खरीफ सीजन में भूलकर भी न करें ये गलती! बारिश और जलभराव दोनों बिगाड़ सकते हैं पूरी फसल, अपनाएं ये ट्रिक

भीलवाड़ा. खरीफ सीजन की खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर रहती है, इसलिए किसानों के लिए पानी का सही प्रबंधन बेहद जरूरी है. कम बारिश के साथ-साथ खेत में पानी का अधिक भराव भी फसलों को नुकसान पहुंचा सकता है. मक्का, सोयाबीन, मूंगफली और उड़द जैसी फसलें लंबे समय तक जलभराव सहन नहीं कर पाती हैं, जिससे जड़ गलन और पौधों के सड़ने की समस्या बढ़ जाती है. किसानों को खेतों में पानी की निकासी के लिए नालियां बनाने की सलाह दी गई है.
कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि गहरी जुताई, गोबर की खाद और कम्पोस्ट के उपयोग से मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है. कम पानी वाले क्षेत्रों में बाजरा, ग्वार, मूंग और उड़द जैसी फसलें बेहतर विकल्प मानी जाती हैं. वहीं धान को सबसे अधिक पानी की आवश्यकता होती है. किसानों को मौसम विभाग के अधिकृत पूर्वानुमान के आधार पर ही बुवाई और सिंचाई का निर्णय लेना चाहिए, ताकि फसल को नुकसान से बचाया जा सके और बेहतर उत्पादन प्राप्त हो सके.
बारिश के बदले पैटर्न ने बढ़ाई किसानों की चिंता
कृषि विभाग के कृषि पर्यवेक्षक कजोड़मल गुर्जर ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में भीलवाड़ा में बारिश का पैटर्न तेजी से बदला है. कहीं कम समय में अत्यधिक बारिश हो रही है, तो कहीं लंबे सूखे अंतराल देखने को मिल रहे हैं. ऐसे में खेत में जल संरक्षण और जल निकासी, दोनों व्यवस्थाएं करना बेहद जरूरी हो गया है, क्योंकि फसल का पहला पोषण पानी ही है. बीज अंकुरण से लेकर दाना बनने तक हर चरण में पानी की सही मात्रा आवश्यक होती है. कम बारिश में पौधे सूखने लगते हैं, जबकि अधिक पानी भरने पर जड़ गलन, फफूंद और पौधों के सड़ने की समस्या बढ़ जाती है. इसलिए खरीफ सीजन में सफलता केवल बारिश के भरोसे नहीं, बल्कि पानी के सटीक प्रबंधन पर निर्भर करती है.
फसल के अनुसार पानी की जरूरत समझना जरूरी
मानसून सीजन में बुवाई से पहले किसानों को फसलों की पानी की आवश्यकता को समझना बेहद जरूरी है. बाजरा और ग्वार जैसी फसलें कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती हैं, जबकि मूंग और उड़द के लिए मध्यम नमी आवश्यक होती है. मक्का की शुरुआती बढ़वार के लिए पर्याप्त नमी जरूरी है, वहीं सोयाबीन जलभराव को बिल्कुल सहन नहीं कर पाती. धान को सबसे अधिक पानी की आवश्यकता होती है. किसानों को खेतों में पानी की निकासी की उचित व्यवस्था रखने, बारिश के बाद निराई-गुड़ाई करने, मौसम पूर्वानुमान देखकर ही सिंचाई करने तथा जलभराव वाले क्षेत्रों में ऊंची क्यारियां बनाने की सलाह दी गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि भारतीय मौसम विभाग और कृषि विज्ञान केंद्रों के अधिकृत पूर्वानुमान के बाद ही बुवाई का निर्णय लेना चाहिए, ताकि फसल को नुकसान से बचाया जा सके.
जलभराव की समस्या के लिए निकासी की व्यवस्था जरूरी
किसान अक्सर केवल कम बारिश को ही समस्या मानते हैं, जबकि खरीफ सीजन में पानी का ठहराव भी उतना ही नुकसानदायक होता है. मक्का, सोयाबीन, मूंगफली और उड़द जैसी फसलें लंबे समय तक जलभराव सहन नहीं कर पाती हैं. पानी जमा रहने से जड़ गलन, पत्तियां पीली पड़ने और पौधों के सड़ने की समस्या हो जाती है. इसलिए अतिरिक्त पानी की निकासी के लिए खेत में नालियां बनाना बेहद जरूरी है. वहीं इस बार मानसून कमजोर रहने के पूर्वानुमान भी सामने आ रहे हैं. ऐसे में कम पानी में फसल प्रबंधन करना किसानों के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है.
खेत में नमी बचाने के लिए करें कारगर उपाय
गहरी जुताई और जैविक खाद के उपयोग से मिट्टी की जलधारण क्षमता काफी बढ़ जाती है. खेत में गोबर की खाद, कम्पोस्ट और फसल अवशेष मिलाने से मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है. इसके अलावा, यदि समय रहते मेढ़बंदी और जल संरक्षण पर ध्यान दिया जाए तो बाद में सिंचाई पर होने वाला खर्च भी काफी कम किया जा सकता है.



