जयपुर के इन शिव मंदिरों में छिपा है सदियों पुराना रहस्य, सावन में दर्शन करने से जुड़ी हैं खास मान्यताएं

Last Updated:August 20, 2026, 13:27 IST
Jaipur Shiv Mandir: जयपुर में कई प्राचीन शिव मंदिर हैं लेकिन इनमें सबसे प्राचीन भूतेश्वर महादेव, झारखंड महादेव, ताड़केश्वर महादेव, रोजगारेश्वर महादेव, सदाशिव ज्योतिर्लिंगेश्वर महादेव सहित कई शिवालय हैं जहां भक्तों की सबसे अधिक मान्यता हैं.
सावन का महिना चल रहा हैं और जयपुर के शिवालयों में अभी भक्तों की जमकर भीड़ उमड़ रही हैं. खासतौर जयपुर के कुछ एक शिवालय जिनका इतिहास वर्षों पुराना हैं और जहां की खास मान्यताएं और परम्परा उन्हें खास बनती हैं. इसलिए यहां सावन के महिने में भक्तों की सबसे ज्यादा भीड़ उमड़ती हैं. वैसे तो जयपुर में कई प्राचीन शिव मंदिर हैं लेकिन इनमें सबसे प्राचीन भूतेश्वर महादेव, झारखंड महादेव, ताड़केश्वर महादेव, रोजगारेश्वर महादेव सहित कई शिवालय हैं. जहां भक्तों की सबसे अधिक मान्यता हैं.
जयपुर के कुछ शिव मंदिरों का इतिहास आज भी रहस्यमय हैं. ऐसा ही जयपुर के नजदीक कस्बे आमेर की पहाड़ियों और घने जंगल में स्थित भूतेश्वर महादेव मंदिर जहां इस अनोखे मंदिर की बनावट तो 17 वीं शताब्दी के मंडप और गुंबद से मिलती जुलती हैं, भूतेश्वर महादेव मंदिर इतने घने जंगलों के बीच बना हैं कि वहा तक पहुंचने में भी भक्तों को परेशानी होने लगती हैं, रात के समय इस मंदिर में कोई नहीं रूकता क्योंकि रात के समय यहां का दृश्य भयभीत करने वाला हो जाता हैं, इसलिए ही इस मंदिर का नाम भूतेश्वर महादेव पड़ा हैं.
भूतेश्वर महादेव मंदिर कितना पुराना हैं और किसने इसका निर्माण करवाया इस प्रकार की कोई जानकारी अभी तक पता नहीं चली हैं, क्योंकि यह मंदिर ऐसी जगह पर बना हुआ हैं. जहां दूर-दूर तक कोई घर या कोई स्थान नहीं जहां लोग रहते हो, लेकिन अब इस मंदिर में शिवरात्रि और श्रावण मास के महिने में यहां हजारों की संख्या में लोग आते हैं. इस मंदिर के बारे में कहां जाना हैं कि एक बार एक संत यहां आए और इस मंदिर में उन्होंने पूजा की, उसके बाद संत ने यहां अपनी जिंदा समाधि ली थी. उनकी समाधि अभी भी मंदिर के पास स्थित हैं.
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जयपुर के चौड़ा रास्ता में स्थित ताड़केश्वर महादेव मंदिर जहां सावन के महिने में भक्तों की सबसे ज्यादा भीड़ उमड़ती हैं. ताड़केश्वर महादेव मंदिर जितना भव्य हैं उतना ही इसका इतिहास हैं, यह मंदिर 16वीं शताब्दी में बना था मंदिर की स्थापत्य कला में खासतौर पर जयपुर की स्थापत्य और स्थानीय संस्कृति की झलक देखने को मिलती है, जिस स्थान पर यह मंदिर बना हुआ है. उस स्थान पर किसी समय श्मशान घाट और भारी संख्या में ताड़ के वृक्ष हुआ करते थे और इसी जगह से भगवान शिव का शिवलिंग स्वयंभूत प्रकट हुआं था.
सभी शिवालयों और मंदिर में भगवान शंकर को पानी और दूध से अभिषेक किया जाता हैं लेकिन ताड़केश्वर महादेव मंदिर में विशेष रूप से 51 किलों घी से भगवान शंकर के ज्योतिलिंग को अभिषेक करने की परम्परा और प्राचीन मान्यता हैं, जो वर्षों से चली आ रही हैं, जो भी भक्त ये यहां शिवलिंग पर घी से अभीषेक करता हैं. भगवान शंकर उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं, इसलिए लोग यहां दूर-दूर से भगवान शंकर का घी से अभिषेक करने के लिए आते हैं.
जयपुर में सभी शिव मंदिर स्थानीय संस्कृति की स्थापत्य कला पर निर्मित हैं, लेकिन झारखंड महादेव मंदिर जयपुर का एकमात्र ऐसा मंदिर हैं. जो दक्षिण भारतीय शैली के तिरुचिरापल्ली मंदिर जैसा दिखता हैं. भगवान शंकर का झाड़खंड महादेव मंदिर जो वैशाली नगर क्विंस रोड पर स्थित है. जहां मंदिर स्थित हैं. इस इलाके को पुराने समय मे प्रेमपुरा नाम से जाना जाता हैं. यह मंदिर लगभग 100 साल पुराना है.
झारखंड महादेव मंदिर के बारे में कहां जाता है कि यहां पर एक समय में बड़ी संख्या में झाड़ियां ही झाड़ियां हुआ करती थी. तो झाड़ियों से झाड़ और खंड पुरे इलाके को मिलाकर इस मंदिर का नाम झाड़खंड महादेव मंदिर पड़ा. अभी भी मंदिर के आसपास झाड़ियां पेड़ पौधे बहुत है और पास में ही आर्मी बटालियन कैंप है. वर्ष 1918 तक यह मंदिर बहुत छोटा और सामान्य तरीके से बना हुआ था बाद में इसका जीर्णोद्धार दक्षिण भारतीय शैली के रूप में किया गया.
जयपुर से 50 किलोमीटर दूर स्थित बांसखो गांव के पास अरावली पर्वत श्रृंखला की पहाड़ियों और घने जंगल के बीच स्थित भगवान शंकर का 700 वर्ष पुराना मंदिर जो नईनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध धार्मिक स्थल हैं. जिसका इतिहास ही उसकी खास पहचान हैं। नईनाथ मंदिर के निर्माण की कहानी 700 साल पुरानी है और जिसका संबंध बांसखो के राजा और रानी से जुडी हैं. इस मंदिर में स्थित वर्षों पहले शिवलिंग स्वयंभू प्रकट हुई था, जिसके बाद वर्षों से यहां लोग दर्शन के लिए आ रहे हैं.
नईनाथ मंदिर का इतिहास और नामकरण एक राजा की कहानी के साथ जुड़ा हुआ हैं, मंदिर के पास स्थित बांसखो में एक राजा हुए थे, जिन्होंने तीन रानियों से शादी की थी, विवाह पश्चात इन तीनों रानियों को लम्बे समय तक कोई संतान नहीं हुई, तब यहां पास ही जंगल में रहने वाले बालवनाथ बाबा ने शिव मंदिर में पूजा करने की सलाह रानियों को दी, तीनों रानियों में से सबसे छोटी ने इस सलाह पर अमल किया और उन्हें संतान प्राप्ति हुई इसके बाद से यह मंदिर संतान प्राप्ति की खास मान्यता के लिए प्रसिद्ध हैं.
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August 20, 2026, 13:27 IST



