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World War | विश्व इतिहास का वो पन्ना जो पाली में दफ्न है… सुमेरपुर की 149 कब्रें और शिलालेख बयां कर रहे हैं प्रथम विश्व युद्ध की अनकही दास्तां

Last Updated:June 30, 2026, 13:59 IST

Pali News : पाली के सुमेरपुर में प्रथम विश्व युद्ध के 149 तुर्की सैनिकों का कब्रिस्तान आज भी इतिहास की गवाही देता है, जर्मन दूतावास निगरानी और संरक्षण में जुड़ा है. यह कहानी 4 अगस्त 1914 से शुरू होती है, जब जर्मनी और इंग्लैंड के बीच प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया. इस युद्ध में तत्कालीन जोधपुर रियासत के महाराजा सुमेर सिंह और उनके अभिभावक सर प्रताप सिंह ब्रिटिश सरकार की सहायता के लिए अपनी प्रसिद्ध जोधपुर रिसाला सेना लेकर विशेष ट्रेनों से लंदन रवाना हुए.

पाली. इतिहास सिर्फ किताबों के पन्नों में ही दर्ज नहीं होता, कई बार वह पत्थरों पर उकेरी गई इबारतों में भी जिंदा रहता है. कुछ ऐसा ही इतिहास समेटे हुए है पाली जिले का सुमेरपुर कस्बा. यहां स्थित एक कब्रिस्तान, जिसे आम लोग शायद एक साधारण कब्रिस्तान समझकर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन वास्तव में यह विश्व इतिहास का एक अहम अध्याय समेटे हुए है. यहां मौजूद 149 कब्रें और उन पर लगे शिलालेख आज भी प्रथम विश्व युद्ध की यादों और उन जांबाज सैनिकों की कहानी बयां करते हैं. शायद ही किसी ने सोचा होगा कि राजस्थान के पाली जिले का छोटा सा कस्बा सुमेरपुर भी कभी प्रथम विश्व युद्ध के इतिहास से जुड़ा रहा होगा.

दरअसल, जर्मनी, इंग्लैंड और तुर्की के बीच हजारों किलोमीटर दूर लड़ी गई जंग की गूंज राजस्थान की इस धरती तक भी पहुंची थी. सुमेरपुर की फ्रेंड्स कॉलोनी में आज भी 149 तुर्की सैनिकों की कब्रें मौजूद हैं, जो एक सदी पुराने इतिहास की गवाही देती हैं. आज भले ही पाली जिला व्यापार और शांति के लिए जाना जाता हो, लेकिन देश की आजादी से पहले यह इलाका पश्चिमी देशों के लिए भी विशेष महत्व रखता था.

4 अगस्त 1914 से शुरू हुई कहानीयह कहानी 4 अगस्त 1914 से शुरू होती है, जब जर्मनी और इंग्लैंड के बीच प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया. इस युद्ध में तत्कालीन जोधपुर रियासत के महाराजा सुमेर सिंह और उनके अभिभावक सर प्रताप सिंह ब्रिटिश सरकार की सहायता के लिए अपनी प्रसिद्ध जोधपुर रिसाला सेना लेकर विशेष ट्रेनों से लंदन रवाना हुए. ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम महाराजा की वीरता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने महज 16 वर्ष की उम्र में उन्हें ब्रिटिश सेना में ऑनरेरी लेफ्टिनेंट की उपाधि प्रदान की.

उंदरी गांव से बना सुमेरपुरप्रथम विश्व युद्ध में तुर्की ने जर्मनी का साथ दिया था. युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना ने बड़ी संख्या में तुर्की सैनिकों को युद्धबंदी बना लिया. इन कैदियों को भारत लाकर पहले जोधपुर की सेंट्रल जेल में रखा गया, लेकिन बाद में उन्हें सुरक्षित और दूरस्थ स्थान पर भेजने की योजना बनाई गई. इसके लिए जोधपुर रियासत ने उस समय के उंदरी गांव का चयन किया. स्थानीय लोगों को उस दौर में 1 लाख 57 हजार 76 रुपये का मुआवजा देकर दूसरी जगह बसाया गया. इसके बाद महाराजा सुमेर सिंह के नाम पर इस स्थान का नाम सुमेरपुर रखा गया. यहीं एक अस्थायी जेल बनाई गई, जहां तुर्की के युद्धबंदियों को रखा गया.

149 कब्रें आज भी सुनाती हैं इतिहाससाल 1915 में तुर्की के युद्धबंदियों को सुमेरपुर लाया गया. समय बीतने के साथ मौसम, बीमारी और कठिन परिस्थितियों के कारण कई कैदियों की मौत होने लगी. सितंबर 1918 तक कुल 149 तुर्की सैनिकों का निधन हो गया, जिन्हें सुमेरपुर की इसी भूमि में दफनाया गया. आज कोलीवाड़ा रोड स्थित शांति नगर की फ्रेंड्स कॉलोनी में यह कब्रिस्तान मौजूद है. यहां प्रत्येक कब्र पर शिलालेख लगाया गया है, जिसमें सैनिक का नाम, उसकी बटालियन और मृत्यु की तारीख दर्ज है. झाड़ियों के बीच मौजूद ये कब्रें आज भी उस दौर की भयावह यादों को संजोए हुए हैं.

जर्मन दूतावास भी रखता है निगरानीयह ऐतिहासिक स्थल भले ही स्थानीय स्तर पर ज्यादा चर्चित न हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसका विशेष महत्व माना जाता है. इन कब्रों और शिलालेखों के संरक्षण तथा उनसे जुड़ी जानकारी का रिकॉर्ड नई दिल्ली स्थित जर्मन दूतावास के पास भी मौजूद है. जर्मन दूतावास का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल यहां का दौरा भी कर चुका है. सरकार ने इस कब्रिस्तान के चारों ओर पक्की चारदीवारी और प्रवेश द्वार का निर्माण भी कराया है. हाल के वर्षों में जब तुर्की के भारत विरोधी रुख के बाद देशभर में ‘बॉयकॉट तुर्की’ की चर्चा हुई थी, तब सुमेरपुर का यह कब्रिस्तान भी एक बार फिर सुर्खियों में आया. यह स्थान आज भी इस बात का प्रतीक है कि युद्ध और दुश्मनी के दौर में भी राजस्थान की इस धरती ने विदेशी सैनिकों को सम्मानपूर्वक अपनी गोद में जगह दी.

About the AuthorAnand Pandey

आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें

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