Sudan Gold Mine Tragedy : सोना खोद रहे थे, खादान में ही दफन हो गए 67 मजदूर, हाथों से कीचड़ हटाकर खोज रहे घरवाले

67 मजदूर खुद उसी धरती में दफन हो गए, जहां वो खजाने की तलाश कर रहे थे. जहां पर मशीनों और इंसानों की चहल-पहल रहती थी वो जगह अब श्मशान बन चुकी है. यहां अपनों की लाशें तलाशने के लिए उनके परिजन बदहवास होकर अपनी उंगलियों और हाथों से मिट्टी हटाते दिख रहे हैं. ये हादसा गोल्ड माइन के अचानक ढहने से हुआ है, ऐसे हादसों में आमतौर पर सरकार तुरंत रेस्क्यू टीम भेजती है, लेकिन यहां मदद के लिए कोई नहीं आया. लोग तीन दिनों तक खदान के बाहर इंतजार करते रहे, लेकिन जब कोई टीम नहीं पहुंची, तो वो खुद ही अपनों को जमीन से खोदकर निकालने पर मजबूर हो गए.
मजदूरों को बचाने क्यों नहीं पहुंची कोई रेस्क्यू टीम?
ये दर्दनाक हादसा सूडान के एक दूर-दराज इलाके में सोने की खदान धंसने से हुआ है. वेस्ट कोर्डोफान प्रांत के नुहुद शहर में मौजूद अल-जारा गोल्ड माइन अचानक ढह गई, जिसमें काम कर रहे कम से कम 67 मजदूरों की जान चली गई. इस हादसे के बाद से ही दर्जनों मजदूर मलबे के नीचे फंसे हुए हैं और उनके परिजन बदहवास होकर अपनी उंगलियों व हाथों से मिट्टी हटाकर अपनों को तलाश रहे हैं.
ये पूरा इलाका पिछले तीन सालों से सूडानी सेना और पैरामिलिट्री ग्रुप ‘रैपिड सपोर्ट फोर्सेज’ (RSF) के बीच जारी भीषण गृहयुद्ध की चपेट में है. इस जंग की वजह से प्रशासनिक ढांचा पूरी तरह तबाह हो चुका है, जिससे मौके पर राहत कार्य के लिए कोई जेसीबी या भारी क्रेन तक नहीं पहुंच पाई है. अपनी रोजी-रोटी की तलाश में खदान में उतरे बेबस मजदूरों की जिंदगी इस गृहयुद्ध और अवैध खनन के काले कारोबार की भेंट चढ़ गई है.
सोने की खादान के अंदर क्या हुआ?
ये दुखद हादसा मंगलवार की देर रात अल-जारा नाम की सोने की खदान में हुआ. उस वक्त दर्जनों मजदूर खदान की गहराई में बनी अलग-अलग सुरंगों में उतरकर सोना तलाश रहे थे. अचानक खदान के ऊपरी हिस्से की मिट्टी और भारी चट्टानें धंसने लगीं. देखते ही देखते पूरी खदान ताश के पत्तों की तरह ढह गई. अंदर काम कर रहे मजदूरों को बाहर भागने तक का मौका नहीं मिला और वे सैकड़ों टन कीचड़, मिट्टी और पत्थरों के नीचे दब गए.
घटना की खबर मिलते ही पास के गांवों से लोग और बचे हुए मजदूर बदहवास होकर खदान की तरफ भागे. लेकिन खदान इतनी गहरी और घुमावदार सुरंगों में बंटी हुई थी कि बिना भारी मशीनों के नीचे फंसे लोगों तक पहुंचना मुमकिन नहीं था. वहां मौजूद मेडिकल टीम और चश्मदीदों का कहना है कि मलबे के नीचे अभी भी कई लोग फंसे हुए हैं, जिससे मरने वालों की संख्या और तेजी से बढ़ सकती है.
‘हाथों से मिट्टी हटाने को मजबूर’, चश्मदीद मजदूरों का छलका दर्द
इस खौफनाक हादसे में किसी तरह अपनी जान बचाकर निकले मजदूर खैर-अल-सईद गबारा ने वहां का मंजर सुनाते हुए बताया कि सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि किसी को संभलने का मौका ही नहीं मिला. गबारा के मुताबिक सबसे दिल तोड़ने वाली बात ये है कि मलबे को हटाने के लिए वहां कोई जेसीबी या खुदाई करने वाली मशीन मौजूद ही नहीं है. गांव वाले और मजदूर अपने हाथों, फावड़ों और साधारण औजारों से ही भारी पत्थरों और कीचड़ को हटाने में जुटे हुए हैं.
एक अन्य मजदूर अल-अमीन सुलेमान ने बताया कि खदान के अंदर कई छोटी-छोटी सुरंगें बनी हुई थीं, जिनमें कई लोग गहराई में फंसे रह गए हैं. उनका कहना है कि जब तक मौके पर भारी मशीनें और क्रेन नहीं पहुंचतीं, तब तक मलबे में दबे लोगों को जिंदा बाहर निकालना लगभग नामुमकिन है. समय बीतने के साथ ही मलबे में दबे लोगों की सांसें टूटने का खतरा बढ़ता जा रहा है.
