अब पाताल से भी पकड़ लिए जाएंगे भगोड़े! 9 साल में 274 अपराधी लाए गए वापस, पहले आते थे बस 4

एक समय था जब अपराधी या घोटालेबाज देश से भाग जाते थे और फिर विदेश में आराम से बैठकर मजे करते थे. पैसे भी उनके पास थे, सुरक्षा भी. लेकिन पिछले कुछ सालों में तस्वीर पूरी तरह बदल गई है. गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2019 से जुलाई 2026 तक 36 देशों से 274 भगोड़े अपराधियों को भारत वापस लाया गया है. यह अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है. यूपीए सरकार के दौरान सालाना औसतन सिर्फ चार भगोड़ों का प्रत्यर्पण हो पाता था. अब साल में 40-70 तक भगोड़े लौट रहे हैं. 2025 में अकेले 70 और 2026 के पहले सात महीनों में 45 भगोड़े वापस आ चुके हैं.
अब कोई भी अपराधी यह सोचकर नहीं भाग सकता कि विदेश पहुंच गया तो कानून की पहुंच से बाहर हो गया.
पहले क्या था और अब क्या है?
पहले प्रत्यर्पण की प्रक्रिया बहुत धीमी और जटिल थी. संधियां कम थीं, कागजी कार्रवाई अधूरी रहती थी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी थी. 2004 से 2013 के बीच औसतन सालाना सिर्फ चार भगोड़े लौट पाए थे और कई अनुरोध लंबित पड़े रहते थे. आर्थिक अपराधियों के लिए कोई खास कानून भी नहीं था. वे संपत्ति बेचकर या छिपाकर भाग जाते थे और देश में उनका मुकदमा भी नहीं चल पाता था. ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं. ये दिखाते हैं कि मोदी सरकार और खासकर गृह मंत्री अमित शाह ने भगोड़ों पर कितना सख्त शिकंजा कसा है.
2014 के बाद हालात बदले. 2018 में फ्यूजिटिव इकोनॉमिक ऑफेंडर्स एक्ट (FEOA) लाया गया. इसके तहत जो आर्थिक अपराधी भाग जाता है, उसकी संपत्ति जब्त की जा सकती है और उसे भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किया जा सकता है. फिर 2019 में एनआईए एक्ट और यूएपीए में संशोधन हुए. अब विदेशी नेटवर्क और व्यक्तिगत आतंकियों पर भी कार्रवाई आसान हो गई. 2024 में लागू नए आपराधिक कानूनों (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) में पहली बार ‘ट्रायल इन एब्सेन्सिया’ यानी अनुपस्थिति में मुकदमा चलाने का प्रावधान जोड़ा गया. मतलब भगोड़ा विदेश में बैठा हो तो भी उसका मुकदमा आगे बढ़ सकता है.
अमित शाह ने इसे ‘त्रिकोणीय रणनीति’ कहा है- वैश्विक पहुंच, मजबूत समन्वय और स्मार्ट कूटनीति… जनवरी 2025 में भारतपोल (BHARATPOL) लॉन्च किया गया. इससे 1400 से ज्यादा एजेंसियां इंटरपोल से जुड़ गईं. जानकारी साझा करने का समय पहले हफ्तों में लगता था, अब कई मामलों में 3 से 10 दिन में हो जाता है. ऑपरेशन त्रिशूल के तहत सैटेलाइट इनपुट, डिजिटल फुटप्रिंट और निगरानी से भगोड़ों का ठिकाना पता लगाया जाता है, भले ही उन्होंने नाम-पता बदल लिया हो.
इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस भी तेजी से बढ़े हैं. वर्ष 2022 में 40, 2023 में 100, 2024 में 107, 2025 में 112 और 2026 में जुलाई तक ही 182 नोटिस जारी हो चुके हैं. पिछले तीन साल में 401 रेड कॉर्नर नोटिस जारी हुए. पीएमएलए के सख्त लागू होने से 2019 से 2026 के बीच भगोड़ों की 17,874 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त हुई और 18,762 करोड़ रुपये की राशि वापस हासिल की गई.
किन-किन अपराधों के आरोपी लौटे?
गृह मंत्रालय के एक आला अधिकारी बताते हैं कि इन 274 भगोड़ों में हर तरह के अपराधी शामिल हैं. सबसे ज्यादा 62 हत्या, डकैती और हिंसक अपराधों के आरोपी हैं. 53 यौन अपराध और पॉक्सो केस के आरोपी, 42 संगठित अपराध, गैंगस्टर और रंगदारी के, 45 अन्य अपराधों के, 18 मानव तस्करी और अपहरण के, 17 आतंकवादी या राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के, 16 मादक पदार्थों की तस्करी के, 12 तस्करी-जाली मुद्रा-साइबर अपराध के और 9 वित्तीय धोखाधड़ी के आरोपी वापस लाए गए. 26/11 हमले की साजिश में शामिल तहव्वुर हुसैन राणा को अमेरिका से प्रत्यर्पित करना इनमें से एक बड़ी सफलता मानी जाती है.
अमित शाह ने खुद एक्स पर पोस्ट करके कहा कि ‘मजबूत और सुरक्षित भारत के विजन के तहत मोदी सरकार ने विदेशों में छिपे भगोड़ों पर जाल कस दिया है. वे चाहे किसी भी देश में भागे हों, राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति भारत के नए नजरिए ने 2019 के बाद से 274 अपराधियों की वापसी सुनिश्चित की है.’
