Agriculture News: कपास की फसल में फूल गिर रहे हैं? ये तरीका अपनाएंगे तो तुरंत दिखेगा असर

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कपास की फसल में फूल गिर रहे हैं? ये तरीका अपनाएंगे तो तुरंत दिखेगा असर
Last Updated:August 07, 2026, 22:04 IST
Nagaur News : नागौर में कपास के फूल झड़ने की समस्या पोषक तत्वों की कमी, अनियमित सिंचाई, कीट प्रकोप से होती है. एसीमोन या प्लानोफिक्स का छिड़काव करें. नागौर क्षेत्र में कपास की खेती लगातार किसानों की आय का मुख्य आधार मानी जाती है. यहां की जलवायु और मिट्टी कपास उत्पादन के लिए अनुकूल मानी जाती है. यहां के किसान अच्छी बारिश और उचित फसल प्रबंधन करके बेहतर उत्पादन प्राप्त करते हैं.
राजस्थान के नागौर क्षेत्र में बड़ी मात्रा में कपास की खेती होती है. अभी यह फसल खेतों में बढ़ रही है. ऐसे में इस समय कपास के फूल और टिंडों का बनना सबसे अहम चरण माना जाता है. यदि इस अवस्था में फूल अधिक मात्रा में झड़ने लगें तो उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है. एग्रीकल्चर एक्सपर्ट बजरंग सिंह ने बताया कि आमतौर पर कपास के पौधों में यह समस्या पोषक तत्वों की कमी के कारण होती है. इसके अलावा अनियमित सिंचाई, अधिक तापमान, कीट प्रकोप और पौधों पर बढ़ते तनाव के कारण यह समस्या बढ़ती जाती है.
एग्रीकल्चर एक्सपर्ट ने बताया कि यदि कपास में फूल गिरने की समस्या दिखाई दे रही हो तो किसानों को एसीमोन या प्लानोफिक्स का 2.5 मिलीलीटर प्रति 100 लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए. यह पौधों में हार्मोनल संतुलन बनाए रखने में मदद करता है और फूलों के झड़ने की संभावना कम होती है. किसान ध्यान रखें कि वे यह छिड़काव सुबह या शाम के समय ही करें. इससे फसल पर इसका प्रभाव अधिक पड़ता है. इसके अलावा दवा का भी बेहतर असर मिलता है और पौधों को किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता है.
उन्होंने बताया कि अमेरिकन नरमा की खेती करने वाले किसानों के लिए चरम पुष्पण अवस्था बेहद अहम होती है. इस दौरान किसान इसमें पोटेशियम नाइट्रेट का 2 प्रतिशत घोल बनाकर पहला छिड़काव करें. इससे पौधों को आवश्यक पोषण मिलते रहते हैं. इससे फूलों और टिंडों का विकास बेहतर होता है तथा उत्पादन क्षमता में वृद्धि की संभावना रहती है. संतुलित पोषण के साथ समय पर यह प्रबंधन किसानों के लिए लाभकारी साबित हो सकता है.
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आपको बता दें कि नागौर क्षेत्र में कपास की खेती लगातार किसानों की आय का मुख्य आधार मानी जाती है. यहां की जलवायु और मिट्टी कपास उत्पादन के लिए अनुकूल मानी जाती है. यहां के किसान अच्छी बारिश और उचित फसल प्रबंधन करके बेहतर उत्पादन प्राप्त करते हैं. लेकिन, मौसम में अचानक बदलाव, लंबे समय तक बादल छाए रहने या अत्यधिक गर्मी की स्थिति में फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.इसलिए खेतों का नियमित निरीक्षण और समय पर कृषि सलाह का पालन करनी चाहिए.
एग्रीकल्चर एक्सपर्ट बजरंग सिंह ने बताया कपास की फसल में गुलाबी सुंडी, सफेद मक्खी, थ्रिप्स और माहू जैसे कीट भी उत्पादन को प्रभावित करते हैं. ऐसे में किसान बारिश के मौसम में मुख्य रूप से फसल की नियमित रूप से निगरानी रखे. किसान प्रारंभिक अवस्था में ही कीटों की पहचान कर नियंत्रण उपाय अपनाएं. कपास की खेती में संतुलित उर्वरक, खरपतवार नियंत्रण और आवश्यकता अनुसार सिंचाई करने से पौधों की बढ़वार अच्छी रहती है. इसके अलावा अधिक नाइट्रोजन देने से भी फूल झड़ने की समस्या बढ़ सकती है.
उन्होंने बताया कि इस कपास में फूल बनने से लेकर टिंडे विकसित होने तक पौधों पर किसी भी प्रकार का तनाव नहीं आने देना चाहिए. इसके अलावा खेत में नमी का संतुलन बनाए रखना चाहिए. वहीं, फसल का जलभराव से भी बचाव करना चाहिए. वहीं, सूखे की स्थिति में समय पर किसान समय समय पर सिंचाई करते रहे. सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दिखाई देने पर उनकी पूर्ति भी समय पर करनी चाहिए. इससे पौधे स्वस्थ रहते हैं और अधिक संख्या में टिंडे बनने की संभावना बढ़ जाती है.
आपको बता दें कि नागौर जिले में बीटी कपास की खेती नकदी फसल के रूप में की जाती है. यहां बलुई दोमट मिट्टी में किसान फव्वारा या ड्रिप सिंचाई की मदद से प्रति हेक्टेयर 1.5 से 2 लाख रुपये तक का मुनाफा कमा रहे हैं. कपास की बुवाई के लिए 15 अप्रैल से 15 मई तक का समय सबसे अच्छा माना जाता है. वहीं, इसमें प्रति बीघा लगभग 3 किलोग्राम बीटी कपास के बीजों का उपयोग होता है. नागौर और आसपास के क्षेत्रों में राशि जेट, सरपास 77, यूएस 51 और टाटा दिग्गज जैसी किस्में सबसे ज्यादा बोई जाती है.
First Published :
August 07, 2026, 22:04 IST



