहमनीष कुमार की यह पहल स्कूलों और अभिभावकों के बीच भी काफी लोकप्रिय हो रही है. उनका सुझाव है कि यदि ऐसी पारंपरिक और रचनात्मक कलाओं को विद्यालयी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए, तो बच्चों के स्क्रीन टाइम को काफी हद तक कम किया जा सकता है. वे मानते हैं कि असली रचनात्मकता हाथ से काम करने और भौतिक वस्तुओं के निर्माण में है. मनीष कुमार अब देशभर के अलग-अलग शहरों के स्कूलों में जाकर बच्चों को इस कला से जोड़ रहे हैं. उनका उद्देश्य केवल कला को जिंदा रखना नहीं है, बल्कि बच्चों को एक ऐसा स्वस्थ मानसिक वातावरण देना है जहाँ वे अपनी उंगलियों के जादू से कागज के टुकड़ों में जान फूंक सकें और तकनीक के बोझ से मुक्त होकर अपना बचपन जी सकें.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content…और पढ़ें

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Location :

Udaipur,Udaipur,Rajasthan

First Published :

April 18, 2026, 12:51 IST

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