देश के लिए दिया सर्वोच्च बलिदान, सीकर के शहीद जवान की प्रतिमा देख हर कोई करता है सलाम

Last Updated:August 16, 2026, 17:49 IST
Sikar Hindi News: सीकर जिले के एक वीर जवान ने जम्मू-कश्मीर के राजौरी क्षेत्र में आतंकियों के खिलाफ मुठभेड़ के दौरान देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था. आज उसी शहीद की प्रतिमा गांव की सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है. प्रतिमा केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि देशभक्ति, साहस और बलिदान का प्रतीक है. गांव के लोग और युवा प्रतिदिन यहां पहुंचकर शहीद को नमन करते हैं और उनसे प्रेरणा लेते हैं. राष्ट्रीय पर्वों और विशेष अवसरों पर प्रतिमा स्थल पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. शहीद की यह अमर गाथा नई पीढ़ी में देशसेवा और राष्ट्रप्रेम की भावना को मजबूत करने का कार्य कर रही है.
Sikar News: सीकर के अजीतगढ़ क्षेत्र का खटकड़ गांव देश के नक्शे पर भले ही छोटा हो, लेकिन इसकी मिट्टी ने एक ऐसे वीर को जन्म दिया, जिसकी शहादत की कहानी आज भी देश की सरहदों पर जिंदा है. यहां शहीद सुवालाल यादव की प्रतिमा सिर्फ पत्थर की मूर्ति नहीं है, बल्कि गांव के लिए वह एक ऐसी याद है, जिसके सामने लोग सिर झुकाकर अपने उस बेटे को नमन करते हैं. उन्होंने कश्मीर की धरती पर आतंकवादियों से मुकाबला करते हुए देश के लिए प्राण न्योछावर कर दिए थे.
15 जुलाई 1969 को किसान परिवार में जन्मे सुवालाल यादव ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उनका नाम पूरे गांव की पहचान बन जाएगा. उनका जन्म बंशीधर यादव और मोही देवी के घर हुआ था. बचपन से ही उन्हें देश की सेना में जाने का जुनून था. पढ़ाई पूरी होने के बाद 6 सितंबर 1988 को सेना की वर्दी पहनी. इसके बाद जिंदगी का बड़ा हिस्सा देश की सरहद और सुरक्षा के नाम कर दिया.
भारतीय थल सेना की 11 कुमाऊं में नायक के रूप में उन्होंने करीब 17 साल तक सेवाएं दीं. वर्दी पहनने के बाद सुवालाल के लिए नौकरी सिर्फ रोजगार नहीं रही. मुश्किल ड्यूटी और देश की सुरक्षा उनके जीवन का हिस्सा बन गए. सेवा में देश सेवा के दौरान उनके साहस को देखते हुए उन्हें समय-समय पर सम्मान भी मिला. गांव में आज भी जब उनकी चर्चा होती है तो लोग उनकी शहादत के साथ उनके सैनिक जीवन को गर्व से याद करते हैं.
Add as Preferred Source on Google
फिर आया 20 जून 2005 का वह दिन, जिसने खटकड़ की पहचान में हमेशा के लिए एक अध्याय जोड़ दिया. कश्मीर के राजौरी इलाके में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ के दौरान सुवालाल यादव देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गए. परिवार के लिए यह सबसे बड़ा दुख था, लेकिन गांव के लिए यह ऐसा गर्व था, जिसकी कीमत आंसुओं से चुकानी पड़ी. जिस बेटे को गांव ने सेना की वर्दी में विदा किया था, वह तिरंगे में लिपटकर वापस लौटा.
आज शहीद की प्रतिमा के सामने से गुजरते हुए शायद ही कोई ग्रामीण उन्हें अनदेखा कर पाए. सुबह हो या शाम, लोग स्मारक स्थल पर पहुंचते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और श्रद्धा से सिर झुकाते हैं. यह जगह धीरे-धीरे गांव के लिए एक भावनात्मक केंद्र बन गई है. यहां आने वाला हर व्यक्ति उस सैनिक को याद करता है, जिसने अपने वर्तमान की कीमत चुकाकर देश के भविष्य की रक्षा की.
स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर इस प्रतिमा स्थल का दृश्य और भी खास हो जाता है. तिरंगे के रंगों के बीच जब ग्रामीण और युवा शहीद सुवालाल को श्रद्धांजलि देते हैं तो यह एहसास होता है कि आजादी का जश्न केवल समारोह और ध्वजारोहण तक सीमित नहीं है. इसके पीछे उन जवानों की कुर्बानी भी है, जिन्होंने देश की रक्षा करते हुए अपनी जिंदगी तक दांव पर लगा दी. सुवालाल की प्रतिमा इसी सच्चाई की खामोश गवाह है.
न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें। राजस्थान की ताजा खबरें पढ़ने के लिए क्लिक करें|First Published :
August 16, 2026, 17:49 IST



