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जानिए सही पहचान, खरपतवार नियंत्रण और कीट प्रबंधन पर विशेषज्ञ की अहम सलाह

Last Updated:June 20, 2026, 18:20 IST

Agriculture Tips: खरीफ सीजन में किसानों को अक्सर फसल में पीलापन, पत्तियों का मुड़ना, तनों का सूखने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन यह हमेशा रोग का संकेत नहीं होता. कृषि विशेषज्ञ बजरंग सिंह के अनुसार, कई बार पोषक तत्वों की कमी, जलभराव, सूखा या तापमान में बदलाव भी ऐसे लक्षण पैदा करते हैं, इसलिए बिना सही पहचान के दवाओं का छिड़काव नुकसानदायक हो सकता है. किसानों को पहले प्रभावित पौधों की पत्तियों, तनों और जड़ों का निरीक्षण करना चाहिए और जरूरत पड़ने पर कृषि विज्ञान केंद्र या विशेषज्ञों की सलाह लेनी चाहिए.

नागौर. खरीफ सीजन में किसान उन्नत बीज, समय पर बुवाई, संतुलित खाद और सिंचाई जैसी व्यवस्थाएं करने के बावजूद कई बार कीट, रोग और खरपतवारों के प्रकोप से परेशान हो जाते हैं. एग्रीकल्चर एक्सपर्ट बजरंग सिंह ने बताया कि फसल में अचानक पीलापन आना, पत्तियों का मुड़ना, तनों का सूखना या वृद्धि रुकना हमेशा किसी रोग का संकेत नहीं होता. कई बार पोषक तत्वों की कमी, जलभराव, सूखा या तापमान में बदलाव भी ऐसे लक्षण पैदा कर सकते हैं. बिना कारण की पहचान किए दवाओं का छिड़काव शुरू करना नुकसानदायक साबित हो सकता है. उन्होंने बताया कि इसके लिए किसानों को सबसे पहले प्रभावित पौधों की पत्तियों, तनों और जड़ों का निरीक्षण करना चाहिए. आवश्यकता पड़ने पर कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विभाग या हेल्पलाइन की मदद लेकर फसल की फोटो या नमूने भेजकर सही सलाह लेनी चाहिए. सही कारण की पहचान होने के बाद ही उपचार करना बेहतर रहता है.

मेढ़ और नालियों को भी खरपतवार मुक्त रखना चाहिएखरपतवारों को फसल का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है, क्योंकि वे पौधों से पोषक तत्व, पानी और धूप छीन लेते हैं. इनके नियंत्रण के लिए फसल चक्र अपनाना, शुरुआती अवस्था में निराई-गुड़ाई करना और कुलपा, डोरा जैसे कृषि उपकरणों का उपयोग करना प्रभावी उपाय हैं. ऐसे में खेत की मेढ़ और नालियों को भी खरपतवार मुक्त रखना चाहिए. मल्चिंग करने से खरपतवारों की वृद्धि पर नियंत्रण पाया जा सकता है. जरूरत के अनुसार प्री-इमर्जेंस और पोस्ट-इमर्जेंस खरपतवारनाशियों का उपयोग भी किया जा सकता है.

रोग नियंत्रण के लिए ये तरीके अपनाएरसचूसक कीट जैसे सफेद मक्खी, माहू, जैसिड और थ्रिप्स खरीफ फसलों में तेजी से फैलते हैं और पत्तियों का रस चूसकर नुकसान पहुंचाते हैं. वहीं तनाछेदक और इल्ली वर्गीय कीट पत्तियों व तनों को प्रभावित करते हैं. इसके समाधान के लिए पहले जैविक और यांत्रिक उपाय अपनाने चाहिए. इसके लिए किसान नीम तेल 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव कर सकते हैं. फेरोमोन ट्रैप और लाइट ट्रैप लगाना और लेडीबर्ड बीटल और क्राइसोपा कीट फसल के लिए लाभकारी होते हैं, इसलिए इसको किसानों को नहीं मारना चाहिए.

अधिक प्रकोप पर ये काम करेंयदि प्रकोप अधिक हो तो रासायनिक नियंत्रण अपनाया जा सकता है. रसचूसक कीटों के लिए इमिडाक्लोप्रिड, एसिटामिप्रिड और थायोमेथोक्साम, जबकि इल्ली और सुंडी नियंत्रण के लिए इमामेक्टिन बेंजोएट और क्लोरेंट्रानिलिप्रोल जैसी दवाओं का उपयोग किया जा सकता है. एग्रीकल्चर एक्सपर्ट बजरंग सिंह ने बताया कि एक ही दवा का बार-बार उपयोग करने से कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है, इसलिए दवाओं में समय-समय पर बदलाव जरूरी है. साथ ही मौसम का पूर्वानुमान देखकर ही सुबह या शाम के समय दवा छिड़काव करना चाहिए, ताकि उसका अधिकतम लाभ मिल सके.

About the AuthorMonali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें

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