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Success Story: गुजरात से सीखी तकनीक, अब केंचुओं से बदल रहे खेती की तस्वीर; किसान भंवरलाल बने मिसाल

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गुजरात से सीखी तकनीक, अब केंचुओं से बदल रहे खेती की तस्वीर किसान भंवरलाल

Last Updated:July 11, 2026, 09:12 IST

Organic Farming Success Story: डीडवाना-कुचामन जिले के अहीरों का बास गांव के प्रगतिशील किसान भंवरलाल यादव ने प्राकृतिक खेती अपनाकर खेती की नई मिसाल पेश की है. कृषि विभाग के अध्ययन दौरे के दौरान गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में वर्मी कम्पोस्ट की आधुनिक तकनीक देखने के बाद उन्होंने वर्ष 2012-13 में अपने खेत पर केंचुआ खाद बनाना शुरू किया. आज छह क्यारियों से एक बार में करीब 120 क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट तैयार होती है. वे अपनी 40 बीघा कृषि भूमि में जैविक खाद का उपयोग कर खेती की लागत कम कर रहे हैं और मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ा रहे हैं. उनका मॉडल अब आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बन गया है.

डीडवाना-कुचामन जिले के अहीरों का बास गांव के प्रगतिशील किसान भंवरलाल यादव ने यह साबित कर दिया है कि खेती में बदलाव की शुरुआत नई सोच से होती है. आधुनिक और प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाकर उन्होंने न केवल अपनी खेती की लागत कम की, बल्कि आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा का नया रास्ता खोल दिया. आज उनका वर्मी कम्पोस्ट मॉडल क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है.

भंवरलाल यादव ने बताया कि कृषि विभाग की ओर से उन्हें नागौर जिले के किसानों के अध्ययन दल के साथ गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश का भ्रमण करने का अवसर मिला. वहां उन्होंने प्राकृतिक खेती और केंचुआ खाद उत्पादन की आधुनिक तकनीकों को करीब से देखा. इन प्रयोगों से प्रभावित होकर उन्होंने लौटते ही रासायनिक खेती से दूरी बनाते हुए पूरी तरह जैविक खेती की दिशा में कदम बढ़ा दिए.

वर्ष 2012-13 में उन्होंने वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन की शुरुआत की. इसके लिए अपने खेत पर 18 फीट लंबी और 3 फीट चौड़ी छह क्यारियां तैयार करवाईं. बीकानेर से उन्नत नस्ल के लाल रंग के केंचुए मंगवाए और गाय-भैंस के गोबर से जैविक खाद बनाना शुरू किया. वर्षों बाद भी उन्हीं केंचुओं की बढ़ती संख्या लगातार खाद उत्पादन का आधार बनी हुई है.

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भंवरलाल बताते हैं कि प्रत्येक क्यारी में करीब 20 क्विंटल गोबर डाला जाता है, जिसके ऊपर केंचुए छोड़े जाते हैं. लगभग तीन महीने में यही गोबर उच्च गुणवत्ता वाली वर्मी कम्पोस्ट खाद में बदल जाता है. पूरी प्रक्रिया के दौरान क्यारियों को छायादार स्थान पर रखा जाता है और हर दो-तीन दिन में हल्का पानी डालकर आवश्यक नमी बनाए रखी जाती है. तापमान अधिक होने पर केंचुओं के मरने का खतरा रहता है, इसलिए विशेष सावधानी बरती जाती है.

छह क्यारियों से एक बार में करीब 120 क्विंटल जैविक खाद तैयार हो जाती है. भंवरलाल के पास लगभग 40 बीघा कृषि भूमि है, जिसमें से हर साल करीब 10 बीघा क्षेत्र में वे अपनी तैयार की गई वर्मी कम्पोस्ट खाद का उपयोग करते हैं. उनका कहना है कि जैविक खाद के नियमित उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता लगातार बेहतर हो रही है और फसलों की उत्पादकता में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है.

उनका अनुभव है कि एक बार खेत में केंचुआ खाद डालने के बाद करीब तीन वर्षों तक रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता नहीं पड़ती. एक बीघा भूमि में लगभग 100 किलो वर्मी कम्पोस्ट पर्याप्त रहती है. इससे खेती की लागत कम होती है, मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और फसल की गुणवत्ता के साथ उत्पादन भी बेहतर होता है. यही कारण है कि अब वे रासायनिक खेती की तुलना में जैविक खेती को अधिक लाभकारी मानते हैं.

आज भंवरलाल यादव केवल सफल किसान ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरक भी बन चुके हैं. वे लगातार किसानों को वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने और प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए जागरूक कर रहे हैं. उनका मानना है कि यदि किसान स्थानीय संसाधनों से जैविक खाद तैयार करें तो खेती अधिक टिकाऊ, कम खर्चीली और पर्यावरण के अनुकूल बन सकती है. उनका यह मॉडल अब आसपास के कई किसानों के लिए नई उम्मीद का केंद्र बन गया है.

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