करौली का ‘बड़ा मंदिर’ क्यों है खास? 500 साल पुराना धाम, 16 खंभों पर टिकी पूरी इमारत, जानिए कहानी

Last Updated:September 16, 2026, 06:51 IST
Karauli Ved Vyas Temple: करौली से 30 किमी दूर भांकरी गांव में महर्षि वेदव्यास का 500 साल पुराना ऐतिहासिक मंदिर स्थित है, जिसे लोग ‘बड़ा मंदिर’ कहते हैं. यह राजस्थान में वेदव्यास जी का इकलौता मंदिर माना जाता है. मंदिर 16 मजबूत खंभों पर टिका है और इसके निर्माण में चूना-बजरी का इस्तेमाल नहीं हुआ है. यहां महर्षि वेदव्यास की 3 फीट ऊंची अष्टधातु की प्रतिमा विराजमान है. मान्यता है कि यहां वेदों का उच्चारण करने से सभी संकट दूर होते हैं. दूर-दराज से श्रद्धालु यहां दर्शन करने और विशेष पूजा-अर्चना में शामिल होने आते हैं.
राजस्थान के करौली जिले में आस्था और प्राचीन स्थापत्य का ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. करौली से करीब 30 किलोमीटर दूर भांकरी गांव के बीचों-बीच स्थित महर्षि वेदव्यास का करीब 500 साल पुराना मंदिर आज भी अपनी प्राचीन पहचान और धार्मिक विरासत को संजोए हुए है. स्थानीय लोग इसे ‘बड़े मंदिर’ के नाम से जानते हैं.
गांव के व्यास परिवारों द्वारा करीब पांच शताब्दी पहले बनवाए गए इस मंदिर को स्थानीय लोग राजस्थान में महर्षि वेदव्यास का इकलौता मंदिर बताते हैं. मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास ने वेदों को व्यवस्थित कर उन्हें आम लोगों के लिए समझने योग्य बनाया था. महाभारत और श्रीमद्भागवत सहित कई प्रमुख धार्मिक ग्रंथों से भी उनका नाम जुड़ा हुआ है. यही कारण है कि भांकरी के इस मंदिर में वेदव्यास जी के दर्शन और वेदों के उच्चारण का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है.
स्थानीय निवासी जनार्दन उपाध्याय के मुताबिक, मंदिर की स्थापना करीब 500 वर्ष पहले गांव के व्यास परिवारों ने मिलकर कराई थी. मंदिर में महर्षि वेदव्यास की करीब 3 फीट ऊंची अष्टधातु की प्रतिमा विराजमान है. इसके अलावा संकट मोचन हनुमान की प्रतिमा भी यहां श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है. मंदिर में दोनों देव प्रतिमाओं के दर्शन के लिए स्थानीय लोगों के साथ आसपास के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं.
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स्थानीय लोगों के अनुसार, भांकरी के इस प्राचीन मंदिर में आसपास के गांवों के अलावा जयपुर, दिल्ली, अलवर सहित दूर-दराज के इलाकों से भी श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं. मंदिर के पुजारी राधेश्याम शर्मा बताते हैं कि यहां महर्षि वेदव्यास के दर्शन और पूजा-अर्चना को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है. मान्यता है कि मंदिर में वेदों का उच्चारण करने से संकट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
इस मंदिर की सबसे खास विशेषता इसकी अनूठी निर्माण शैली बताई जाती है. पूरा मंदिर 16 मजबूत खंभों पर टिका हुआ है. इसके निर्माण में लाल पत्थर के बड़े और मोटे टुकड़ों का इस्तेमाल किया गया है. स्थानीय लोगों के अनुसार, करीब 7 से 8 इंच मोटे पत्थरों को बिना चूना और बजरी के इस्तेमाल के आपस में जोड़कर मंदिर का निर्माण किया गया था. सदियों पुराना होने के बावजूद मंदिर की यह प्राचीन संरचना आज भी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है.
मंदिर में सामान्य दिनों के अलावा पूर्णिमा और प्रमुख त्योहारों पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. पुजारी के अनुसार, महर्षि वेदव्यास जी को खीर-पूड़ी, हलवा, लड्डू और पंचमेवा का भोग लगाया जाता है. मंदिर में सुबह और शाम झालर बजाकर पूजा की जाती है. पूजा के समय होने वाले मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों से मंदिर परिसर में दिनभर भक्तिमय माहौल बना रहता है.
करीब पांच सौ साल पुराने इस मंदिर की मजबूती आज भी लोगों के लिए हैरानी का विषय है. प्राचीन तकनीक से निर्मित यह मंदिर सदियों का समय बीतने के बाद भी अपनी मूल संरचना को काफी हद तक सुरक्षित रखे हुए है. मंदिर की निर्माण शैली और मजबूत पत्थरों का इस्तेमाल आज भी इसकी प्राचीन स्थापत्य कला और निर्माण कौशल की झलक दिखाता है.
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September 16, 2026, 06:51 IST



