Sikar News I local18 I रोरूं बड़ी की अनसुनी कहानी

Last Updated:July 12, 2026, 13:34 IST
Sikar News: सीकर जिले की लक्ष्मणगढ़ तहसील का रोरूं बड़ी गांव सिर्फ एक बस्ती नहीं, बल्कि 654 साल पुराने इतिहास, लोकआस्था और वीरता की अनोखी विरासत है. संवत 1429 में बसाए गए इस गांव में आज भी हजारों बीघा गोचर भूमि, कालका माता मंदिर की रहस्यमयी मान्यताएं और शहीदों की गाथाएं इसकी पहचान बनी हुई हैं. सदियों पुरानी परंपराओं और सामाजिक समरसता को संजोए रोरूं बड़ी शेखावाटी की ऐतिहासिक धरोहरों में एक खास स्थान रखता है.
इतिहास और संस्कृति का अनूठा संगम रोरूं बड़ी को शेखावाटी के सबसे खास गांवों में शामिल करता है. रोरूं बड़ी की स्थापना बादूसर गांव के रूणजी ढाका ने की थी, जबकि उनके भाई बादूराम ने बादूसर गांव बसाया था. गांव बसने के बाद सबसे पहले माड गोत्र के जाट यहां आकर बसे. इसके बाद पूनिया और फिर ढाका गोत्र के अन्य परिवारों ने यहां निवास किया. समय के साथ विभिन्न जातियों के लोग भी गांव में बसते चले गए और रोरूं बड़ी सामाजिक समरसता का उदाहरण बन गया.
गांव के रिटायर्ड फौजी हनुमानाराम ढाका स्वयं गांव के संस्थापक रूणजी ढाका की 41वीं पीढ़ी के वंशज हैं. गांव के इतिहास की सबसे बड़ी विशेषता संवत 1522 में लिया गया वह निर्णय माना जाता है, जिसने आज भी पशुधन संरक्षण की मिसाल कायम कर रखी है. संस्थापक रूणजी ढाका के पुत्र गोगोजी ने उस समय गांव के पशुओं के लिए करीब दो हजार बीघा गोचर और जोहड़ी भूमि सुरक्षित छोड़ी थी.
सदियों बाद भी यही भूमि गांव के गोवंश और पशुपालकों के लिए उपयोगी बनी हुई है. वर्तमान समय में जब चारागाहों का लगातार क्षरण हो रहा है, तब रोरूं बड़ी का यह ऐतिहासिक निर्णय दूरदर्शी सोच का उदाहरण माना जाता है. रोरूं बड़ी की अर्थव्यवस्था आज भी मुख्य रूप से कृषि और पशुपालन पर आधारित है. गांव के अधिकांश परिवार खेती और डेयरी व्यवसाय से जुड़े हुए हैं. गांव ने देश सेवा में भी अपनी अलग पहचान बनाई है. करगिल युद्ध के शहीद जगमाल सिंह और शहीद खेमचंद खटोड़ इसी गांव की मिट्टी से निकले वीर सपूत थे.
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इसके बाद से माता की मूर्ति मौन हो गई. करीब दो दशक पहले पुरानी प्रतिमा के समीप नई प्रतिमा स्थापित की गई, जबकि प्राचीन प्रतिमा आज भी इतिहास की साक्षी के रूप में सुरक्षित है. बताया जाता है कि मूल प्रतिमा की स्थापना संवत 1442 में हुई थी. बाद में मुगलकाल में मंदिर को क्षति पहुंचाई गई और वर्ष 1755 में चौधरी बेगाराम ने इसका पुनर्निर्माण कराया.
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