Agriculture: बारिश में पपीते पर मंडरा रहा कीट का खतरा? पौधे को बचाना है तो अपनाएं ये 4 उपाय, आसान है तरीका

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बारिश में पपीते पर मंडरा रहा कीट का खतरा? पौधे को बचाना है तो अपनाएं ये 4 उपाय
Last Updated:August 08, 2026, 08:44 IST
Papaya Farming Tips: बारिश के मौसम में किसान यदि पपीते की खेती कर रहे हैं तो उन्हें सवादन रहने की जरूरत है. इस मौसम में पपीते में कीड़ें लगने की सभावना भी बढ़ जाती है. खाकसर सफेद मक्खी बेहद खतरनाक होता है. इससे बचाव के लिए किसान को इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल का 600 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए. पपीते के पौधे में तना गलन के लक्षण दिखाई दे तो तुरंत रोगग्रस्त हिस्से को काटकर अलग कर दें. इसके बाद कटे हुए हिस्से पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 0.3 प्रतिशत यानी 3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल तैयार कर लेप या छिड़काव करें.
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नागौर: बारिश का मौसम पपीते की फसल के लिए जितना फायदेमंद है, उतना ही इस दौरान कीट और रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है. बारिश वाले क्षेत्रों में खेतों में लगातार नमी और वातावरण में अधिक आर्द्रता रहने से पत्ती खाने वाले कीटों का प्रकोप बढ़ने की संभावना रहती है. ऐसे में किसानों को फसल की नियमित निगरानी करने के साथ समय रहते बचाव के उपाय अपनाने चाहिए. एग्रीकल्चर एक्सपर्ट बजरंग सिंह ने बताया किसानों को विशेष रूप से कीटभक्षी पक्षियों को खेत में आकर्षित करने और फेरोमोन ट्रैप लगाने चाहिए, इससे कीटों से बचाव के लिए अधिक खर्च और मेहनत नहीं करनी पड़ती है.
उन्होंने बताया कि बारिश के बाद पपीते समेत कई फसलों में पत्ती खाने वाले कीट सक्रिय हो जाते हैं. इनकी संख्या बढ़ने पर पौधों की पत्तियां क्षतिग्रस्त होने लगती हैं और प्रकाश संश्लेषण प्रभावित होता है. किसान खेत में बर्ड-पर्च लगाकर कीटभक्षी पक्षियों के बैठने की व्यवस्था कर सकते हैं. ये पक्षी फसल में मौजूद कई हानिकारक कीटों को खाकर उनकी संख्या नियंत्रित करने में प्राकृतिक मदद करते हैं. इसके साथ ही खेत में फेरोमोन ट्रैप लगाने से भी कीटों की निगरानी और नियंत्रण में सहायता मिलती है.
सफेद मक्खी को हल्के में लेना पड़ सकता है भारी
बारिश और उमस के बीच सफेद मक्खी का प्रकोप भी किसानों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है. सफेद मक्खी के कारण पीला मोजेक रोग फैलने की आशंका रहती है. यदि खेत में किसी पौधे पर रोग के लक्षण दिखाई दें तो ऐसे पौधों को तुरंत खेत से निकालकर नष्ट या मिट्टी में दबा देना चाहिए, ताकि संक्रमण दूसरे स्वस्थ पौधों तक नहीं पहुंच सके. सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल का 600 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.
बारिश में तना गलन रोग से भी सावधान
एग्रीकल्चर एक्सपर्ट बजरंग सिंह ने बताया कि पपीते के पौधों में बारिश के दौरान तना या पद विगलन रोग का खतरा भी बढ़ जाता है. इस रोग की शुरुआत आमतौर पर भूमि की सतह के पास तने में सड़न से होती है. धीरे-धीरे यह सड़न तने के चारों ओर फैल जाती है. रोगग्रस्त हिस्सा गहरे भूरे से काले रंग का दिखाई देने लगता है. संक्रमण बढ़ने पर पौधे की पत्तियां और फल पीले पड़ने लगते हैं तथा बाद में गिर सकते हैं.
रोग दिखते ही करें तुरंत उपचार
उन्होंने बताया कि पपीते के पौधे में तना गलन के लक्षण दिखाई देते ही रोगग्रस्त हिस्से को पूरी तरह काटकर अलग कर देना चाहिए. इसके बाद कटे हुए हिस्से पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 0.3 प्रतिशत यानी 3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल तैयार कर लेप या छिड़काव करना चाहिए. खेत में जलभराव की स्थिति बनने से भी बचना जरूरी है, क्योंकि लगातार नमी रोग को बढ़ावा दे सकती है.
किसान इन बातों का रखें ध्यान
एग्रीकल्चर एक्सपर्ट ने बताया कि बारिश के मौसम में पपीते की फसल बचाने के लिए खेत की नियमित निगरानी सबसे जरूरी है. पत्तियों के नीचे कीटों की मौजूदगी, पत्तियों का रंग बदलना, तने पर सड़न या फल गिरने जैसे शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. समय पर कीटों की पहचान, बर्ड-पर्च व फेरोमोन ट्रैप का इस्तेमाल और रोगग्रस्त पौधों को अलग करना फसल को बड़े नुकसान से बचाने में अहम भूमिका निभा सकता है.
About the Authorदीप रंजन सिंह Content Producer
दीपरंजन सिंह लगभग एक दशक से पत्रकारिता के फिल्ड से जुड़े हुए हैं. वह अभी न्यूज18 हिंदी के राजस्थान डिजिटल डेस्क से जुड़े हैं, जहां वे बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले लगभग एक दशक से सक्रिय पत…
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Nagaur,Rajasthan
First Published :
August 08, 2026, 08:44 IST



