Bigamy Law | पति ने की दूसरी शादी, पत्नी पहुंची कोर्ट… जज ने कहा- पहले साबित करो पहली शादी कानूनी तौर पर कायम थी, Section 494 पर बड़ा फैसला

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पति ने की दूसरी शादी, पत्नी पहुंची कोर्ट… जज बोले- साबित करो शादी कायम थी
Last Updated:September 10, 2026, 21:03 IST
Telangana High Court News: तेलंगाना हाईकोर्ट ने IPC की धारा 494 के तहत बिगैमी मामले में पति के खिलाफ FIR रद्द कर दी है. कोर्ट ने कहा है कि दूसरी शादी के समय पहली शादी का कानूनी रूप से कायम होना जरूरी है.बिगैमी पर तेलंगाना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, जानें मुस्लिम शख्स की दूसरी शादी वैध या अवैध (फोटो: AI)
हैदराबाद. पहली शादी के रहते दूसरी शादी करने का आरोप लगने पर आमतौर पर मामला सीधे बिगैमी यानी द्विविवाह की धारा 494 IPC तक पहुंच जाता है. लेकिन क्या सिर्फ इतना साबित कर देना काफी है कि पहली शादी हुई थी और उसके बाद दूसरी शादी की गई? तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक मामले में कहा है नहीं.
हाईकोर्ट ने साफ किया कि आईपीसी की धारा 494 के तहत अपराध साबित करने के लिए सिर्फ यह दिखाना पर्याप्त नहीं है कि पहले विवाह हुआ था. यह भी साबित करना जरूरी है कि दूसरी शादी के समय पहली शादी कानूनी रूप से कायम थी और संबंधित कानून के तहत दूसरी शादी उस पहली शादी के कारण शून्य थी. मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े एक मामले में जस्टिस एन. तुकारामजी की सिंगल बेंच ने पति के खिलाफ चल रही बिगैमी की कार्यवाही और एफआईआर को रद्द कर दिया.
आखिर अदालत ने ऐसा क्यों किया.शिकायतकर्ता महिला ने 28 फरवरी 2009 को मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार पहले याचिकाकर्ता से शादी की थी. महिला ने आरोप लगाया कि शादी के बाद उसे अतिरिक्त दहेज और संतान पैदा न कर पाने को लेकर मानसिक प्रताड़ना दी गई. इसको लेकर उसने अलग आपराधिक शिकायत भी की थी. इसके बाद महिला का आरोप था कि पहली शादी के रहते उसके पति ने 24 मई 2015 को दूसरी महिला से शादी कर ली. इसी आरोप के आधार पर 2021 में आईपीसी की धारा 494 के तहत मामला दर्ज किया गया और बाद में चार्जशीट भी दाखिल हुई.
इस मामले में क्या थी पति की दलीलपति की ओर से पेश वकील ने हाईकोर्ट में दलील दी कि दूसरी शादी से पहले ही पहली शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत खत्म हो चुकी थी. यानी जिस समय कथित दूसरी शादी हुई उस समय पहली शादी कानूनी तौर पर अस्तित्व में ही नहीं थी. इसलिए बचाव पक्ष का कहना था कि आईपीसी की धारा 494 के तहत बिगैमी का अपराध बनता ही नहीं. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कथित दूसरी पत्नी के खिलाफ भी इस आधार पर अपराध नहीं टिक सकता.
पत्नी की क्या थी दलीलेंपत्नी की तरफ से कोर्ट में पेश हुए असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने दलील दी कि पहली शादी वास्तव में खत्म हुई नहीं हुई थी और इन सवालों का फैसला ट्रायल कोर्ट में सबूतों के आधार पर होना चाहिए. यानी अभियोजन पक्ष का तर्क था कि इस स्तर पर केस को खत्म करने के बजाय तथ्यों की जांच ट्रायल के दौरान होनी चाहिए.
फिर हाईकोर्ट ने दिया क्या फैसला हाईकोर्ट ने सबसे पहले यह देखा कि आईपीसी की धारा 494 में बिगैमी का अपराध बनने के लिए जरूरी कानूनी शर्तें क्या हैं. अदालत के मुताबिक इसमें मुख्य रूप से चार बातें जरूरी हैं:-
1- पहली शादी के समय पति या पत्नी का जीवित होना.2- पहली शादी कानूनी रूप से वैध और कायम होना.3- उसके बाद दूसरी शादी होना.4- दूसरी शादी पहली शादी के कायम रहने के कारण कानूनन शून्य होना.
