Rajasthan

नाम बदलने पर क्यों मचा है बवाल? 16वीं सदी में हुई थी इस्लामपुर गांव की स्थापना

झुंझुनूं. राजस्थान के शेखावाटी अंचल का ऐतिहासिक गांव ‘इस्लामपुर’ इन दिनों अपनी सदियों पुरानी पहचान को बचाए रखने के संघर्ष का गवाह बना है. स्थानीय भाजपा विधायक राजेंद्र भाम्बू की अनुशंसा पर इस ऐतिहासिक गांव का नाम बदलकर ‘श्रीरामपुर’ करने के सरकारी प्रस्ताव ने एक बड़ा विवाद खडा़ कर दिया है. पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा के नेतृत्व में 15 किलोमीटर की लंबी पदयात्रा और कलेक्ट्रेट पर हजारों ग्रामीणों के उग्र प्रदर्शन ने इस प्रशासनिक कवायद को सीधे तौर पर जन-भावनाओं के सामने ला खड़ा किया है.

लेकिन सवाल उठता है कि आखिर इस गांव का नाम बदलने पर इतना बड़ा बवाल क्यों मचा है? इसका जवाब छिपा है इस्लामपुर के 16वीं सदी के गौरवशाली और सांप्रदायिक बेमिसाल इतिहास में.

16वीं सदी में नवाब कायमखानी ने बसाया था ‘इस्लामपुर’इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि इस्लामपुर कोई नया बसाया हुआ कस्बा नहीं है, बल्कि इसका इतिहास करीब 450 साल पुराना है. 16वीं सदी के उत्तरार्ध में इस क्षेत्र की स्थापना तत्कालीन नवाब कायमखानी शासकों द्वारा की गई थी. शेखावाटी क्षेत्र का यह ऐतिहासिक गांव अपनी स्थापना के समय से ही प्रसिद्ध व्यापारिक मार्गों का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है. व्यापार और आवागमन की सुविधाओं के कारण यहां विभिन्न समुदायों के लोगों का आगमन होता रहा, जिसने इसकी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध बनाया. नवाबों के शासनकाल में यहां केवल मुस्लिम समाज ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में हिंदू व्यापारी, शिल्पकार और किसान भी आकर बसे. समय के साथ यह गांव विविध संस्कृतियों, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों के संगम के रूप में विकसित हुआ. यही कारण है कि यहां गंगा-जमुनी तहजीब की मजबूत नींव पड़ी, जो आज भी लोगों के जीवन और आपसी संबंधों में दिखाई देती है.

सदियों पुरानी इस साझा सांस्कृतिक विरासत ने गांव को भाईचारे, सौहार्द और सामाजिक एकता की मिसाल बनाया है. विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग यहां लंबे समय से एक साथ रहते आए हैं, जिससे यह गांव सामाजिक और सांस्कृतिक का प्रतीक बन गया है.

पुराने दस्तावेजों में ‘इस्लामपुर’ ही एकमात्र पहचानआंदोलनकारियों और इस्लामपुर संघर्ष समिति के संरक्षक व सरपंच आमिन मनियार ने जिला कलेक्टर को जो सदियों पुराने सरकारी और राजस्व दस्तावेज सौंपे हैं, वे इस गांव के ऐतिहासिक अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण हैं. “रियासत काल से लेकर ब्रिटिश हुकूमत और आज़ाद भारत के भूमि बंदोबस्त के तमाम रिकॉर्ड्स में इस जगह का नाम सिर्फ ‘इस्लामपुर’ ही दर्ज है. इतिहास में कभी भी इस गांव का कोई दूसरा नाम नहीं रहा.” – संघर्ष समिति दस्तावेज. ग्रामीणों का तर्क है कि साढ़े चार सौ साल पुरानी इस ऐतिहासिक पहचान को एक राजनीतिक पत्र के आधार पर अचानक बदल देना उनके पुरखों की विरासत का अपमान है.

नाम बदलने की राजनीति पर क्यों भड़के हैं ग्रामीण?आरएलपी जिलाध्यक्ष राजेंद्र फौजी और स्थानीय नेताओं का कहना है कि झुंझुनूं वीरों और देश के लिए मर-मिटने वाले शहीदों की भूमि है. इस मिट्टी में हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समाजों के बेटों ने देश की सीमाओं पर अपनी शहादत दी है. ग्रामीणों का कहना है कि गांव का नाम बदलना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा संवेदनशील विषय है. उनका मानना है कि वर्षों से चली आ रही पहचान और गौरवशाली विरासत को अचानक बदलने से गांव के इतिहास को ठेस पहुंचेगी. साथ ही नाम परिवर्तन का सीधा असर हजारों लोगों के दैनिक जीवन पर पड़ेगा. जमीन के पट्टों, आधार कार्ड, पैन कार्ड, पासपोर्ट, बैंक खातों और राजस्व रिकॉर्ड सहित अनेक सरकारी एवं निजी दस्तावेजों में बदलाव की जटिल प्रक्रिया से ग्रामीणों को गुजरना पड़ेगा, जिससे उन्हें लंबे समय तक परेशानी और आर्थिक बोझ का सामना करना पड़ सकता है.

आंदोलनकारियों का आरोप है कि सरकार बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय नाम परिवर्तन जैसे विवादित विषयों को आगे बढ़ा रही है. उनका कहना है कि जनता की वास्तविक समस्याओं के समाधान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, न कि ऐसे फैसलों को जो सामाजिक विवाद को बढ़ावा दें.

अब किस दिशा में जाएगा यह आंदोलन?इस्लामपुर नाम परिवर्तन विवाद का अगला चरण प्रशासनिक जांच और राजनीतिक निर्णयों पर निर्भर करेगा. जिला कलेक्टर के निर्देश पर राजस्व विभाग की विशेष टीम गांव के ऐतिहासिक, राजस्व और प्रशासनिक रिकॉर्ड की गहन जांच करेगी. यदि पुराने सरकारी दस्तावेजों और रिकॉर्ड में सदियों से गांव का नाम इस्लामपुर दर्ज पाया जाता है, तो प्रशासन उसी आधार पर अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजेगा, जिससे नाम परिवर्तन के प्रस्ताव पर पुनर्विचार की स्थिति बन सकती है. वहीं इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है. यदि जांच रिपोर्ट ग्रामीणों के पक्ष में आती है तो नाम परिवर्तन की मांग करने वाले पक्ष को झटका लग सकता है. दूसरी ओर, यदि सरकार नाम बदलने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाती है, तो आंदोलन और तेज होने की संभावना है. ग्रामीणों और आंदोलन के नेताओं ने पहले ही बेमियादी धरने और व्यापक जन आंदोलन की चेतावनी दी है.

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