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Work Life Balance : जीवन में क्यों जरूरी है ‘स्विच ऑन-स्विच ऑफ’ फॉर्मूला? समझें यह कैसे बदल सकता है आपकी लाइफ

ऑफिस की मीटिंग आज 5 बजे से है. सारी तैयारियां हो चुकी हैं, लेकिन संगीत को टेंशन हो रही है कि सब अच्छे से होगा या नहीं. वह इसी उधेड़बुन में लंच टाइम में भी स्क्रीन पर आंखें गड़ाए कुछ न कुछ ढूंढने में लगा है. कलीग्स आते हैं, जाते हैं, काम करते हैं, ब्रेक लेते हैं, नाश्ता करते हैं, लेकिन संगीत है कि टेंशन में मरा जा रहा है.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि लगातार किसी काम या आने वाली स्थिति को लेकर चिंता करते रहना आपकी एंग्जायटी बढ़ा सकता है. इससे आप काम की क्वालिटी बेहतर करने के बजाय मानसिक रूप से खुद को थकाने लगते हैं. ऐसे में ‘स्विच ऑन-स्विच ऑफ’ फॉर्मूला आपके काम आ सकता है.

इसे समझने के लिए संगीत के सीनियर राहुल का उदाहरण लेते हैं. राहुल काम के घंटों में जमकर काम करता है, लेकिन हर 40 मिनट के आसपास छोटा ब्रेक भी लेता है. इस दौरान वह अपने दिमाग को काम से स्विच ऑफ कर देता है और कुछ देर के लिए बिल्कुल अलग जोन में चला जाता है. मसलन, दोस्तों के साथ कॉफी पीना, हंसी-मजाक करना या कोई ऐसा काम करना जिससे तनाव कम हो.

राहुल अक्सर संगीत से कहता है, “बेटा, लाइफ में बेस्ट परफॉर्मर बनना है तो खुद के काम को स्विच ऑफ और ऑन करना सीख ले.”

आखिर क्या है स्विच ऑन-स्विच ऑफ फॉर्मूला?इसका सीधा सा मतलब है कि जब काम करना हो तो पूरी तरह काम पर ध्यान लगाएं और जब ब्रेक का समय हो तो सच में काम से दिमाग हटाएं. कई लोग ब्रेक तो लेते हैं, लेकिन उस दौरान भी ईमेल, ऑफिस चैट या आने वाली मीटिंग के बारे में सोचते रहते हैं. ऐसे में शरीर तो ब्रेक पर होता है, लेकिन दिमाग काम में ही लगा रहता है.

स्विच ऑफ का मतलब काम को छोड़ देना नहीं है. इसका मतलब है कुछ समय के लिए दिमाग को उस काम से दूरी देना, ताकि वह दोबारा उसी काम पर बेहतर फोकस के साथ लौट सके.

हर समय चिंता करने से क्या होता है?मान लीजिए किसी जरूरी प्रेजेंटेशन, मीटिंग या डेडलाइन को लेकर आप सुबह से परेशान हैं. बार-बार दिमाग में यही चल रहा है कि कहीं गलती न हो जाए, बॉस क्या कहेंगे या सब ठीक होगा या नहीं.

इस तरह की लगातार चिंता आपकी एनर्जी खा सकती है. आप काम कर तो रहे होते हैं, लेकिन ध्यान काम से ज्यादा चिंता पर रहता है. यही वजह है कि कई बार ज्यादा घंटे काम करने के बावजूद आउटपुट उतना अच्छा नहीं आता.

छोटे ब्रेक क्यों हैं जरूरी?राहुल की तरह हर कुछ देर में छोटा ब्रेक लेना आपके दिमाग को रीसेट करने में मदद कर सकता है. जरूरी नहीं कि ब्रेक बहुत लंबा हो. 5-10 मिनट की वॉक, दोस्तों से थोड़ी बातचीत, कॉफी पीना, गहरी सांस लेना या कुछ मिनटों के लिए स्क्रीन से दूर रहना भी मददगार हो सकता है. यहां सबसे जरूरी बात है कि ब्रेक के दौरान आप काम से सच में दूरी बनाएं.

‘स्विच ऑन’ का मतलब क्या है?स्विच ऑन यानी जब काम का समय हो तो पूरी तरह उसी काम पर फोकस करना. इसलिए काम शुरू करने से पहले तय करें कि अगले 30-40 मिनट आपको सिर्फ एक काम पर ध्यान देना है. इसके बाद छोटा ब्रेक लें और फिर दोबारा काम पर लौटें.

घर और रिश्तों में भी अपनाएं यह फॉर्मूला-यह फॉर्मूला सिर्फ ऑफिस के लिए नहीं है. घर पहुंचने के बाद भी अगर दिमाग ऑफिस की टेंशन में फंसा है तो परिवार के साथ होने के बावजूद आप उनके साथ पूरी तरह मौजूद नहीं रह पाते.

कोशिश करें कि ऑफिस खत्म होने के बाद कुछ मिनट खुद को ट्रांजिशन टाइम दें. थोड़ी वॉक करें, संगीत सुनें या शांत बैठें. इसके बाद घर और परिवार के साथ ‘स्विच ऑन’ हो जाएं.

इसी तरह सोने के समय अगले दिन के कामों की चिंता करने के बजाय जरूरी चीजें एक कागज या नोट में लिख दें. इससे दिमाग को बार-बार वही बातें याद रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

जिंदगी में संतुलन बनाने का आसान तरीका-‘स्विच ऑन-स्विच ऑफ’ फॉर्मूला असल में काम और आराम के बीच संतुलन(work life balance) बनाना सिखाता है. हर समय काम करते रहना जरूरी नहीं है और हर समय आराम करना भी सही तरीका नहीं है.

जब काम करें तो पूरे मन से करें और जब ब्रेक लें तो बिना अपराधबोध के लें. यही आदत धीरे-धीरे आपको ज्यादा फोकस्ड, एनर्जेटिक और बेहतर तरीके से काम करने वाला इंसान बना सकती है.

तो अगली बार जब कोई मीटिंग, प्रेजेंटेशन या जरूरी काम आपको परेशान करे, तो संगीत की तरह घंटों टेंशन लेने के बजाय राहुल की सलाह याद रखिए- बेस्ट परफॉर्मर बनने के लिए सिर्फ मेहनत करना नहीं, सही समय पर खुद को ‘स्विच ऑफ’ और ‘स्विच ऑन’ करना भी सीखना जरूरी है.

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