Rajasthan

Fridge vs Matka | धौलपुर में मटका उद्योग संकट में

Last Updated:May 02, 2026, 09:36 IST

Dholpur Potters Face Crisis Due to Fridge Use: धौलपुर में फ्रिज और प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग ने कुम्हारों के रोजगार को संकट में डाल दिया है. भीषण गर्मी के बावजूद मिट्टी के मटकों की बिक्री में भारी गिरावट आई है, जिससे कुम्हारों को आर्थिक परेशानी झेलनी पड़ रही है. बढ़ती लागत और कम मांग के कारण प्रेम सिंह और रेनू प्रजापति जैसे कलाकार अपना पुश्तैनी काम छोड़ने पर मजबूर हैं. स्थानीय लोगों ने प्रशासन से इस पारंपरिक मिट्टी कला को बचाने के लिए सरकारी सहायता और उचित बाजार उपलब्ध कराने की मांग की है ताकि यह विरासत विलुप्त न हो.

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Dholpur: धौलपुर जिले में जैसे-जैसे गर्मी का पारा चढ़ रहा है, वैसे-वैसे कुम्हारों के चेहरों पर मायूसी गहरी होती जा रही है. एक समय था जब धौलपुर के बाजारों में मटकों की दुकानों पर ग्राहकों की लंबी कतारें नजर आती थीं. ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों के लोग मटके के प्राकृतिक और शीतल जल को स्वास्थ्य के लिए वरदान मानते थे. लेकिन आज के आधुनिक युग में फ्रिज और प्लास्टिक की बोतलों ने हर घर में अपनी जगह बना ली है. इस तकनीकी बदलाव ने न केवल लोगों की आदतों को बदला है, बल्कि कुम्हार समुदाय के पुश्तैनी व्यवसाय पर भी सीधा प्रहार किया है.

स्थानीय कुम्हार प्रेम सिंह प्रजापति का कहना है कि पहले गर्मी शुरू होते ही काम का दबाव इतना होता था कि फुर्सत नहीं मिलती थी, लेकिन अब दुकानों पर सन्नाटा पसरा रहता है. फ्रिज की सुविधा ने मिट्टी के घड़ों की मांग को न्यूनतम कर दिया है. इसके अलावा, मटका बनाने की प्रक्रिया अब पहले से कहीं ज्यादा महंगी हो गई है. मिट्टी की उपलब्धता कम हुई है और ईंधन (आग सुलझाने के लिए लकड़ी-घास) व मजदूरी की लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. लागत बढ़ने के कारण जब मटकों की कीमत थोड़ी बढ़ाई जाती है, तो ग्राहक खरीदारी से कतराने लगते हैं. लागत और मुनाफे का यह असंतुलन कुम्हारों को कर्ज के जाल में धकेल रहा है.

रोजी-रोटी का संकट और पलायनकुम्हार समुदाय की रेनू प्रजापति ने चिंता जाहिर करते हुए बताया कि लगातार घटती बिक्री के कारण कई परिवार इस पुश्तैनी काम को छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं. युवाओं का इस कला से मोहभंग हो रहा है और वे मजदूरी की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. मिट्टी के मटके बनाने की यह कला, जो हमारी संस्कृति और परंपरा का अहम हिस्सा रही है, अब धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही है. अगर यही स्थिति बनी रही, तो आने वाली पीढ़ियां मिट्टी की सोंधी खुशबू वाले मटकों को केवल कहानियों और चित्रों में ही देख पाएंगी.

संरक्षण की दरकारधौलपुर के प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि इस कला को बचाने के लिए प्रशासन और समाज को सामूहिक प्रयास करने होंगे. कुम्हारों को सरकारी सहायता, उचित बाजार और मिट्टी कला के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है. मिट्टी के बर्तन न केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी श्रेष्ठ हैं. यदि पारंपरिक व्यवसायों को संरक्षण प्रदान नहीं किया गया, तो भारत की यह अनमोल विरासत हमेशा के लिए खो जाएगी.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें

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