Supreme Court On Medical College Fee Petition | EWS Student NEET | सुप्रीम कोर्ट ने EWS छात्र की याचिका खारिज की, निजी मेडिकल फीस मान्य

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8 लाख आय, 25 लाख फीस! मेडिकल छात्र की दलील से क्यों असहमत हुआ कोर्ट?
Last Updated:June 24, 2026, 16:07 IST
Supreme Court On EWS Student NEET Medical College Petition: सुप्रीम कोर्ट ने NEET-UG छात्र हर्षवर्धन सिंह की याचिका खारिज की. कोर्ट ने कहा निजी मेडिकल कॉलेजों को सरकारी जैसी कम फीस लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकते. इसके लिए माननीय कोर्ट ने स्कॉलरशिप को विकल्प बताया. याचिका में कहा गया था कि EWS श्रेणी में शामिल होने के लिए परिवार की सालाना आय सीमा अधिकतम 8 लाख रुपये निर्धारित है. दूसरी तरफ निजी मेडिकल कॉलेजों में ट्यूशन फीस 18.9 लाख रुपये से लेकर 25 लाख रुपये सालाना तक है. छात्र की ओर से दलील दी गई कि यह स्थिति पूरी तरह अतार्किक है और EWS वर्ग के छात्रों के लिए बड़ी परेशानी पैदा करती है.सुप्रीम कोर्ट ने NEET-UG छात्र हर्षवर्धन सिंह की याचिका खारिज की.
जयपुर. राजस्थान के एक NEET-UG छात्र की ओर से उठाया गया सवाल देशभर के उन हजारों परिवारों से जुड़ा है, जिनकी सालाना आय सीमित है लेकिन मेडिकल पढ़ाई का सपना बहुत बड़ा है. मामला आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS श्रेणी के छात्रों से जुड़ा था. छात्र का कहना था कि जब EWS का लाभ लेने के लिए परिवार की सालाना आय अधिकतम 8 लाख रुपये तय है, तो फिर 18 से 25 लाख रुपये सालाना फीस वाले निजी मेडिकल कॉलेजों में इस वर्ग के छात्रों के लिए सीटों का क्या मतलब रह जाता है.
हालांकि, इस दलील से सुप्रीम कोर्ट सहमत नहीं हुआ. शीर्ष अदालत ने राजस्थान के छात्र हर्षवर्धन सिंह की याचिका खारिज कर दी और कहा कि निजी मेडिकल कॉलेजों को सरकारी कॉलेजों की तरह फीस लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. अदालत ने यह भी कहा कि अगर कोई छात्र फीस वहन नहीं कर सकता तो वह स्कॉलरशिप या सब्सिडी जैसी सुविधाओं का सहारा ले सकता है.
EWS आय सीमा और मेडिकल फीस के बीच अंतर पर उठाया था सवालयाचिका में कहा गया था कि EWS श्रेणी में शामिल होने के लिए परिवार की सालाना आय सीमा अधिकतम 8 लाख रुपये निर्धारित है. दूसरी तरफ निजी मेडिकल कॉलेजों में ट्यूशन फीस 18.9 लाख रुपये से लेकर 25 लाख रुपये सालाना तक है. छात्र की ओर से दलील दी गई कि यह स्थिति पूरी तरह अतार्किक है और EWS वर्ग के छात्रों के लिए बड़ी परेशानी पैदा करती है. याचिका में यह भी पूछा गया था कि 8 लाख रुपये की सालाना आय सीमा और 25 लाख रुपये तक की मेडिकल फीस एक साथ कैसे मेल खा सकती है. छात्र ने इस व्यवस्था को चुनौती देते हुए राहत की मांग की थी. इससे पहले राजस्थान हाई कोर्ट ने भी इस याचिका को खारिज कर दिया था. हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि निजी मेडिकल कॉलेजों के लिए तय किया गया फीस ढांचा कानूनी रूप से सही है. अदालत ने माना था कि राज्य की फीस रेगुलेटरी कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का पालन करते हुए फीस तय की है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, निजी और सरकारी संस्थानों में बड़ा फर्कहाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि कोई भी यह नहीं कह सकता कि निजी शैक्षणिक संस्थान भी सरकारी संस्थानों जितनी ही फीस लें. अदालत ने कहा कि सेल्फ-फाइनेंसिंग संस्थानों और सरकारी कॉलेजों के काम करने के तरीके में बड़ा अंतर होता है. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों को राज्य सरकार से अनुदान मिलता है, जबकि निजी संस्थान अपनी व्यवस्था खुद चलाते हैं. अदालत ने यह भी कहा कि केवल इस आधार पर कि किसी निजी कॉलेज की फीस ज्यादा है, उसे सरकारी कॉलेजों जैसी फीस लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता.
निजी मेडिकल कॉलेजों को कम फीस लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकतेकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि कैपिटेशन फीस पर रोक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कॉलेज अपनी सामान्य फीस भी नहीं ले सकते. अदालत के मुताबिक अगर निजी मेडिकल कॉलेजों को कम फीस लेने के लिए मजबूर किया गया तो मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में उनकी भागीदारी प्रभावित हो सकती है. देश को ज्यादा डॉक्टरों की जरूरत है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उसे राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले में दखल देने का कोई कारण नजर नहीं आता. इसलिए याचिका खारिज की जाती है. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर इस मामले में कानून से जुड़ा कोई सवाल उठता है तो उसे भविष्य के लिए खुला रखा गया है.
About the AuthorAnand Pandey
आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें
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