मरीज के फेफड़े में धंसा था कैंसर, सांस नली तक फैला, डॉक्टरों ने इस तकनीक से बचाया लंग का हेल्दी हिस्सा

फेफड़े में कैंसर होने पर सांस लेने की क्षमता प्रभावित हो जाती है. आमतौर पर इसकी सर्जरी के दौरान पूरे फेफड़े को ही निकालने की जरूरत पड़ती है, लेकिन चिकित्सा की नई तकनीकों ने इलाज के साथ-साथ जिंदगी भी आसान कर दी है. हाल ही में केन्या से आए एक मरीज के फेफड़े में दुर्लभ कैंसर था, जिसका न केवल भारत में बेहतरीन इलाज किया गया बल्कि उसके फेफड़े के स्वस्थ बचे हिस्से को भी बचा लिया गया.
बता दें कि केन्या के 38 वर्षीय मरीज के फेफड़ों में दुर्लभ कैंसर था, जिसकी भारत में जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक की गई है. इस सर्जरी में डबल-स्लीव लेफ्ट अपर लोबेक्टॉमी नाम की विशेष तकनीक का इस्तेमाल किया गया था. करीब सात घंटे चली इस सर्जरी में डॉक्टरों ने ट्यूमर के साथ सांस की नली और एक प्रमुख रक्त वाहिका के प्रभावित हिस्सों को भी निकाला. हालांकि इस दौरान बाएं फेफड़े के निचले हिस्से को सुरक्षित रखा गया और पूरे फेफड़े को निकालने की जरूरत नहीं पड़ी.जिससे मरीज अब खुलकर सांस ले रहा है.
कौन सा दुर्लभ कैंसर था? मोहम्मद यूनिस गुलिये को एडेनॉइड सिस्टिक कार्सिनोमा नामक दुर्लभ कैंसर हुआ था. यह कैंसर आमतौर पर ग्रंथियों के ऊतकों (ग्लैंडुलर टिश्यू) में होता है, खासकर सिर और गर्दन की लार बनाने वाली ग्रंथियों (सलाइवा ग्लैंड) में. मरीज के बाएं फेफड़े के ऊपरी हिस्से में गहराई में ट्यूमर धंसा था जो सांस की मुख्य नली और फेफड़े को खून पहुंचाने वाली एक प्रमुख रक्त वाहिका तक फैल गया था. ऐसे में मरीज को लंबे समय से छाती के बाईं ओर दर्द हो रहा था और कभी-कभी खांसी के साथ खून भी आ जाता था.
मरीज ने बताया कि उसने केन्या में कई डॉक्टरों को दिखाया लेकिन वहां ट्यूमर की गंभीर स्थिति को देखते हुए उसकी सटीक प्रकृति का पता नहीं लगाया जा सका. लिहाजा उन्होंने भारत में इलाज कराने का फैसला किया. इसके लिए कई अस्पतालों के बारे में जानकारी करने के बाद वे मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, साकेत आए.
मरीज की हुई डबल स्लीव लोबेक्टॉमी यहां अस्पताल में दोबारा हुई जांचों में पता चला कि ट्यूमर काफी जटिल था और सांस की नली व रक्त वाहिकाओं तक फैल गया था. ट्यूमर इतनी ज्यादा जगह पर फैल गया था कि सामान्य सर्जरी में पूरा बायां फेफड़ा निकालना पड़ सकता था, जिससे मरीज की सांस लेने की क्षमता काफी कम हो जाती. इससे बचने और फेफड़े के स्वस्थ हिस्से को सुरक्षित रखने के लिए डॉक्टरों की टीम ने डबल-स्लीव लोबेक्टॉमी सर्जरी करने का फैसला किया.
लिहाजा डॉ कामरान अली, एसोसिएट डायरेक्टर, थोरैसिक सर्जरी एंड लंग ट्रांसप्लांट की देखरेख में डॉक्टरों की टीम ने सर्जरी की और प्रभावित ऊपरी लोब को वायुमार्ग और रक्त वाहिका के संबंधित हिस्सों के साथ हटाया गया. इसके बाद दोनों संरचनाओं को पहले तरह ही सावधानीपूर्वक बना दिया गया. ताकि बाएं फेफड़े के शेष निचले लोब तक हवा और रक्त का प्रवाह बहाल हो सके.
डॉ अली ने बताया कि सबसे बड़ी चुनौती ट्यूमर को पूरी तरह निकालने के साथ-साथ फेफड़े के अधिक से अधिक स्वस्थ और काम करने वाले हिस्से को सुरक्षित रखना था. चूंकि ट्यूमर सांस की मुख्य नली और एक प्रमुख रक्त वाहिका तक फैल गया था, इसलिए फेफड़े के ऊपरी हिस्से को निकालने के बाद इन दोनों हिस्सों को सावधानीपूर्वक दोबारा जोड़ना जरूरी था. इस तकनीक की मदद से हम बाएं फेफड़े के पूरे निचले हिस्से को सुरक्षित रख सके और पूरा फेफड़ा निकालने की जरूरत नहीं पड़ी.
सर्जरी लगभग सात घंटे चली और मरीज़ को प्रक्रिया के पांच दिनों के भीतर अस्पताल से छुट्टी दे दी गई.
क्या है डबल स्लीव लोबेक्टॉमी
उन्होंने बताया कि डबल-स्लीव लोबेक्टॉमी एक विशेष सर्जरी है, जिसमें फेफड़े के ट्यूमर से प्रभावित हिस्से को निकालने के साथ-साथ सांस की नली और एक प्रमुख रक्त वाहिका को भी दोबारा जोड़ा जाता है. सही मरीजों में यह सर्जरी पूरा फेफड़ा निकालने के बजाय एक बेहतर विकल्प हो सकती है. फेफड़े के अधिक काम करने वाले हिस्से को सुरक्षित रखने से सांस लेने की क्षमता बनाए रखने में मदद मिलती है. साथ ही, इस तकनीक से डॉक्टर उन जटिल ट्यूमर का भी इलाज कर सकते हैं, जो फेफड़े के महत्वपूर्ण हिस्सों तक फैल गए हों.



