ढाई सेंटीमीटर की राधा रानी, साल में सिर्फ 60 मिनट दर्शन का मौका, सूक्ष्मदर्शी से देखते हैं भक्त

Last Updated:September 19, 2026, 17:34 IST
Sikar Hindi News: सीकर जिले के खंडेला में बिहारीजी मंदिर में 600 साल पुरानी राधाजी की 2.5 सेंटीमीटर की सूक्ष्म प्रतिमा है, जिसके दर्शन साल में सिर्फ एक घंटे के लिए सूक्ष्मदर्शी से कराए जाते हैं. यह परंपरा आस्था और इतिहास से जुड़ी है, जिसमें कृष्ण भक्त करमैती बाई की कहानी भी शामिल है.
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Ajab Gajab: सीकर जिले के खंडेला में आस्था और इतिहास से जुड़ी एक ऐसी अनोखी परंपरा है, जिसके बारे में जानकर हर कोई हैरान रह जाता है. यहां मौजूद बिहारीजी मंदिर पूरे देश में अपना विशेष स्थान रखता है. इस मंदिर में भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर के जैसी ही है. इसके अलावा इस मंदिर में राधाजी का करीब 600 साल पुराना ऐसा सूक्ष्म विग्रह विराजमान है, जिसकी ऊंचाई महज 2.5 सेंटीमीटर है. राधा जी की प्रतिमा इतनी छोटी है कि सामान्य आंखों से इसके दर्शन करना मुश्किल है.
इस मंदिर की एक और खास बात यह है कि यहां पर राधा जी के इस विग्रह के दर्शन साल में केवल एक ही दिन होते हैं, वो भी केवल एक घंटे के लिए. भक्तों को सूक्ष्मदर्शी यंत्र के माध्यम से इस नन्हीं राधा के दर्शन कराए जाते हैं. राधा रानी के इस स्वरूप को दर्शन करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पर पहुंचते हैं. मंदिर पुजारी बिहारी लाल पारीक ने बताया कि शनिवार को राधा अष्टमी के अवसर पर सुबह 10 बजे से 11 बजे तक सभामंडप में सूक्ष्मदर्शी यंत्र के माध्यम से हजारों श्रद्धालुओं ने इस बार राधाजी के इस दुर्लभ विग्रह के दर्शन किए हैं.
साल में दो बार बार होते हैं खास आयोजनउन्होंने बताया कि मंदिर में विशेष अभिषेक और पूजन के साथ राधाजी का जन्मोत्सव भी मनाया गया. उन्होंने बताया कि कृष्ण जन्माष्टमी और राधा जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर में विशेष आयोजन होते हैं. कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर ठाकुर जी का जड़ी बूटियां से स्नान करवाया जाता है इसके अलावा राधा अष्टमी पर राधाजी के विग्रह के दर्शन करवाए जाते हैं.
शेखावाटी की मीरा करमैती बाई से जुड़ी कहानीइस छोटे से विग्रह के पीछे करीब छह शताब्दी पुरानी भक्ति की कहानी बताई जाती है. मंदिर के पुजारी के अनुसार इसका संबंध कृष्ण भक्त करमैती बाई से है, जिन्हें शेखावाटी की मीरा भी कहा जाता है. भक्तमाल ग्रंथ में करमैती बाई की कृष्ण भक्ति का उल्लेख मिलता है. मान्यता है कि विवाह के बाद गौने की पहली रात ही करमैती बाई सांसारिक जीवन छोड़कर पैदल वृंदावन चली गई थीं. वहां उन्हें भगवान श्रीकृष्ण ने संत के रूप में दर्शन दिए और भोजन करवाया. जब उनके पिता और पुरोहित परशुराम उन्हें वापस लेने वृंदावन पहुंचे तो करमैती बाई ने लौटने से इनकार कर दिया.
कहा जाता है कि उन्होंने यमुना नदी से श्रीकृष्ण का विग्रह प्राप्त कर अपने पिता को सौंपा और उन्हें कृष्ण भक्ति का मार्ग बताया. पुजारी के अनुसार, इसी परंपरा में उन्होंने राधाजी का यह सूक्ष्म विग्रह भी पिता को दिया था. बाद में श्रीकृष्ण और राधाजी के विग्रह खंडेला के बिहारीजी मंदिर से जुड़े और तभी से इनकी पूजा की परंपरा चली आ रही है.
करमैती बाई की भक्ति से राजा भी हुए प्रभावितकरमैती बाई के पिता तत्कालीन शेखावत राजा के पुरोहित बताए जाते हैं. करमैती बाई की कृष्ण भक्ति और उनके उपदेशों से प्रभावित होकर पिता स्वयं कृष्ण भक्ति में लीन रहने लगे. जब इसकी जानकारी राजा को हुई तो वे उनसे मिलने वृंदावन पहुंचे. मान्यता है कि यमुना किनारे कृष्ण-वियोग में करमैती बाई की भक्ति देखकर राजा भी भावविभोर हो गए. उनके आग्रह पर ब्रह्मकुंड के पास करमैती बाई के लिए कुटिया बनवाई गई. इसके बाद राजा भी कृष्ण भक्ति में रम गए। आज उसी परंपरा की एक अनोखी निशानी खंडेला के बिहारीजी मंदिर में मौजूद है. ढाई सेंटीमीटर की राधाजी, 600 साल पुरानी आस्था और साल में सिर्फ एक घंटे दर्शन राधाष्टमी पर यह दृश्य अपने आप में अनूठा बन जाता है.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
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Sikar,Rajasthan
First Published :
September 19, 2026, 17:34 IST



