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Sikar News I lakshminath temple I ग्रहण में भी नहीं बंद होते कपाट

Last Updated:July 08, 2026, 11:15 IST

Lakshminath Temple: देशभर में सूर्य और चंद्र ग्रहण के दौरान जहां अधिकांश मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं, वहीं राजस्थान के सीकर स्थित भगवान श्री लक्ष्मीनाथ मंदिर में सदियों से एक अनोखी परंपरा निभाई जा रही है. यहां ग्रहण के समय भी दर्शन, आरती और भगवान को नियमित भोग लगाया जाता है. 500 साल से अधिक पुरानी यह परंपरा और बद्रीनाथ धाम से जुड़ी मान्यता इस मंदिर को आस्था का अद्भुत केंद्र बनाती है.

सीकर. देशभर में सूर्य या चंद्र ग्रहण लगते ही मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं. सूतक काल शुरू होते ही पूजा-अर्चना और भोग की परंपरा भी रोक दी जाती है. लेकिन राजस्थान के सीकर जिले के फतेहपुर में एक ऐसा मंदिर है, जहां सदियों से यह परंपरा उलट है. यहां ग्रहण के दौरान भी भगवान के दर्शन होते हैं, आरती होती है और नियमित रूप से भोग भी लगाया जाता है. यही नहीं, इस मंदिर का 500 साल से भी अधिक पुराना आध्यात्मिक संबंध उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम से भी माना जाता है, जो इसे और भी अद्भुत बनाता है.

फतेहपुर के मुख्य बाजार में स्थित भगवान श्री लक्ष्मीनाथ जी का मंदिर शेखावाटी की सबसे प्राचीन और आस्था के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है. मंदिर के पुजारी रमेश भोजक बताते हैं कि संवत 1529 में श्री लक्ष्मीनाथ जी की प्रतिमा भूमि से प्रकट हुई थी. बाद में संवत 1588 में प्रतिमा को एक कुटिया में विराजमान किया गया. भगवान के कई चमत्कारों के बाद गौरूजी भोजक के निर्देश पर वर्तमान मंदिर का निर्माण कराया गया और संवत 1621 की बैसाख सुदी पूर्णिमा को विधि-विधान से भगवान को यहां स्थापित किया गया.

सूतक काल में मंदिर बंद नहीं होने की अनोखी मान्यता मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा ग्रहण के समय देखने को मिलती है. पुजारी रमेश भोजक के अनुसार एक बार मंदिर के पुजारी भगवान को भोग लगाना भूल गए. तब मान्यता है कि स्वयं लक्ष्मीनाथ जी ने अपने हाथ का कड़ा देकर एक हलवाई से प्रसाद प्राप्त किया. इस घटना के बाद यह विश्वास स्थापित हुआ कि भगवान को ग्रहण का प्रभाव नहीं लगता, इसलिए उन्हें सूतक काल में भी भूखा नहीं रखा जा सकता. तभी से सूर्य और चंद्र ग्रहण के दौरान भी मंदिर के कपाट खुले रहते हैं, नियमित भोग लगता है और आरती भी होती है. इस मंदिर की एक और विशेषता इसे सीधे बद्रीनाथ धाम से जोड़ती है. मान्यता है कि भगवान बद्रीनारायण और श्री लक्ष्मीनाथ जी का स्वरूप एक ही है. इसी कारण जब बद्रीनाथ धाम के कपाट खुले रहते हैं और वहां दीपक आरती होती है, तब फतेहपुर के लक्ष्मीनाथ मंदिर में तुलसी पत्र से आरती की जाती है. वहीं विजयादशमी से अक्षय तृतीया तक जब बद्रीनाथ के कपाट बंद रहते हैं, तब यहां दीपक आरती का विधान होता है. यह परंपरा पांच शताब्दियों से लगातार निभाई जा रही है.

भगवान को माना जाता है सजीव स्वरूपमंदिर की सेवा-पद्धति भी बेहद अनोखी है. यहां भगवान को केवल प्रतिमा नहीं, बल्कि सजीव स्वरूप मानकर उनकी दैनिक सेवा की जाती है. हर रात उन्हें शैय्या पर विश्राम कराया जाता है और विशेष ‘पौढ़णा आरती’ गाई जाती है. जेठ माह में भगवान की जल शैय्या सजाई जाती है, जबकि सावन में लक्ष्मीनाथ महाराज सभा मंडप से बाहर विराजते हैं और प्रतिदिन झूलों का भव्य श्रृंगार किया जाता है.

About the AuthorMonali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें

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