जोधपुर में तांगा सवारी का अंत

Last Updated:April 19, 2026, 08:46 IST
Declining Tonga Tradition in Jodhpur News: जोधपुर में कभी यातायात की मुख्य कड़ी रहे 3000 तांगे अब घटकर मात्र 19 रह गए हैं. ऑटो और ई-रिक्शा के दौर में तांगा चालकों की रोजाना की कमाई 500 रुपये तक सिमट गई है, जिसमें से 400 रुपये घोड़े की खुराक में चले जाते हैं. आर्थिक तंगी के कारण नई पीढ़ी इस पुश्तैनी काम को छोड़ रही है. हालांकि, नई सड़क पर आज भी बच्चे ‘घोड़े वाले अंकल’ की सवारी के लिए लालायित रहते हैं. विरासत को बचाने के लिए अब सरकार से मदद की उम्मीद की जा रही है.
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Declining Tonga Tradition in Jodhpur News: सूर्य नगरी जोधपुर की पहचान कभी यहाँ की तंग गलियों और चौड़ी सड़कों पर दौड़ने वाले तांगों से होती थी. करीब 40 साल पहले तक जोधपुर में तांगा ही परिवहन का सबसे खास और पसंदीदा साधन माना जाता था. उस दौर में टैक्सियाँ बेहद कम थीं और लगभग ढाई से तीन हजार तांगे पूरे शहर की धड़कन हुआ करते थे. लेकिन आज समय का चक्र ऐसा घूमा है कि इन तांगों की संख्या घटकर मात्र 19 रह गई है. तांगा चलाने वाले अनवर और साबिर खान जैसे लोग अब अपनी चौथी और पांचवीं पीढ़ी के आखिरी वारिस नजर आ रहे हैं. उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि नई पीढ़ी अब इस पुश्तैनी काम से मुंह मोड़ रही है, जिससे इस ऐतिहासिक सवारी के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है.
तांगा व्यवसाय के पतन का सबसे बड़ा कारण ई-रिक्शा और टैक्सियों की बढ़ती संख्या है. तांगा चालकों का दर्द है कि लोग ऑटो या टैक्सी वालों को खुशी-खुशी 100 से 150 रुपये किराया दे देते हैं, लेकिन तांगे की सवारी के लिए आज भी महज 10 रुपये ही मिलते हैं. दिन भर की कड़ी मशक्कत के बाद तांगे वाले मुश्किल से 500 रुपये कमा पाते हैं. इस कमाई का बड़ा हिस्सा यानी करीब 400 रुपये घोड़े के दाने और रखरखाव में ही खर्च हो जाता है. मुनाफे के नाम पर हाथ में कुछ नहीं बचता, जिससे परिवार पालना दूभर हो गया है. इसके अलावा अब शहर में तांगे खड़े करने के लिए भी पर्याप्त जगह नहीं मिल रही है.
बच्चों की जिद और तांगे की आखिरी उम्मीदभले ही बड़े लोग तेज रफ्तार टैक्सियों को चुन रहे हों, लेकिन जोधपुर की नई सड़क पर आज भी बच्चों के लिए ‘घोड़े वाले अंकल’ किसी सुपरहीरो से कम नहीं हैं. अनवर बताते हैं कि जब पेरेंट्स शॉपिंग के लिए आते हैं, तो बच्चे तांगा देखते ही उसमें बैठने की जिद करने लगते हैं. कई बार बच्चों के रोने और मचलने पर माता-पिता उन्हें कुछ देर की सैर कराने को मजबूर हो जाते हैं. तांगे की अगली सीट पर बैठकर घोड़े के साथ नजदीकी महसूस करना बच्चों को एक अलग ही रोमांच देता है. बच्चों के चेहरों पर आने वाली यही खुशी इस मरती हुई परंपरा की आखिरी उम्मीद बनी हुई है.
सरकार से मदद की गुहारसाबिर खान बताते हैं कि एक दौर वह भी था जब रेलवे स्टेशन के बाहर दूर-दूर तक सिर्फ तांगे ही नजर आते थे. यह ‘दरबार की सवारी’ जोधपुर की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है. तांगा चालकों का मानना है कि यदि सरकार इस विरासत को बचाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाती या उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान नहीं करती, तो अगले कुछ वर्षों में जोधपुर की सड़कों से घोड़े की टापों की आवाज हमेशा के लिए खामोश हो जाएगी.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content…और पढ़ें
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Location :
Jodhpur,Jodhpur,Rajasthan
First Published :
April 19, 2026, 08:46 IST



