Rajasthan

गंगा-जमुनी तहजीब का बेजोड़ नमूना: सैयदानी मां की दरगाह, जहां हिंदू-मुस्लिम मिलकर टेकते हैं माथा!

Last Updated:May 05, 2026, 16:02 IST

Hyderabad News: हैदराबाद के हुसैन सागर किनारे सैयदानी माँ का मकबरा इंडो इस्लामिक वास्तुकला और गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल, आगा खान ट्रस्ट और HMDA ने हाल में संरक्षण किया. इतिहास के जानकार रहीम पाशा बताते हैं कि इस मकबरे का निर्माण छठे निजाम मीर महबूब अली खान के शासनकाल में नवाब अब्दुल हक दिलर जंग ने अपनी मां सैयदानी माँ साहेबा की याद में करवाया था.

हैदराबाद. हुसैन सागर के किनारे टैंक बंड रोड पर स्थित सैयदानी मां का मकबरा आज भी अपनी भव्यता और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करता है. साल 1883 में बनी यह ऐतिहासिक इमारत न केवल अपनी जटिल इंडो-इस्लामिक वास्तुकला के लिए जानी जाती है, बल्कि यह वह स्थान भी है जहां हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों की आस्था एक साथ नजर आती है.

इतिहास के जानकार रहीम पाशा बताते हैं कि इस मकबरे का निर्माण छठे निजाम मीर महबूब अली खान के शासनकाल में नवाब अब्दुल हक दिलर जंग ने अपनी मां सैयदानी माँ साहेबा की याद में करवाया था. नवाब दिलर जंग उस समय के प्रभावशाली व्यक्तियों में गिने जाते थे और निजाम राज्य रेलवे के निदेशक भी रहे. अपनी मां के प्रति सम्मान और प्रेम को व्यक्त करने के लिए उन्होंने इस खूबसूरत संरचना का निर्माण करवाया, जो आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है.

वास्तुकला में दिखता है तीन शैलियों का संगमसैयदानी मां की दरगाह की सबसे बड़ी खासियत इसकी वास्तुकला है. इसमें मुगल, कुतुबशाही और आसफ जाही शैलियों का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है. दरगाह के गुंबद और दीवारों पर की गई स्टुको वर्क की बारीक नक्काशी दूर से देखने पर किसी महीन कपड़े जैसी प्रतीत होती है. यहां की जालीदार खिड़कियां न केवल रोशनी का साधन हैं, बल्कि कला का भी शानदार उदाहरण हैं. हाल ही में आगा खान ट्रस्ट फॉर कल्चर और HMDA ने मिलकर इस इमारत के संरक्षण का काम किया है. इस दौरान परिसर में स्थित पुरानी बावली को भी साफ कर पुनर्जीवित किया गया, जिसमें से करीब 130 टन कचरा निकाला गया.

आस्था का केंद्र, जहां नहीं है कोई भेदभावइस दरगाह की पहचान केवल इसकी इमारत से नहीं, बल्कि यहां आने वाले लोगों की आस्था से भी है. स्थानीय मान्यता है कि सैयदानी माँ के दरबार में आने वाला कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं लौटता. गुरुवार और शुक्रवार को यहां का माहौल खास होता है, जब मुस्लिम समुदाय के साथ-साथ हिंदू परिवार भी पूरी श्रद्धा से चादर और फूल चढ़ाने पहुंचते हैं. यहां किसी तरह का भेदभाव नजर नहीं आता, बल्कि एक ऐसा विश्वास दिखाई देता है जो सभी को जोड़ता है. शहरीकरण और बढ़ते प्रदूषण के बीच सैयदानी माँ की यह दरगाह आज भी शांति, सौहार्द और एकता का संदेश देती है. यह स्थान याद दिलाता है कि हैदराबाद की असली पहचान उसकी गंगा-जमुनी तहजीब में ही बसती है.

About the AuthorAnand Pandey

आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें

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