पेंशन से घर नहीं, बना रहे दूसरों का भविष्य; जानें नौसेना से रिटायर सुभाषचंद्र खैरवा की कहानी

Last Updated:August 25, 2026, 15:35 IST
Jhunjhunu Man Unique Story Of Donation : झुंझुनूं के सुभाषचंद्र खैरवा नौसेना से रिटायर होकर 23 साल से अपनी पेंशन समाजसेवा में लगा रहे हैं. वे शिक्षा, गौसेवा, पर्यावरण व अन्य जनहित के कार्यों पर हर माह ₹65 हजार खर्च करते हैं. उनके पिता गरीब और अनपढ़ किसान थे, जिन्होंने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद मेहनत करके बेटे को पढ़ाया और नौसेना तक पहुंचाया. गरीबी के उस दौर को सुभाषचंद्र आज भी नहीं भूले हैं. इसी कारण उन्होंने तय किया कि आर्थिक तंगी के कारण किसी प्रतिभावान बच्चे की पढ़ाई नहीं रुकने देंगे.
Jhunjhunu News: झुंझुनूं के बड़ागांव क्षेत्र के चारणवास निवासी सुभाषचंद्र खैरवा ने समाजसेवा में अनूठी मिसाल कायम की है सुभाषचंद्र भारतीय नौसेना से रिटायर्ड है. 2003 में नौसेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपनी पेंशन को निजी सुख-सुविधाओं के बजाय जरूरतमंदों की मदद का माध्यम बना लिया. पिछले 23 वर्षों से वे पेंशन की राशि सामाजिक कार्यों में लगा रहे हैं. वर्तमान में हर माह करीब 65 हजार रुपए शिक्षा, गौसेवा, पर्यावरण, धार्मिक कार्यों और अन्य जनहित के कामों पर खर्च कर रहे हैं.
सुभाषचंद्र खैरवा का कहना है कि फौजी के लिए देश सेवा से रिटायरमेंट जरूर हो सकता है, लेकिन समाज सेवा से नहीं. उनका यह संकल्प उनके जीवन के अनुभवों से जुड़ा है. उनके पिता गरीब और अनपढ़ किसान थे, जिन्होंने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद मेहनत करके बेटे को पढ़ाया और नौसेना तक पहुंचाया. गरीबी के उस दौर को सुभाषचंद्र आज भी नहीं भूले हैं. इसी कारण उन्होंने तय किया कि आर्थिक तंगी के कारण किसी प्रतिभावान बच्चे की पढ़ाई नहीं रुकने देंगे.
रिटायरमेंट के बाद उन्होंने जरूरतमंद और गरीब परिवारों के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी उठानी शुरू की. वे बच्चों की स्कूल फीस जमा करवाने के साथ किताबें, कॉपियां, स्टेशनरी और स्कूल यूनिफॉर्म उपलब्ध करवाते हैं. उनका मानना है कि किसी बच्चे की आंखों में पढ़-लिखकर आगे बढ़ने का सपना हो और सिर्फ पैसों की कमी के कारण वह सपना अधूरा रह जाए, इससे बड़ी पीड़ा दूसरी नहीं हो सकती. इसलिए अपनी पेंशन का बड़ा हिस्सा वे ऐसे बच्चों की शिक्षा पर खर्च करते हैं.
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सुभाषचंद्र के इस सेवाभाव को आगे बढ़ाने में उनके परिवार का भी पूरा सहयोग है. उनकी पत्नी सरोज खैरवा सरकारी शिक्षिका हैं. बड़ा बेटा दीपक खैरवा शिक्षक है, जबकि छोटे बेटे संदीप खैरवा और बहू कंचन चौधरी दोनों डॉक्टर हैं. गौसेवा भी सुभाषचंद्र के सेवा कार्यों का अहम हिस्सा है. गोवला, दोरासर, मालसर सहित आसपास के गांवों की गौशालाओं में चारे और अन्य व्यवस्थाओं के लिए वे अब तक करीब 7.25 लाख रुपए खर्च कर चुके हैं.
चारणवास और बड़ागांव में पीने के पानी की टंकियां बनवाने के साथ पशु-पक्षियों के लिए परिंडे भी लगवाए हैं. गर्मी के मौसम में बेजुबान पशु-पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था को वे अपनी जिम्मेदारी मानते हैं. सार्वजनिक स्थानों पर लोगों की सुविधा के लिए भी उन्होंने कई काम करवाए हैं. बड़ागांव, चारणवास, ऊबली का बालाजी और हांसलसर जैसे स्थानों पर बुजुर्गों और राहगीरों के बैठने के लिए मजबूत सीमेंट की बेंचें लगवाई गई हैं. इन बेंचों पर करीब 33 हजार रुपए खर्च किए गए.
इसके अलावा जिलेभर में प्रतिवर्ष पौधारोपण, कोरोना काल में जरूरतमंदों को निशुल्क दवा वितरण सहित विभिन्न सामाजिक कार्यों पर करीब 5.60 लाख रुपए खर्च कर चुके हैं.पिछले 23 वर्षों में सुभाषचंद्र खैरवा करीब 21.75 लाख रुपए समाजसेवा में खर्च कर चुके हैं. उनका कहना है कि पेंशन से खरीदी गई कोई वस्तु कुछ समय बाद पुरानी हो सकती है, लेकिन किसी बच्चे की पढ़ाई में लगाया गया पैसा उसके पूरे जीवन को बदल सकता है. उनके लिए असली संपत्ति बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद के चेहरे की मुस्कान है.
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August 25, 2026, 15:35 IST



