Punjab Election Analysis: पंजाब कांग्रेस में मचा घमासान, बीजेपी के लिए कितना फायदेमंद?

Punjab Election Analysis: पंजाब में विधानसभा चुनाव अभी कुछ महीने दूर है, लेकिन सियासी हलचल तेज हो चुकी है. एक तरफ आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार बचाने की चुनौती से जूझ रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस अंदरूनी कलह से परेशान दिखाई दे रही है. इसी बीच बीजेपी ने राज्य में राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए लंबी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है. पिछले कुछ महीनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के लगातार पंजाब दौरे इस बात का संकेत देते हैं कि बीजेपी अब पंजाब को अगले बड़े राजनीतिक मिशन के रूप में देख रही है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या कांग्रेस के भीतर मचा घमासान बीजेपी के लिए सबसे बड़ा मौका बन सकता है?
पंजाब अब बीजेपी के लिए अगला लक्ष्य
2014 के बाद बीजेपी ने देश के कई राज्यों में अपना विस्तार किया. पूर्वोत्तर, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों में पार्टी ने अपनी मौजूदगी मजबूत की. लेकिन पंजाब अब भी उन चुनिंदा राज्यों में शामिल है, जहां बीजेपी अभी तक बड़ी चुनावी सफलता हासिल नहीं कर सकी है. 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को सिर्फ तीन सीटें मिली थीं, जबकि 2022 में उसका आंकड़ा घटकर दो सीटों पर पहुंच गया. लंबे समय तक शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने की वजह से पार्टी का संगठन पूरे पंजाब में मजबूत नहीं हो पाया.
किसान आंदोलन ने बढ़ाई मुश्किलें
2020-21 के किसान आंदोलन ने बीजेपी की राह और कठिन बना दी. आंदोलन में पंजाब के किसानों की बड़ी भूमिका रही. इसके बाद राज्य में यह धारणा मजबूत हुई कि केंद्र सरकार किसानों के प्रति संवेदनशील नहीं है. इसी वजह से बीजेपी को अपनी पुरानी चुनावी रणनीति बदलनी पड़ी. अब पार्टी केवल राष्ट्रवाद या 1984 के दंगों जैसे मुद्दों पर निर्भर रहने के बजाय सामाजिक और स्थानीय समीकरणों पर काम कर रही है.
कांग्रेस की अंदरूनी कलह बीजेपी के लिए मौका
पंजाब कांग्रेस इस समय पूरी तरह एकजुट नजर नहीं आती. प्रदेश नेतृत्व को लेकर खींचतान, वरिष्ठ नेताओं के अलग-अलग बयान और संगठनात्मक असहमति लगातार सामने आती रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस अपनी अंदरूनी कलह को जल्द नहीं सुलझा पाती, तो उसका सीधा फायदा बीजेपी को मिल सकता है. क्योंकि विपक्षी वोटों का बिखराव हमेशा तीसरे दल के लिए अवसर पैदा करता है.
बीजेपी की रणनीति भी इसी संभावना को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है. पार्टी चाहती है कि कांग्रेस और आप दोनों कमजोर हों, ताकि वह खुद को तीसरे विकल्प से सीधे मुख्य विकल्प के रूप में स्थापित कर सके.
बीजेपी का 2D फॉर्मूला क्या है?
बीजेपी ने पंजाब में सामाजिक और धार्मिक प्रभाव वाले डेरों पर विशेष फोकस किया है. इसे राजनीतिक हलकों में ‘2D’ रणनीति कहा जा रहा है.
पहला D है डेरा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु रविदास जयंती पर जालंधर के बल्लां गांव स्थित सचखंड बल्लां डेरा पहुंचकर संत निरंजन दास का आशीर्वाद लिया. इसका स्पष्ट संदेश रविदासिया समाज तक पहुंचाना था, जो पंजाब के सबसे प्रभावशाली दलित समुदायों में गिना जाता है. दूसरा बड़ा केंद्र है राधा स्वामी डेरा ब्यास, जिसके प्रमुख गुरिंदर सिंह ढिल्लों की प्रधानमंत्री मोदी से कई बार मुलाकात हो चुकी है. तीसरा, प्रभावशाली केंद्र डेरा सच्चा सौदा है, जिसका मालवा क्षेत्र में बड़ा प्रभाव माना जाता है. बीजेपी की कोशिश इन धार्मिक संस्थाओं के प्रभाव वाले मतदाताओं तक अपनी पहुंच बढ़ाने की है.
दूसरी रणनीति- दूसरे दलों के नेताओं को साथ लाना
बीजेपी की दूसरी रणनीति उन प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़ने की है, जिनका दूसरे दलों में मजबूत राजनीतिक आधार रहा है. पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़ और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू पहले ही बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि बीजेपी लगातार AAP और कांग्रेस के नेताओं पर भी नजर बनाए हुए है. पार्टी मानती है कि मजबूत स्थानीय चेहरों के जरिए पंजाब में संगठन तेजी से खड़ा किया जा सकता है.
2T रणनीति भी चर्चा में
बीजेपी केवल संगठनात्मक नहीं बल्कि प्रतीकात्मक राजनीति पर भी जोर दे रही है.
पहला T है टर्बन (पगड़ी). हाल के महीनों में अमित शाह और नायब सिंह सैनी सार्वजनिक कार्यक्रमों में पगड़ी पहनकर नजर आए. इसे सिख समाज के प्रति सम्मान का संदेश देने की कोशिश माना जा रहा है.
दूसरा T है तरणजीत सिंह संधू. पूर्व विदेश सचिव और अमृतसर से लोकसभा चुनाव लड़ चुके तारणजीत सिंह संधू को दिल्ली का उपराज्यपाल बनाया गया है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले के जरिए बीजेपी पंजाब के शहरी और सिख मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने का प्रयास कर रही है.
क्या फिर साथ आ सकते हैं अकाली दल-बीजेपी?
हाल के दिनों में बीजेपी नेताओं का शिरोमणि अकाली दल के प्रति बदला हुआ रुख भी चर्चा का विषय बना हुआ है. नशे के खिलाफ आयोजित एक कार्यक्रम में अकाली दल के नेताओं और राधा स्वामी डेरा के प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने दोनों दलों के बीच भविष्य में फिर से नजदीकियां बढ़ने की अटकलें लगाई जाने लगी. यदि दोनों दल फिर साथ आते हैं, तो पंजाब की चुनावी तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है.
बीजेपी के सामने चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि बीजेपी आक्रामक रणनीति पर काम कर रही है, लेकिन उसके सामने कई बड़ी चुनौतियां भी हैं. पार्टी के अधिकतर बड़े चेहरे दूसरे दलों से आए हुए हैं. इनमें से कई नेता हाल के चुनावों में अपनी सीट भी नहीं जीत पाए. ऐसे में केवल दल-बदल करने वाले नेताओं के भरोसे मजबूत जनाधार तैयार करना आसान नहीं होगा. दूसरी बड़ी चुनौती किसान आंदोलन की बनी हुई छवि है. इसके अलावा पंजाब में आज भी बीजेपी का स्वतंत्र संगठन कांग्रेस, आप और अकाली दल जितना मजबूत नहीं माना जाता.



