1995 से 1991 के बीच, दिलीप कुमार की इन 6 फिल्मों का बजा था डंका, 1981 में तो चूर-चूर हो गया था अमिताभ का स्टारडम

Last Updated:July 08, 2026, 18:10 IST
Dilip Kumar 6 Best Movies: आज के समय में बॉक्स ऑफिस पर दिवंगत अभिनेता दिलीप कुमार के दबदबे की बराबरी करना मुमकिन नहीं है. 1955 की ‘आजाद’ से लेकर 1991 की ‘सौदागर’ तक, दिलीप साहब ने 5 दशकों तक बॉक्स ऑफिस पर राज किया. साल 1981 में उन्होंने ‘क्रांति’ के जरिए बॉक्स ऑफिस पर ऐसा तूफान मचाया कि उस जमाने के ‘एंग्री यंग मैन’ अमिताभ बच्चन की सारी फिल्में उनके आगे झुकने को मजबूर हो गईं. तो आइए, जानते हैं दिलीप कुमार की उन 6 ऐतिहासिक फिल्मों की कहानी, जिन्होंने बॉलीवुड का इतिहास और कमाई के सारे रिकॉर्ड हमेशा के लिए बदल दिए.
नई दिल्ली. आज बॉलीवुड में जब भी हम ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों, 100 करोड़, 500 करोड़ या हजारों करोड़ क्लब की बात करते हैं, तो हम अक्सर आज के जमाने के सुपरस्टार्स के बारे में सोचते हैं. लेकिन अगर हम बॉलीवुड के इतिहास को देखें, तो हमें एक ऐसा समय मिलेगा जब न तो सोशल मीडिया था, न पीआर एजेंसियों का शोर था, न ही स्क्रीन काउंट की सुविधा थी. उस जमाने में थिएटर्स में भीड़ की गारंटी सिर्फ एक नाम माना जाता था- मोहम्मद यूसुफ खान यानी दिलीप कुमार. दिलीप कुमार को अक्सर ‘द ट्रेजेडी किंग’ या ‘द यूनिवर्सिटी ऑफ एक्टिंग’ कहा जाता है, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि वह अपने समय के सबसे बड़े कमर्शियल सुल्तान भी थे. 1955 से 1991 के बीच, दिलीप कुमार ने बॉक्स ऑफिस पर राज किया. इस दौरान उनकी 6 फिल्मों ने जो रिकॉर्ड बनाए, उन्होंने कई आज के और आने वाले सुपरस्टार्स के पसीने छुड़ा दिए. 1981 में भी जब अमिताभ बच्चन फिल्म इंडस्ट्री पर राज कर रहे थे, तब दिलीप कुमार ने उन्हें इतना बड़ा झटका दिया कि ट्रेड पंडित आज भी उन्हें याद करते हैं. तो आइए, दिलीप कुमार की उन 6 लैंडमार्क फिल्मों को एक-एक करके बताते हैं जो बॉक्स ऑफिस पर सफल रहीं.
1. आजाद (1955): 1950 के दशक में दिलीप कुमार एक सीरियस एक्टर के तौर पर जाने जाते थे जो स्क्रीन पर सिर्फ रोते थे या उदास किरदार निभाते थे. कहा जाता है कि लगातार सीरियस रोल करने की वजह से वह खुद डिप्रेशन से जूझ रहे थे. डॉक्टरों की सलाह पर, उन्होंने कुछ हल्का-फुल्का करने का फैसला किया और फिल्म ‘आजाद’ रिलीज हुई. इस फिल्म में दिलीप कुमार ने अपनी ट्रेडिशनल ‘ट्रेजेडी किंग’ इमेज से हटकर एक डाकू का चंचल, मजेदार और डबल रोल निभाया. दिलीप कुमार का यह किरदार दर्शकों के लिए बिल्कुल नया और जादुई था. मीना कुमारी के साथ उनकी केमिस्ट्री और सी. रामचंद्र का म्यूजिक घर-घर में मशहूर हो गया. यह कम बजट की फिल्म 1955 की दूसरी सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर बन गई, जिससे यह साबित हुआ कि दिलीप कुमार न सिर्फ लोगों को रुला सकते थे बल्कि बॉक्स ऑफिस पर पैसों की बारिश भी करवा सकते थे.
2. नया दौर (1957): बीआर चोपड़ा के डायरेक्शन में बनी ‘नया दौर’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि बदलते भारत की एक दिल को छू लेने वाली सामाजिक कहानी थी. फिल्म का मुख्य विषय मशीनीकरण बनाम इंसानी मेहनत था. दिलीप कुमार का घोड़ागाड़ी चलाना और बस के साथ उनकी रेस का सीन उस समय के दर्शकों के लिए रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव था. दिलीप कुमार की जोड़ी वैजयंतीमाला और ओपी नैयर के एवरग्रीन म्यूजिक ने थिएटर में ऐसी धूम मचाई कि लोग बार-बार सिनेमाघर आते रहे. हालांकि उस साल महबूब खान की लैंडमार्क फिल्म ‘मदर इंडिया’ भी रिलीज हुई थी, जिसने नंबर वन जगह बनाई, लेकिन ‘नया दौर’ ने दूसरे नंबर पर होने के बावजूद इतनी कमाई की कि यह ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर की लिस्ट में शामिल हो गई.
