Rajasthan

हसदेव अरण्य में खनन प्रोजेक्ट पर बवाल, RRVUNL का 4.48 लाख पेड़ काटने का प्रस्ताव, विरोध तेज

Last Updated:May 08, 2026, 11:11 IST

Hasdeo Aranya RRVUNL Power Project: राजस्थान की सरकारी बिजली कंपनी आरआरवीयूएनएल ने छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में खनन विस्तार के लिए करीब 4.48 लाख पेड़ काटने का प्रस्ताव दिया है. यह कोल ब्लॉक राजस्थान की बिजली जरूरतों से जुड़ा है, लेकिन पर्यावरणविदों और स्थानीय संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है. विशेषज्ञों का कहना है कि पेड़ों की कटाई से हाथियों समेत कई वन्यजीवों के आवास प्रभावित होंगे. वहीं आदिवासी समुदायों ने विस्थापन और आजीविका पर खतरा जताया है. मामले पर अंतिम फैसला केंद्र और संबंधित एजेंसियों को लेना है.

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हसदेव अरण्य में लाखों पेड़ों की कटाई पर घमासान, RRVUNL प्रोजेक्ट का बढ़ा विवादZoomपावर प्लांट (फाइल फोटो)

जयपुर. राजस्थान की सरकारी बिजली कंपनी राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) एक नए खनन प्रोजेक्ट को लेकर विवादों में घिर गई है. कंपनी ने छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में स्थित परसा ईस्ट और केंते बसन कोल ब्लॉक में खनन विस्तार की योजना के तहत बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की अनुमति मांगी है. प्रस्ताव के अनुसार, करीब 4.48 लाख पेड़ों को काटने की तैयारी की जा रही है. पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों के अस्तित्व को लेकर अब नई बहस तेज हो गई है.

जानकारी के अनूसार, यह कोल ब्लॉक राजस्थान सरकार की बिजली उत्पादन जरूरतों को पूरा करने के लिए उपयोग में लाया जा रहा है. आरआरवीयूएनएल का कहना है कि बिजली उत्पादन बढ़ाने और भविष्य की ऊर्जा मांग को देखते हुए कोयला खनन जरूरी है. हालांकि पर्यावरणविदों और स्थानीय संगठनों ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध शुरू कर दिया है. उनका कहना है कि जिस क्षेत्र में खनन प्रस्तावित है, वह घने जंगलों, जैव विविधता और वन्यजीवों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.

हसदेव अरण्य क्षेत्र कई जंगली जानवरों का है बसेरा

हसदेव अरण्य क्षेत्र छत्तीसगढ़ के सबसे संवेदनशील वन इलाकों में गिना जाता है. यहां हाथी, तेंदुआ, स्लॉथ भालू और कई दुर्लभ प्रजातियों का प्राकृतिक आवास मौजूद है. यह इलाका हाथियों के कॉरिडोर के रूप में भी जाना जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से वन्यजीवों के आवागमन पर असर पड़ेगा और मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ सकती हैं. इसके अलावा जंगलों के खत्म होने से पर्यावरणीय संतुलन भी प्रभावित होगा.

कम्पेन्सेटरी अफॉरेस्टेशन का दिया गया है प्रस्ताव

रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने वन भूमि के बदले दूसरी जगह प्रतिपूरक वनीकरण (कम्पेन्सेटरी अफॉरेस्टेशन) का प्रस्ताव दिया है. इसके तहत दूसरे क्षेत्रों में पौधारोपण कर वन क्षेत्र की भरपाई करने की बात कही गई है. हालांकि पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने और घने प्राकृतिक जंगलों की तुलना नए पौधारोपण से नहीं की जा सकती. उनका कहना है कि दशकों पुराने जंगलों का पारिस्थितिक महत्व अलग होता है और उन्हें दोबारा उसी रूप में तैयार करना लगभग असंभव है.

आदिवासी समुदायों ने भी जाहिर की चिंता

स्थानीय आदिवासी समुदायों ने भी इस परियोजना को लेकर चिंता जताई है. उनका कहना है कि जंगल उनके जीवन, आजीविका और संस्कृति का आधार हैं. यदि खनन विस्तार हुआ तो हजारों लोगों पर विस्थापन का खतरा मंडरा सकता है. ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि उनकी सहमति के बिना परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है. कई सामाजिक संगठनों ने वन अधिकार कानून और पर्यावरणीय मंजूरियों की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं.

केंद्र और संबंधित एजेंसियों को लेना है अंतिम निर्णय

दूसरी ओर ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि राजस्थान जैसे बड़े राज्य की बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयला आधारित परियोजनाएं अभी भी महत्वपूर्ण हैं. राज्य में बढ़ती बिजली मांग के कारण उत्पादन क्षमता बढ़ाने का दबाव बना हुआ है. ऐसे में सरकार ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की चुनौती का सामना कर रही है. फिलहाल इस पूरे मामले पर अंतिम निर्णय केंद्र और संबंधित पर्यावरणीय एजेंसियों की मंजूरी के बाद ही होगा. लेकिन प्रस्ताव सामने आने के बाद पर्यावरण संरक्षण, आदिवासी अधिकार और ऊर्जा जरूरतों के बीच संघर्ष एक बार फिर बहस का विषय बन गया है.

About the Authordeep ranjan

दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट…और पढ़ें

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