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गांवों में आज भी जिंदा है संस्कृति! अक्षय तृतीया पर खेला जाता है ‘आंधल गेटो’, जानिए इस अनोखी परंपरा का राज

Last Updated:April 19, 2026, 22:40 IST

Akshaya Tritiya 2026: अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर जहां एक ओर पूजा-पाठ और शुभ कार्य किए जाते हैं, वहीं राजस्थान के गांवों में ‘आंधल गेटो’ नामक एक अनोखी परंपरा भी निभाई जाती है। यह पारंपरिक खेल न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि सामाजिक जुड़ाव और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का माध्यम भी है। इस खेल में ग्रामीण लोग एकत्रित होकर लोकगीत गाते हैं, हंसी-मजाक करते हैं और आपसी भाईचारे को मजबूत करते हैं। खासतौर पर युवा और बुजुर्ग मिलकर इस परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। आधुनिक दौर में जहां डिजिटल दुनिया का प्रभाव बढ़ रहा है.

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गांवों में आज भी जिंदा है संस्कृति! अक्षय तृतीया पर खेला जाता है ‘आंधल गेटो’Zoomअक्षय तृतीया पर गांवों में जीवित परंपराएं: ‘आंधल गेटो’

जालौर: अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों में एक खास परंपरा आज भी पूरे उत्साह के साथ निभाई जाती है. यह पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों में सामाजिक एकता, लोक संस्कृति और पारंपरिक जीवनशैली का जीवंत उदाहरण भी बनता है.

इस दिन महिलाओं और युवतियों द्वारा ‘आंधल गेटो खुण-खुणयों लांबी चोटी नारेलो’ नामक पारंपरिक खेल खेला जाता है, जो इस त्योहार की विशेष पहचान बन चुका है. इस खेल में एक महिला की आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है, जिसे ‘आंधल’ कहा जाता है. इसके बाद अन्य महिलाएं उसके चारों ओर घूमते हुए लोकगीत गाती हैं और उसे चकमा देती हैं. ‘आंधल’ बनी महिला केवल आवाज़ के आधार पर अन्य महिलाओं को पकड़ने की कोशिश करती है. खेल के दौरान हंसी-ठिठोली और गीतों की गूंज से पूरा वातावरण खुशनुमा हो जाता है

ये परंपराएं आज भी जीवितयह परंपरा न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि यह आपसी मेलजोल, अपनापन और सामाजिक जुड़ाव को भी मजबूत करती है. खास बात यह है कि इस खेल के जरिए नई पीढ़ी भी अपनी पुरानी परंपराओं और लोक संस्कृति से जुड़ती है, जिससे ये परंपराएं आज भी जीवित हैं.

वहीं, अक्षय तृतीया पर गांवों में सामूहिक रूप से चक्की पर अनाज पीसने की परंपरा भी निभाई जाती है. महिलाएं एक साथ बैठकर अनाज पीसती हैं और इस दौरान पारंपरिक लोकगीत गाती हैं. यह दृश्य गांवों की सादगी, सहयोग और सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाता है.

हमारी सांस्कृतिक विरासत की सबसे बड़ी पहचानग्रामीण महिला सरस्वती बिश्नोई के अनुसार, इस दिन की गई पीसाई को शुभ माना जाता है और इसके आधार पर आने वाली फसल के संकेत भी देखे जाते हैं. यदि अनाज अच्छी तरह पिसता है, तो इसे समृद्धि और अच्छी पैदावार का संकेत माना जाता है.इन्द्रा बिश्नोई बताती हैं कि अक्षय तृतीया का यह पर्व गांवों में परंपराओं, एकता और कृषि संस्कृति का प्रतीक है. आधुनिक दौर में भी इन परंपराओं का जीवित रहना हमारी सांस्कृतिक विरासत की सबसे बड़ी पहचान है.

About the AuthorJagriti Dubey

With more than 6 years above of experience in Digital Media Journalism. Currently I am working as a Content Editor at News 18 in Rajasthan Team. Here, I am covering lifestyle, health, beauty, fashion, religion…और पढ़ें

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Location :

Jalor,Rajasthan

First Published :

April 19, 2026, 22:40 IST

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