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3. मुगल-ए-आजम (1960): के. आसिफ की ‘मुगल-ए-आजम’ को बॉलीवुड का ‘ताजमहल’ कहना गलत नहीं होगा. इस फिल्म को बनने में लगभग एक दशक लग गया था. रिलीज होते ही इसने बॉलीवुड के सारे पिछले रिकॉर्ड ऐसे तोड़ दिए जैसे वे कभी थे ही नहीं. प्रिंस सलीम के रोल में दिलीप कुमार की गंभीरता, उनकी मखमली आवाज और दमदार डायलॉग डिलीवरी ने दर्शकों का मन मोह लिया. यह फिल्म 1960 में बॉक्स ऑफिस पर नंबर वन पर पहुंच गई थी. आज की महंगाई के हिसाब से देखें तो ‘मुगल-ए-आजम’ आज 2000 करोड़ से ज्यादा कमाने वाली फिल्म के बराबर है.
4. गंगा जमुना (1961): ‘मुगल-ए-आजम’ की शान से निकलकर, दिलीप कुमार ने अगले साल ‘गंगा जमुना’ में एक आम गांव के नौजवान का रोल किया, जो हालात की वजह से डकैत बन जाता है. फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी दिलीप कुमार की शुद्ध अवधी-भोजपुरी बोली थी. जिस तरह पेशावर में जन्मे एक आदमी ने उत्तर प्रदेश की आम भाषा को स्क्रीन पर जिंदा किया, उसने क्रिटिक्स को हैरान कर दिया. दिलीप कुमार ने खुद इस फिल्म को प्रोड्यूस भी किया था. दो भाइयों (एक पुलिसवाला और एक डाकू) की यह कहानी इतनी बड़ी हिट हुई कि इसे 1961 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म का टाइटल मिला. ट्रेड पंडितों का मानना है कि यह फिल्म अमिताभ बच्चन की ‘दीवार’ और सालों बाद रमेश सिप्पी की ‘शोले’ के लिए इंस्पिरेशन थी.
5. क्रांति (1981): अब बात करते हैं उस साल की जिसने बॉलीवुड के समीकरण हिला दिए. साल था 1981. मनोज कुमार के डायरेक्शन में एक देशभक्ति वाली मेगा-बजट फिल्म ‘क्रांति’ बन रही थी. इस फिल्म से दिलीप कुमार लगभग पांच साल के लंबे गैप के बाद मेनस्ट्रीम सिनेमा में एक कैरेक्टर आर्टिस्ट के तौर पर वापसी कर रहे थे. दूसरी तरफ, यह वह दौर था जब अमिताभ बच्चन इंडस्ट्री के बिना सोचे-समझे ‘शहंशाह’ बन चुके थे. 1981 में अमिताभ बच्चन की सिर्फ एक या दो नहीं, बल्कि कई बड़ी फिल्में रिलीज हुईं, जिनमें ‘नसीब’, ‘लावारिस’, ‘कालिया’ और ‘याराना’ शामिल हैं. ये सभी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रहीं और थिएटर में जबरदस्त कमाई की. सभी को यकीन था कि अमिताभ इस साल भी नंबर वन की पोजीशन बनाए रखेंगे. लेकिन जब दिलीप कुमार की ‘क्रांति’ थिएटर में आई, तो इसने बॉक्स ऑफिस पर सुनामी ला दी. देशभक्ति का जज्बा, दिलीप कुमार की दमदार एक्टिंग और मनोज कुमार के बड़े विजन ने दर्शकों का दिल जीत लिया. ‘क्रांति’ ने अमिताभ बच्चन की ‘लावारिस’ और ‘नसीब’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों को पीछे छोड़ते हुए 1981 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली नंबर वन फिल्म बन गई. यह दिलीप कुमार की तरफ से अमिताभ बच्चन के स्टारडम के लिए एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक झटका था.
6. सौदागर (1991): 1990 के दशक की शुरुआत तक, दिलीप कुमार काफी सीनियर हो गए थे, लेकिन उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और बॉक्स ऑफिस वैल्यू कम नहीं हुई थी. शोमैन सुभाष घई ने नामुमकिन सा काम कर दिखाया- उन्होंने दिलीप कुमार और उनके पुराने दुश्मन, राज कुमार को फिल्म ‘सौदागर’ के लिए एक साथ कास्ट किया, यह फिल्म दो पक्के दोस्तों के बीच दुश्मनी पर आधारित थी. इस फिल्म में जब दिलीप कुमार (वीर सिंह) और राज कुमार (राजेश्वर) स्क्रीन पर एक-दूसरे से भिड़े तो थिएटर तालियों और सीटियों से गूंज उठे. मनीषा कोइराला और विवेक मुशरान स्टारिंग इस फिल्म की पहली फिल्म अपने गानों (जैसे ‘इमली का बूटा’) और दमदार डायलॉग्स के साथ, 1991 की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक बन गई. यह दिलीप कुमार के करियर की आखिरी बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई.
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