Rajasthan

Swarn Bawdi: जालोर की रहस्यमयी बावड़ियां, जहां आज भी जिंदा हैं वीरमदेव की बहनों के बलिदान की कहानी

Last Updated:June 15, 2026, 20:29 IST

जालोर की स्वर्ण बावड़ी और झालर-कोलर बावड़ी केवल प्राचीन जल स्रोत नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और बलिदान की जीवंत मिसाल हैं. लोक मान्यताओं के अनुसार इनका संबंध राजा वीरमदेव चौहान की बहनों के त्याग से जुड़ा है. सदियों पुराने अकालों में भी कभी न सूखने वाले इन जल स्रोतों को आज भी लोग चमत्कारी मानते हैं, जिससे ये बावड़ियां जालोर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई हैं.

जालोर. किले की दीवारों में सिर्फ पत्थर नहीं, बल्कि सदियों पुराना इतिहास सांस लेता है. इसी इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं जालोर की प्रसिद्ध स्वर्ण बावड़ी और झालर-कोलर बावड़ी, जिन्हें आज भी आस्था, रहस्य और चमत्कार से जोड़कर देखा जाता है. यह कहानी केवल एक जल संरचना की नहीं, बल्कि उस दौर की है जब जालोर पर आक्रमण हुआ था और अलाउद्दीन खिलजी की सेनाओं ने इस क्षेत्र को घेर लिया था. लोक मान्यताओं और इतिहासकारों के अनुसार, इसी समय राजा वीरमदेव चौहान के जीवन से जुड़ी घटनाएं और उनके परिवार का बलिदान इस क्षेत्र की पहचान बन गया. इस पूरे विषय पर जानकारी देते हुए स्थानीय जानकार बंशीलाल सोनी बताते हैं कि यह दोनों बावड़ियां जालोर की सबसे प्राचीन बावड़ियों में से मानी जाती हैं. उनके अनुसार जब जालोर में युद्ध हुआ था और अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया था, उस समय राजा वीरमदेव की दो बहनें थी, जिन्होंने इस कठिन परिस्थिति में सती होकर अपने जीवन का बलिदान दिया. ये दोनों बावड़ियां उन्हीं की स्मृति में बनी मानी जाती हैं.

बंशीलाल सोनी बताते हैं कि इन दोनों बावड़ियों के पास आज भी मंदिर स्थित हैं, जो इस स्थान को और अधिक पवित्र बनाते हैं. झालर बावड़ी के पास आशापुरा माता का मंदिर है, जबकि कोलर बावड़ी के पास खेतलाजी क्षेत्रपाल जी का मंदिर स्थित है. यह परंपरा भी बताती है कि पुराने समय में किसी भी मंदिर के साथ बावड़ी का होना आवश्यक माना जाता था, क्योंकि उसी जल से देवताओं का स्नान कराया जाता था और धार्मिक कार्य सम्पन्न होते थे. कोलर बावड़ी को लोग आज भी स्वर्ण बावड़ी के नाम से जानते हैं. कहा जाता है कि पुराने समय में इस बावड़ी के जल में मिट्टी के साथ-साथ हल्के सोने जैसे कण भी पाए जाते थे, जिससे इसे अत्यंत पवित्र और रहस्यमय माना जाने लगा. इसी कारण यह स्थान लोगों की आस्था का केंद्र बन गया. वहीं झालर बावड़ी को लेकर भी कई लोककथाएं प्रचलित हैं. कहा जाता है कि यहाँ सती हुई बहन की स्मृति में एक चमत्कारी संकेत दिखाई देता था, जिसे लोग आस्था के साथ पूजते थे. लेकिन समय के साथ एक घटना में उस प्रतीक को नष्ट कर दिया गया, लेकिन लोगों की श्रद्धा आज भी कम नहीं हुई.

अकाल पड़ने पर भी इन बावड़ियों का पानी नहीं सूखा

एक और महत्वपूर्ण मान्यता यह भी है कि इन बावड़ियों का पानी कभी सूखता नहीं है. चाहे कितना भी भयंकर अकाल क्यों न पड़ा हो, इन जल स्रोतों ने हमेशा जालोर की धरती को जीवन दिया है. पुराने समय में तो इसी पानी से जालोर दुर्ग पर खेती भी की जाती थी, जिससे किले में रहने वाले लोगों का जीवन यापन संभव होता था. इतिहास के पन्ने बताते हैं कि जब पूरे क्षेत्र में भयंकर सूखा और अकाल पड़ा था, तब भी जालोर की ये दोनों बावड़ियां लोगों के लिए जीवन का आधार बनी रही.  कहा जाता है कि संवत 1925 और 1856 के बीच जब जालोर में बहुत बड़े अकाल पड़े, उस समय चारों ओर पानी की भारी कमी थी, लेकिन इसके बावजूद इन बावड़ियों का जल कभी समाप्त नहीं हुआ. आज स्वर्ण, झालर और कोलर बावड़ी सिर्फ पर्यटन स्थल नहीं हैं, बल्कि यह उस इतिहास की गवाही देती हैं जहां त्याग, आस्था और जीवन एक साथ जुड़े हुए थे. यह स्थान आज भी लोगों को यह एहसास कराता है कि जालोर की धरती सिर्फ युद्धों की नहीं, बल्कि अमर कहानियों की भूमि है.

About the AuthorMonali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें

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