गृहयुद्ध की आग और अवैध माइनिंग का खूनी खेल
सूडान में हुआ ये हादसा सिर्फ कोई कुदरती आफत नहीं है, बल्कि इसके पीछे देश में चल रहा गृहयुद्ध और अवैध माइनिंग का काला सच छिपा हुआ है. वेस्ट कोर्डोफान का ये इलाका पैरामिलिट्री ‘रैपिड सपोर्ट फोर्सेज’ (RSF) के नियंत्रण में आता है. पिछले तीन सालों से RSF और सूडानी सेना के बीच खूनी जंग चल रही है. इस लड़ाई की वजह से पूरे इलाके में कानून-व्यवस्था पूरी तरह खत्म हो चुकी है.
सूडान पूरे अफ्रीका में सोना पैदा करने वाले सबसे बड़े देशों में से एक माना जाता है. लेकिन यहां ज्यादातर सोने का खनन बिना किसी सुरक्षा नियम या वैज्ञानिक तरीके के होता है. गृहयुद्ध के इस दौर में खदानों पर हथियारबंद गुटों का कब्जा हो चुका है. ये गुट अपने हथियारों और युद्ध का खर्च निकालने के लिए गरीब मजदूरों से बेहद खतरनाक हालात में काम करवाते हैं. वहीं भुखमरी से जूझ रहे मजदूरों के पास कोई और काम न होने के कारण वे अपनी जान जोखिम में डालकर इन कच्ची खदानों में उतरने पर मजबूर हैं.
सूडान की खदानों का भयानक इतिहास
सूडान में सोने की खदानों का ढहना कोई पहली घटना नहीं है. प्रशासनिक लापरवाही और सुरक्षा मानकों की अनदेखी के चलते यहां अक्सर ऐसे जानलेवा हादसे होते रहते हैं.
साल 2021 का दर्दनाक हादसा: 2021 में भी सूडान के इसी वेस्ट कोर्डोफान प्रांत में एक बड़ी सोने की खदान ढह गई थी, जिसमें 38 मजदूरों की मौत हुई थी.
साल 2023 की त्रासदी: 2023 में एक अन्य खदान के धंसने की वजह से 14 मजदूरों ने अपनी जान गंवा दी थी.
बिना रजिस्ट्रेशन के अवैध खुदाई: सूडान में ज्यादातर खदानें बिना किसी सरकारी अनुमति या निगरानी के खोदी जाती हैं. इन कच्ची खदानों में न तो कंक्रीट के पिलर लगाए जाते हैं और न ही ऑक्सीजन का सही इंतजाम होता है.
इतने बड़े-बड़े हादसों के बाद भी न तो खदान मालिकों पर कोई सख्त एक्शन लिया जाता है और न ही मजदूरों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं.
राहत कार्य में आ रही 4 सबसे बड़ी चुनौतियां
भारी मशीनों का अभाव: इलाका बहुत दूर-दराज और पिछड़ा होने के कारण वहां क्रेन या जेसीबी गाड़ियां नहीं पहुंच पाई हैं.
गृहयुद्ध और RSF का कब्जा: इस इलाके पर पैरामिलिट्री RSF का कब्जा होने की वजह से सरकारी एजेंसियां या अंतरराष्ट्रीय मदद की टीमें वहां नहीं पहुंच पा रही हैं.
कच्ची मिट्टी का खतरा: इलाके की मिट्टी बहुत भुरभुरी और कच्ची है, जिससे मलबे को हटाते समय दोबारा खदान धंसने का डर बना हुआ है.
अस्पतालों की कमी: आसपास के इलाकों में कोई बड़ा अस्पताल या मेडिकल सेंटर नहीं है, जिससे घायल मजदूरों को समय पर इलाज मिलना बहुत मुश्किल हो रहा है.
गरीबों की जान से सस्ती हुई सोने की कीमत
सूडान की इन खदानों से निकलने वाला सोना दुनिया भर के बाजारों में बिकता है और बड़े-बड़े कारोबारियों की तिजोरियां भरता है. लेकिन जिस सोने को निकालने के लिए गरीब मजदूर दिन-रात अपनी हड्डियां गलाते हैं, उनकी अपनी जिंदगी की कीमत कौड़ियों के भाव बना दी गई है. युद्धग्रस्त इलाकों में काम करने वाले इन मजदूरों को न तो कोई बीमा मिलता है और न ही हादसे के बाद उनके परिवारों को कोई मुआवजा दिया जाता है.
स्थानीय डॉक्टरों और राहत टीमों का अंदेशा है कि जैसे-जैसे मलबे को हटाया जाएगा, मौतों का आंकड़ा और बढ़ सकता है. फिलहाल सबसे बड़ी कोशिश खदान के अंदर फंसे लोगों तक किसी तरह हवा और पानी पहुंचाने की है ताकि उनकी सांसें बचाई जा सकें.



