Rajasthan

20 साल पहले पिता, अब बेटा… MBS अस्पताल की इस कुर्सी की कहानी आपको भावुक कर देगी

Last Updated:July 08, 2026, 12:39 IST

Kota News: कोटा के MBS अस्पताल में इतिहास दोहराया गया है. डॉ. राकेश सिंह ने अस्पताल के अधीक्षक पद का कार्यभार संभाला है, जिस कुर्सी पर 20 साल पहले उनके पिता डॉ. रामपाल बैठकर सेवाएं देते थे. राकेश सिंह इसे सेवा का अवसर मानते हैं और अपने पिता के संस्कारों को अपना मार्गदर्शन बताते हैं. उनका कहना है कि पद का मतलब गुरूर नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है. वे मरीजों की समस्याओं को हल करना अपनी प्राथमिकता मानते हैं और युवाओं को मन, वचन और कर्म में शुद्धता रखने की सीख देते हैं.

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Kota: कोटा के सबसे बड़े महाराव भीमसिंह (MBS) अस्पताल में एक बेहद खूबसूरत और भावुक कर देने वाला वाक्या सामने आया है. अस्पताल के अधीक्षक पद पर अब पिता की जगह उनके बेटे ने कमान संभाल ली है. ठीक 20 साल पहले इसी रसूखदार कुर्सी पर शहर के जाने-माने वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. रामपाल बैठकर मरीजों की सेवा किया करते थे. आज उनका बेटा डॉ. राकेश सिंह ठीक उसी सरकारी कुर्सी पर बैठकर पिता की विरासत और लोक-सेवा के संस्कारों को आगे बढ़ा रहा है.

एमबीएस अस्पताल के पैथोलॉजी विभाग में सीनियर प्रोफेसर के तौर पर लंबे समय से सेवाएं दे रहे डॉ. राकेश सिंह को जब हाल ही में अस्पताल के नए अधीक्षक पद की बड़ी जिम्मेदारी मिली, तो उन्होंने इसे बेहद सादगी से स्वीकार किया. लोकल 18 से खास बातचीत में डॉ. राकेश सिंह ने कहा कि यह एक सरकारी प्रक्रिया है, जहां आप काम करते हुए सीनियर होते हैं और आपको जिम्मेदारियां मिलती हैं. लेकिन हां, जब लोग आपके पास बड़ी उम्मीदें लेकर आते हैं, तो उन उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए हमें और ज्यादा मेहनत करनी होती है.

पिता डॉ. रामपाल ने हमेशा दिया ‘फ्री हैंड’पुराने दिनों को याद करते हुए नए अधीक्षक डॉ. राकेश सिंह ने बताया कि उनके पिता डॉ. रामपाल ने कभी उन पर अपनी इच्छाएं या फैसले नहीं थोपे. उनकी पर्सनैलिटी की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि उन्होंने हमेशा बच्चों को ‘फ्री हैंड’ दिया. वे हर फैसले के अच्छे और बुरे दोनों पहलुओं को समझा देते थे और अंतिम निर्णय बच्चों पर छोड़ देते थे. अधीक्षक पद की जॉइनिंग के जब सरकारी कागज घर आए, तो पिता ने कोई तामझाम या बड़ा जश्न मनाने के बजाय सिर्फ एक ही गुरुमंत्र दिया— “ठीक है, जाओ और अच्छे से काम करो.”

‘कुर्सी का गुरूर नहीं, नैतिक जिम्मेदारी का अहसास’डॉ. राकेश सिंह के मुताबिक, उनके पिता का हमेशा से एक ही मूल मंत्र रहा है कि कोई भी व्यक्ति अगर आपके पास अपनी समस्या लेकर आता है, तो उसका समाधान करने के लिए आपको भरपूर प्रयास करना चाहिए. डॉ. राकेश सिंह ने बातचीत में कहा कि जब आप ऐसे बड़े पदों पर बैठते हैं, तो लोग इसी आस में आते हैं कि उनकी तकलीफ दूर होगी. सच तो ये है कि ये कुर्सियां और ये पद बने ही लोगों की समस्याओं को दूर करने के लिए हैं. यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है.

युवाओं को संदेश: मन, वचन और कर्म रखें साफमरीजों के हित को सर्वोपरि रखने वाले नए अधीक्षक का मानना है कि जिंदगी में कुछ भी कठिन नहीं होता, बशर्ते आप दिल से काम करें. युवाओं को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि इंसान को हमेशा अपने मन, वचन और कर्म तीनों को साफ और अच्छा रखना चाहिए और लगातार दूसरों के भले के बारे में सोचना चाहिए. आज कोटा के एमबीएस अस्पताल की यह कुर्सी न सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव की गवाह बनी है, बल्कि एक पिता की सीख और बेटे के समर्पण की अनूठी मिसाल पेश कर रही है.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें

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