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दिल्ली में था चौकीदार, मुंबई पहुंचा तो न पैसे-न पहचान, फिल्मों में हुआ नजरअंदाज, आज हर डायरेक्टर की है पहली पसंद

Last Updated:April 24, 2026, 18:49 IST

कभी दिल्ली में चौकीदारी कर पेट पालने वाला एक युवक, आज अपनी अदाकारी से बड़े-बड़े सितारों पर भारी पड़ता है. मुंबई पहुंचने पर हालात इतने मुश्किल थे कि रहने-खाने तक के लाले पड़ गए और फिल्मों में ऐसे छोटे रोल मिले, जिन्हें लोग नोटिस तक नहीं कर पाते थे. थिएटर से शुरुआत कर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा तक पहुंचने वाला यह कलाकार सालों तक संघर्ष करता रहा. फिर एक फिल्म ने सब कुछ बदल दिया और वह देखते ही देखते इंडस्ट्री का सबसे भरोसेमंद चेहरा बन गया. आज हर बड़ा डायरेक्टर उसके साथ काम करना चाहता है. क्योंकि वह किरदार नहीं निभाता, उन्हें जीता है.

नई दिल्ली. यूपी की गलियों से निकला एक लड़का, जिसने कुछ बड़ा करने की ठाना. इरादा कुछ बड़ा करने का था. लेकिन न तो पैसे और न ही कोई पहचान. दिल्ली पहुंचा तो चौकीदारी करते हुए सपनों को जिंदा रखा. जब मुंबई पहुंचा तो उसके पास न पैसा था, न कोई पहचान. फिल्मों में छोटे-छोटे रोल तो मिले, वो भी ऐसे कि कई बार स्क्रीन पर आते ही नजर नहीं आते थे. संघर्ष इतना लंबा था कि पहचान बनने में सालों लग गए, लेकिन उसने हार नहीं मानी. आज हालात ऐसे हैं कि हर बड़ा डायरेक्टर इस एक्टर के साथ काम करना चाहता है. बिना स्टारडम के बने इस एक्टर ने साबित कर दिया कि टैलेंट और मेहनत के आगे हर मुश्किल छोटी पड़ जाती है.

बॉलीवुड में कई सितारे ऐसे हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत और लगन के दम पर मुकाम हासिल किया, लेकिन नवाजुद्दीन सिद्दीकी की कहानी उनमें सबसे अलग और प्रेरणादायक मानी जाती है. आज भले ही वह इंडस्ट्री के सबसे बेहतरीन एक्टर में गिने जाते हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब वह दिल्ली में वॉचमैन की नौकरी कर अपने सपनों को जिंदा रखे हुए थे.

उत्तर प्रदेश के छोटे से कस्बे बुधाना में जन्मे नवाजुद्दीन सिद्दीकी का सफर आसान नहीं रहा. उन्होंने केमिस्ट्री की पढ़ाई की और कुछ समय तक केमिस्ट के तौर पर भी काम किया. लेकिन उनके अंदर छिपा कलाकार उन्हें दिल्ली खींच लाया, जहां उन्होंने थिएटर की दुनिया में कदम रखा.

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उन्होंने कई इंटरव्यूज में अपने शुरुआती दिनों को याद किया. दिल्ली में अपने शुरुआती दिनों में गुजारा करने के लिए उन्होंने वॉचमैन की नौकरी की. इस दौरान वह थिएटर करते रहे और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लेने की कोशिश करते रहे. खास बात यह रही कि उन्होंने अपने संघर्ष के दिनों में परिवार से आर्थिक मदद लेने से भी परहेज किया और खुद के दम पर आगे बढ़ने का फैसला किया.

असली चुनौती मुंबई पहुंचने के बाद शुरू हुई. बॉलीवुड में शुरुआती दौर में उन्हें छोटे-छोटे रोल ही मिले. सरफरोश और मुन्ना भाई एमबीबीएस जैसी फिल्मों में उनकी मौजूदगी बेहद छोटी थी, जिसे लोग अक्सर नोटिस भी नहीं कर पाते थे. इस दौरान उन्हें आर्थिक तंगी, शेयरिंग में रहना और लंबे समय तक काम न मिलने जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ा.

लगातार संघर्ष के बाद साल 2012 उनकी किस्मत बदलने वाला साल रहा. जब अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ रिलीज हुई और इसमें फैजल खान का किरदार निभाने वाले नवाज़ुद्दीन अचानक से इंडस्ट्री के सबसे चर्चित चेहरों में से एक बन गए. उन्होंने इस फिल्म से पहले जबरदस्त संघर्ष किया और लंबे समय तक बिना सितारों वाली फिल्मों में काम किया, जब तक उनकी प्रतिभा को पूरी दुनिया ने नहीं पहचाना.

इसके बाद नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. रमन राघव 2.0, फोटोग्राफ और सेक्रेड गेम्स जैसे प्रोजेक्ट्स में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई. खासकर ‘सेक्रेड गेम्स’ में गणेश गायतोंडे का किरदार आज भी लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है.

नवाजुद्दीन का यह संघर्ष और जुनून आज की पीढ़ी के लिए मिसाल है. उन्होंने अपनी एक्टिंग से साबित किया है कि स्टारडम सिर्फ ‘दिखने’ पर निर्भर नहीं होता, बल्कि दिल और दिमाग से किरदार निभाने पर होता है. आज वे बॉलीवुड के सबसे बेहतरीन और महंगे अभिनेताओं में शुमार हैं.

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April 24, 2026, 18:49 IST

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