अभी किन्हें लाना बाकी है?
इन तमाम सफलताओं के बावजूद कुछ बड़े नाम अभी भी बाहर हैं. किंगफिशर घोटाले के आरोपी विजय माल्या ब्रिटेन में हैं. उनका प्रत्यर्पण लंबा चल रहा है. नीरव मोदी पीएनबी घोटाले में ब्रिटेन की जेल में बंद है. ब्रिटिश अदालतों ने उनके प्रत्यर्पण को मंजूरी दे दी है, लेकिन प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई. मेहुल चोकसी (नीरव मोदी के मामा) को बेल्जियम में गिरफ्तार किया गया था और उनके प्रत्यर्पण की कोशिशें जारी हैं. इसके अलावा नितिन और चेतन संडेसरा, संजय भंडारी जैसे कई आर्थिक अपराधी और कुछ गैंगस्टर-आतंक से जुड़े नाम अभी भी विदेश में हैं. ईडी के अनुसार दर्जनों लोग भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किए जा चुके हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई चल रही है.
सरकार का दावा है कि इन पर भी शिकंजा कस रहा है. संपत्ति जब्त हो रही है, रेड नोटिस जारी हैं और कूटनीतिक दबाव बढ़ाया जा रहा है. लेकिन कानूनी प्रक्रिया अलग-अलग देशों में अलग होती है, इसलिए समय लगता है.
भगोड़ों का सरदार कौन?
भारत में अपराध कर विदेश भागना कोई नया नहीं, लेकिन आर्थिक, संगठित और अंतरराष्ट्रीय अपराधों का दायरा बढ़ चुका है. भगोड़ों में पहला नाम दाऊद इब्राहिम का आता है. 1970-80 के दशक में उन्होंने क्राइम की दुनिया में कदम रखा, गैंग बनाकर सोना-ड्रग तस्करी और वसूली की. मुंबई पुलिस के हत्या आरोपों के बाद 1986 के आसपास दुबई गए, फिर कराची चले गए और वहाँ से गतिविधियां जारी रखीं.
इकबाल मिर्ची भी दाऊद का आदमी था, जिसे ड्रग-बैरन कहा जाता था. उसने एशिया, अफ्रीका और यूरोप में नशीली दवाओं की तस्करी की. दबाव बढ़ने पर पहले दुबई, फिर लंदन बस गया. भारत की गिरफ्तारी और प्रत्यर्पण माँग के बावजूद ब्रिटेन में कानूनी लड़ाई और सबूतों की कमी के कारण सालों विदेश में रहा.
छोटा राजन (राजेंद्र सदाशिव निकालजे) शुरू में दाऊद के साथ था, बाद में दूरी हो गई. 1988 में भारत छोड़कर दुबई आदि में रहने लगा और फर्जी पासपोर्ट इस्तेमाल किए. 2015 में भारत प्रत्यर्पित हुआ, लेकिन लंबे समय तक विदेश से नेटवर्क चलाया.
रवि पुजारी वसूली और हत्या के आरोपी रहे. फर्जी पहचान और पासपोर्ट इस्तेमाल कर 2019 में सेनेगल में गिरफ्तार हुए और 2020 में भारत लाए गए.
आतंक से जुड़े मामलों में 1993 मुंबई धमाकों के आरोपी टाइगर मेमन पाकिस्तान चले गए. मसूद अज़हर को 1999 में IC-814 अपहरण के बाद रिहा किया गया; उन्होंने पाकिस्तान में जैश-ए-मोहम्मद स्थापित किया.ये सरगना अक्सर दुबई या मध्य-पूर्व भागते हैं, जहाँ से ड्रग्स, तस्करी या षड्यंत्र चलाते हैं. फर्जी पासपोर्ट और दस्तावेज़ मदद करते हैं. इंटरपोल और प्रत्यर्पण संधियों से भारत कई भगोड़ों को वापस ला चुका है.
आम आदमी के लिए इसका मतलब
ये सिर्फ सरकारी उपलब्धि नहीं है. जब कोई भगोड़ा लौटता है तो पीड़ित परिवारों को न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ती है. हत्या या बलात्कार के आरोपी अगर बाहर घूम रहे हों तो पीड़ितों का दर्द और बढ़ता है. आर्थिक अपराधी बैंकों का पैसा लेकर भागते हैं तो आम जमाकर्ता और टैक्सपेयर का नुकसान होता है. अब जब संपत्ति जब्त हो रही है और कुछ राशि वापस आ रही है तो कम से कम नुकसान की भरपाई की दिशा में काम हो रहा है.
बेशक चुनौतियां बाकी हैं. कुछ देशों में कानूनी बाधाएं, मानवाधिकार के मुद्दे और राजनीतिक जटिलताएं आती रहती हैं. लेकिन दिशा साफ है कि अब भगोड़े आसानी से नहीं बच पाएंगे. देश की सीमाएं पार करने के बाद भी भारतीय कानून की पहुंच उन तक है.
इतना ही कहा जा सकता है कि कानून का राज तब मजबूत होता है जब कोई भी अपराधी, चाहे कितना भी ताकतवर या अमीर हो, सजा से नहीं बच पाए. पिछले सात सालों का यह रिकॉर्ड उसी दिशा में एक बड़ा कदम है. अब भगोड़ों के लिए संदेश साफ है कि भागने से काम नहीं चलेगा, लौटना ही पड़ेगा.