About the Authorअरुण बिंजोला
अरुण बिंजोला वर्तमान में हिंदी में एसोसिएट एडिटर के पद पर काम कर रहे हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में वह करीब 19 वर्षों से काम कर रहे हैं, जिसमें 13 वर्षों से अधिक समय डिजिटल मीडिया में बी…
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First Published :
September 10, 2026, 21:03 IST
इस मामले में क्या थी पति की दलीलपति की ओर से पेश वकील ने हाईकोर्ट में दलील दी कि दूसरी शादी से पहले ही पहली शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत खत्म हो चुकी थी. यानी जिस समय कथित दूसरी शादी हुई उस समय पहली शादी कानूनी तौर पर अस्तित्व में ही नहीं थी. इसलिए बचाव पक्ष का कहना था कि आईपीसी की धारा 494 के तहत बिगैमी का अपराध बनता ही नहीं. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कथित दूसरी पत्नी के खिलाफ भी इस आधार पर अपराध नहीं टिक सकता.
पत्नी की क्या थी दलीलेंपत्नी की तरफ से कोर्ट में पेश हुए असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने दलील दी कि पहली शादी वास्तव में खत्म हुई नहीं हुई थी और इन सवालों का फैसला ट्रायल कोर्ट में सबूतों के आधार पर होना चाहिए. यानी अभियोजन पक्ष का तर्क था कि इस स्तर पर केस को खत्म करने के बजाय तथ्यों की जांच ट्रायल के दौरान होनी चाहिए.
फिर हाईकोर्ट ने दिया क्या फैसला हाईकोर्ट ने सबसे पहले यह देखा कि आईपीसी की धारा 494 में बिगैमी का अपराध बनने के लिए जरूरी कानूनी शर्तें क्या हैं. अदालत के मुताबिक इसमें मुख्य रूप से चार बातें जरूरी हैं:-
1- पहली शादी के समय पति या पत्नी का जीवित होना.2- पहली शादी कानूनी रूप से वैध और कायम होना.3- उसके बाद दूसरी शादी होना.4- दूसरी शादी पहली शादी के कायम रहने के कारण कानूनन शून्य होना.
यानी मामला सिर्फ यह नहीं है कि पहले शादी हुई थी और बाद में दूसरी शादी हो गई. अदालत को यह भी देखना होगा कि दूसरी शादी के समय पहली शादी कानूनी रूप से अस्तित्व में थी या नहीं.
केस में क्या था सबसे बड़ा पेच सबसे बड़ा पेच था पहली शादी के खत्म होने का दावा. हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन की अपनी सामग्री से प्रथम दृष्टया यह संकेत मिलता है कि कथित दूसरी शादी से पहले ही पहली शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत समाप्त हो चुकी थी. अगर पहली शादी कानूनी रूप से पहले ही खत्म हो चुकी थी तो दूसरी शादी के समय कायम पहली शादी थी ही नहीं. और जब पहली शादी ही कायम नहीं थी तो धारा 494 की बुनियादी शर्तों में से एक पूरी नहीं होती. यही इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. हाईकोर्ट ने कहा कि मान भी लें कि पहली शादी उस समय कायम थी, तब भी मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े इस मामले में सिर्फ पहली शादी के अस्तित्व में होने से धारा 494 IPC अपने आप लागू नहीं हो जाती. क्योंकि धारा 494 के तहत यह भी दिखाना होगा कि दूसरी शादी पहली शादी के कायम रहने की वजह से कानूनन शून्य थी. अदालत ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मुस्लिम पुरुष के एक से अधिक विवाह करने की अनुमति के कारण, सिर्फ पहली शादी के जारी रहने से दूसरी शादी अपने आप शून्य नहीं कह सकते. यही वजह है कि इस मामले में धारा 494 IPC का जरूरी तत्व पूरा नहीं हुआ.
मुस्लिम पुरुष कभी भी दूसरी शादी कर सकता है?इस फैसले को इतना व्यापक बनाकर देखना सही नहीं होगा. कोर्ट ने खास तौर पर कहा कि जब पक्षकार मुस्लिम पर्सनल लॉ से शासित हैं, तो सिर्फ पहली मुस्लिम शादी के कायम रहने के आधार पर बाद की शादी को शून्य नहीं माना जा सकता. इसलिए इसे हर परिस्थिति में दूसरी शादी को कानूनी मंजूरी देने वाला सामान्य फैसला समझना ठीक नहीं होगा.
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