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Rajasthan Nikay Chunav | BJP Barabandi | Congress Barabandi

जयपुर. राजस्थान में निकाय चुनाव का शोर अब गलियों और मोहल्लों से निकलकर होटल और रिसॉर्ट तक पहुंचने वाला है. प्रत्याशियों ने कई दिनों तक धूल फांकी, गली-गली घूमकर वोट मांगे, नाराज मतदाताओं को मनाया और समर्थकों के साथ बैठकर आखिरी रणनीति बनाई. अब मतदान का दौर खत्म होते ही असली खेल शुरू होने वाला है. 11 सितंबर को दूसरे चरण की वोटिंग खत्म होने के बाद राजनीतिक दल अपने पार्षद प्रत्याशियों और संभावित जिताऊ निर्दलीयों पर नजर और कड़ी करेंगे. अगले कुछ दिन चुनावी जीत से ज्यादा संख्या बचाने और अपने खेमे को एकजुट रखने के होंगे.

राजस्थान में इस बार निकाय चुनाव दो चरणों में हो रहे हैं. पहले चरण में 9 सितंबर को मतदान हो चुका है और दूसरे चरण में 11 सितंबर को 147 निकायों में वोट डाले जा रहे हैं. दूसरे चरण में 18,266 प्रत्याशी मैदान में हैं और 87 लाख से ज्यादा मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं. छह नगर निगमों समेत 147 निकायों के 4,774 वार्डों में मतदान हो रहा है. मतगणना 14 सितंबर को होगी. लेकिन चुनाव की असली कहानी सिर्फ 14 सितंबर को नतीजे आने तक खत्म नहीं होगी. उसके बाद शुरू होगा कुर्सी का खेल. खासकर उन निकायों में जहां किसी एक पार्टी को साफ बहुमत नहीं मिलेगा या कुछ वार्डों में निर्दलीय पार्षदों का महत्व बढ़ जाएगा. यहीं से बाड़ाबंदी का दौर और तेज होने की चर्चा है.

पहले चरण वाले प्रत्याशियों पर पार्टियों की नजरपहले चरण में चुनाव लड़ चुके कई प्रत्याशियों को भाजपा और कांग्रेस ने अपने-अपने स्तर पर संभालना शुरू कर दिया है. मकसद साफ है. नतीजे आने के बाद कोई पार्षद अचानक पाला न बदल दे और निकाय प्रमुख के चुनाव में संख्या का गणित हाथ से न निकल जाए. राजनीतिक दलों के लिए सबसे ज्यादा चिंता उन सीटों की है, जहां मुकाबला बेहद करीबी माना जा रहा है. ऐसे निकायों में एक-दो पार्षद भी पूरा खेल बदल सकते हैं. यही वजह है कि पार्टी के अपने पार्षदों के साथ-साथ मजबूत निर्दलीय उम्मीदवारों पर भी नजर रहेगी.

दूसरे चरण के प्रत्याशी भी अब घेरे में11 सितंबर को मतदान खत्म होते ही दूसरे चरण में चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को लेकर भी पार्टियों की गतिविधियां तेज होने वाली हैं. अभी तक जो प्रत्याशी मतदाताओं के बीच दौड़ रहे थे, वे अब पार्टी की रणनीति के हिसाब से एक जगह रखे जा सकते हैं. यानी चुनाव प्रचार में जिस पार्षद प्रत्याशी के पास अपने वार्ड में घूमने की फुर्सत नहीं थी, उसके लिए अगले कुछ दिन काफी अलग होने वाले हैं. बाहर का चुनावी शोर खत्म होगा और होटल-रिसॉर्ट की चारदीवारी के भीतर बैठकों का दौर शुरू हो सकता है.

