Rajasthan

मोबाइल और इंटरनेट के दौर में भी जिंदा है राजस्थान की कठपुतली कला! उदयपुर में लोक कला मंडल दे रहा नई पहचान

Last Updated:May 17, 2026, 08:11 IST

Kathputli Kala Udaipur: लोक कला मंडल उदयपुर में बदल आधुनिक दौर के बीच राजस्थान की पारंपरिक कठपुतली कला को बचाने और नई पहचान दिलाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है. यहां नियमित कठपुतली शो और विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से नई पीढ़ी को लोक कला से जोड़ा जा रहा है. मोबाइल और डिजिटल मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के कारण यह पारंपरिक कला धीरे-धीरे लोगों से दूर होती जा रही थी, लेकिन लोक कला मंडल के प्रयासों से अब फिर से जागरूकता बढ़ रही है. देश-विदेश से आने वाले पर्यटक भी इन प्रस्तुतियों में रुचि दिखा रहे हैं. प्रशिक्षण शिविरों में बच्चों और युवाओं को कठपुतली संचालन, लोक संगीत और पारंपरिक कहानियों की जानकारी दी जा रही है.

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उदयपुर: आधुनिक दौर में जहां तकनीक और मोबाइल मनोरंजन के नए साधन बन चुके हैं, वहीं भारत की पारंपरिक लोक कलाएं धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही हैं. ऐसी ही एक प्राचीन और आकर्षक कला है कठपुतली कला, जो कभी गांव-गांव और शहर-शहर में मनोरंजन का प्रमुख साधन हुआ करती थी, लेकिन आज यह कला विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी है. इसके बावजूद उदयपुर में स्थित भारतीय लोक कला मंडल इस कला को संजोने और आगे बढ़ाने के प्रयासों में जुटा हुआ है.

पारंपरिक कला की गहरी समझभारतीय लोक कला मंडल के प्रशिक्षक मोहन डांगी ने बताया कि कठपुतली कला केवल एक मनोरंजन नहीं, बल्कि एक बहुत पुराना नाटकीय खेल है, जिसमें कहानी को कठपुतलियों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है. उन्होंने कहा कि समय के साथ लोगों की सोच बदली है और अब इस कला को सिर्फ मनोरंजन का साधन मान लिया गया है, जिसके कारण नई पीढ़ी का इससे जुड़ाव लगातार कम होता जा रहा है.मोहन डांगी के अनुसार, कठपुतली बनाने और उसे संचालित करने की कला बेहद मेहनत और कौशल से भरी हुई है. इसमें कागज की लुगदी और लकड़ी जैसी सामग्री से कठपुतलियां तैयार की जाती हैं.

इसके बाद कलाकार अपने हाथों और धागों की मदद से इन कठपुतलियों को जीवंत रूप देते हैं और मंच पर पूरी कहानी प्रस्तुत करते हैं. यह प्रक्रिया न केवल रचनात्मक है बल्कि इसमें पारंपरिक कला की गहरी समझ भी जरूरी होती है.

सांस्कृतिक धरोहरों से उनका जुड़ाव कमजोरलोक कला मंडल में प्रशिक्षक भगवती माली ने बताया कि आज के समय में कठपुतली कला के प्रति बच्चों और युवाओं की रुचि काफी कम हो गई है. पहले बड़ी संख्या में लोग इस कला को सीखने आते थे, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है. उनका कहना है कि मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में बच्चे ज्यादा समय व्यतीत कर रहे हैं, जिससे हमारी सांस्कृतिक धरोहरों से उनका जुड़ाव कमजोर हो रहा है.

भगवती माली ने  कहा कि अगर समय रहते इस कला को प्रोत्साहन नहीं मिला तो आने वाले वर्षों में यह परंपरा सिर्फ किताबों और संग्रहालयों तक ही सीमित रह जाएगी. उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति को बचाने के लिए जरूरी है कि बच्चों को पारंपरिक कलाओं से जोड़ा जाए और उन्हें इसके महत्व के बारे में समझाया जाए.

इस कला को करीब से देख और समझ सकेंउदयपुर में स्थित लोक कला मंडल द्वारा इस कला को बचाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. यहां न केवल प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए जाते हैं, बल्कि कठपुतली बनाने और उसे चलाने की पूरी प्रक्रिया भी सिखाई जाती है. इसके अलावा यहां रोजाना दो शो भी आयोजित किए जाते हैं, ताकि दर्शक इस कला को करीब से देख और समझ सकें.

इस कला को विदेशी पर्यटक काफी पसंद करतेखास बात यह है कि इस कला को विदेशी पर्यटक काफी पसंद करते हैं. कई बार कठपुतली कार्यक्रमों को विदेशों में आयोजित सांस्कृतिक आयोजनों में भी प्रस्तुत किया जाता है. इसके बावजूद देश में इस कला के प्रति घटती रुचि चिंता का विषय बनी हुई है. ऐसे में लोक कला मंडल का प्रयास है कि कठपुतली कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाकर इसे फिर से जीवंत किया जा सके.

About the AuthorJagriti Dubey

Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें

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