सुबह 9:02 बजे शुरू युद्ध 9:40 पर खत्म, खाना पकने से पहले ही कैसे निपटी दुनिया की सबसे छोटी लड़ाई

Worlds Shortest War Between Britain and Zanzibar: दुनिया के इतिहास में आपने कई ऐसी छोटे और बड़े युद्धों के बारे में पढ़ा होगा जो सालों-साल तक चले और करोड़ों लोगों की जिंदगी भी लील गए. पहले और दूसरे विश्व युद्ध इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं. लेकिन क्या आप एक ऐसी जंग के बारे में जानते हैं जो एक टीवी शो के एक एपिसोड या खाना बनने में लगने वाले समय से भी कम यानी महज 38 मिनट में खत्म हो गया था?
इस अजीबोगरीब लड़ाई को दुनिया आंग्ल-जांजीबार युद्ध की, जिसे आधिकारिक तौर पर दुनिया के इतिहास का सबसे छोटा युद्ध माना जाता है. आखिर ब्रिटिश साम्राज्य और पूर्वी अफ्रीका के इस छोटे से द्वीप के बीच जंग की नौबत क्यों आई और कैसे यह महज कुछ ही मिनटों में सिमट कर रह गई?
गद्दी का लालच और ब्रिटेन का इगो यह पूरी कहानी है 19वीं सदी के आखिरी दौर की. साल 1890 में ब्रिटेन और जर्मनी के बीच एक संधि हुई थी, जिसके तहत पूर्वी अफ्रीका के कई इलाके आपस में बांटे गए थे. इस समझौते के बाद जांजीबार पर ब्रिटेन का प्रभाव और नियंत्रण स्थापित हो गया था. यह जांजीबार अब तंजानिया का हिस्सा है.
उस वक्त जांजीबार की कमान ब्रिटिश समर्थक सुल्तान हमद बिन थुवैनी के हाथ में थी. सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन 25 अगस्त 1896 को अचानक सुल्तान हमद की मौत संदेहास्पद स्थिति में हो गई. सुल्तान की मौत के तुरंत बाद उनके भतीजे खालिद बिन बरगश ने ब्रिटिश हुकूमत की इजाजत के बगैर ही खुद को जांजीबार का नया सुल्तान घोषित कर दिया.
उस दौर की संधि के मुताबिक, जांजीबार के सुल्तान की गद्दी पर बैठने के लिए ब्रिटिश कॉन्सुलेट की इजाजत लेना जरूरी था. खालिद का यह कदम अंग्रेजों को नागवार गुजरा और इसे सीधे तौर पर ब्रिटिश साम्राज्य की अवमानना और खुली चुनौती माना गया.
वॉर्निंग को नजरअंदाज करने की कीमत ब्रिटिश अधिकारी चाहते थे कि उनकी बात मानने वाला हमुद बिन मोहम्मद नाम का शख्स गद्दी पर बैठे. जांजीबार में तैनात ब्रिटिश राजनयिक बेसिल केव ने खालिद बिन बरगश को अल्टीमेटम दिया कि वह तुरंत महल खाली कर दे और पीछे हट जाए.
खालिद ने अंग्रेजों की इस चेतावनी को हवा में उड़ा दिया. उसे अपनी ताकत पर घमंड था और उसने अपनी सुरक्षा के लिए महल के चारों तरफ अपने करीब 3000 वफादार सैनिक तैनात कर दिए और खुद को शाही महल के अंदर बंद कर लिया. खालिद को लगता था कि अंग्रेज सिर्फ धमकी दे रहे हैं और वे कभी सीधा हमला नहीं करेंगे. यहीं उससे सबसे बड़ी भूल हो गई.
दुनिया का सबसे छोटा युद्धब्रिटिश नौसेना और सेना पूरी तरह ऐक्शन मोड में आ चुकी थी. रियर-एडमिरल हैरी रॉसन की अगुवाई में ब्रिटिश वारशिप जांजीबार के बंदरगाह पर पहले ही तैनात थे. अंग्रेजों ने खालिद को आखिरी अल्टीमेटम दिया कि वह 27 अगस्त 1896 की सुबह 9 बजे तक आत्मसमर्पण कर दे. जब सुबह 9 बजे तक सुल्तान की तरफ से कोई जवाब नहीं आया, तो ठीक 9:02 बजे ब्रिटिश युद्धपोतों ने महल पर ताबड़तोड़ बमबारी शुरू कर दी.
ब्रिटिश जहाजों से दागे गए गोलों ने कुछ ही मिनटों में सुल्तान के लकड़ी के महल को आग के हवाले कर दिया. जांजीबार की तरफ से एकमात्र शाही नौका HHS Glasgow ने जवाबी कार्रवाई करने की कोशिश की, जिसे ब्रिटिश बेड़े ने पलभर में डुबो डाला.
चारों तरफ तबाही मच चुकी थी और महल की रक्षा कर रहे सैनिकों के पास बचने का कोई रास्ता नहीं था. आखिरकार सुबह 9:40 तक महल पर लगा जांजीबार का झंडा गिरा दिया गया और युद्ध समाप्त होने की घोषणा कर दी गई. इसको ऐसे समझिए कि एक तरफ भारी तबाही का मंजर था और दूसरी तरफ केवल मामूली सी खरोच ही लगी.
महल में भीषण आग लगने और बमबारी की वजह से लगभग 500 जांजीबारी सैनिक और नागरिक मारे गए या घायल हुए. हैरानी की बात यह है कि शक्तिशाली ब्रिटिश बेड़े का एक भी सैनिक इस युद्ध में नहीं मरा, केवल एक ब्रिटिश नाविक गंभीर रूप से घायल हुआ जो बाद में ठीक हो गया.
फिर आगे क्या हुआ?युद्ध खत्म होने के बाद विद्रोही सुल्तान खालिद बिन बरगश ने जर्मन दूतावास में भागकर शरण ले ली और बाद में जर्मनी की मदद से वहां से निकलने में कामयाब रहा. वहीं, अंग्रेजों ने अपनी पसंद के कठपुतली शासक सुल्तान हमुद बिन मोहम्मद को गद्दी पर बैठा दिया. इस युद्ध के साथ ही जांजीबार की बची-खुची संप्रभुता भी पूरी तरह खत्म हो गई और वहां ब्रिटिश शिकंजा कसता चला गया.