होटल-रिसॉर्ट में खातिरदारी, लेकिन नजर मोबाइल परबाड़ाबंदी का नाम आते ही राजनीति में होटल और रिसॉर्ट की तस्वीर सामने आ जाती है. यहां आराम भी होगा, खाना-पीना भी होगा और पार्टी नेताओं के साथ लगातार बैठकें भी चलेंगी. यानी जिन प्रत्याशियों ने चुनाव के दौरान सुबह से रात तक भागदौड़ की है, उनके लिए कुछ दिन की यह जिंदगी बाहर से देखने पर ‘मौजा ही मौजा’ जैसी लग सकती है. लेकिन इस आराम के पीछे पार्टियों की बेचैनी भी कम नहीं होगी. किस पार्षद का झुकाव किस तरफ है, कौन किसके संपर्क में है और किस निर्दलीय को अपने पाले में लाया जा सकता है, इन सवालों पर लगातार नजर रखी जाएगी.

बाड़ाबंदी सिर्फ आराम नहीं, नंबर बचाने की रणनीतिनिकाय प्रमुख का चुनाव सीधे जनता नहीं करती. ऐसे में पार्षदों की संख्या ही सबसे बड़ा हथियार बन जाती है. अगर किसी पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है तो निर्दलीय पार्षद अचानक सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं. यही वह स्थिति होती है जब चुनावी नतीजे आने के बाद भी राजनीतिक दलों की दौड़ खत्म नहीं होती. एक तरफ नतीजों का इंतजार होगा, दूसरी तरफ संभावित समीकरणों पर काम चलेगा. कौन साथ आ सकता है, किसे मनाना है और किसे अपने साथ बनाए रखना है, यह सब पर्दे के पीछे तय होगा.

जयपुर से लेकर बड़े शहरों तक नजर
दूसरे चरण में जयपुर, जोधपुर, कोटा, बीकानेर, उदयपुर और अजमेर जैसे बड़े नगर निगमों में भी मतदान हो रहा है. जयपुर नगर निगम के 150 वार्ड हैं और यहां मुकाबला खास तौर पर राजनीतिक रूप से अहम है. इन बड़े शहरों में बोर्ड बनाने के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने सिर्फ पार्षद जिताने की चुनौती नहीं है, बल्कि नतीजे के बाद अपने पक्ष में संख्या बनाए रखने की भी चुनौती रहेगी. पहले चरण में भी कई जगहों पर मुकाबले के दौरान विवाद, आरोप और खींचतान देखने को मिली. ऐसे में दोनों प्रमुख दल अब अपने जीते हुए पार्षदों को लेकर किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहेंगे. चुनाव में एक-एक सीट की अहमियत पहले ही साफ हो चुकी है.

14 सितंबर को ईवीएम खुलेंगी, असली गणित उसके बाद14 सितंबर को जब ईवीएम खुलेंगी तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाएगी. किस पार्टी को कितनी सीटें मिलीं, कहां मुकाबला फंसा और कहां निर्दलीयों की भूमिका बन रही है, यह सामने आ जाएगा. इसके बाद निकाय प्रमुख की कुर्सी के लिए राजनीतिक सक्रियता और बढ़ेगी. यानी 9 और 11 सितंबर को जनता वोट देगी, 14 सितंबर को नतीजे आएंगे और उसके बाद नेताओं की बारी होगी. पार्षदों की संख्या का गणित बैठेगा, फोन घूमेंगे, मुलाकातें होंगी और जरूरत पड़ी तो होटल-रिसॉर्ट भी सियासी दफ्तर में बदल जाएंगे.

दस दिन का दिलचस्प दौर10 दिन का यह दौर इसलिए भी दिलचस्प होगा क्योंकि सड़क पर चुनाव भले खत्म हो जाए, लेकिन निकाय की कुर्सी का मुकाबला अभी बाकी रहेगा. प्रत्याशियों के लिए अब प्रचार की भागदौड़ खत्म और पार्टी की निगरानी शुरू. बाहर से देखें तो आराम, अंदर से देखें तो हर कदम पर नजर. यही राजस्थान के निकाय चुनाव का अगला और सबसे दिलचस्प अध्याय होने वाला है.

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