Justice Yashwant Varma Cash Case Explained: कैश कांड वाले जस्टिस यशवंत वर्मा का अब क्या होगा? FIR से महाभियोग तक…एक्सपर्ट्स से समझिए कानूनी पेच

Justice Yashwant Varma Cash Case : कैश कांड में घिरे जस्टिस यशवंत वर्मा पर संसदीय कमेटी की रिपोर्ट लोकसभा स्पीकर के सामने पेश कर दी गई. यशवंत वर्मा सरकारी आवास से मिले नकदी मामले में संसदीय समिति को संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहे. केंद्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकती है. इसकी वजह है कि समिति ने यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से नोटों की अधजली गड्डियां मिलने के मामले में उन्हें दोषी पाया है. कैश किसका था, कहां से आया था, कैसे और क्यों जला था, इन सवालों का वह संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए हैं. यह समिति लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने गठित की थी. यह तीन सदस्यीय कमेटी थी.
दरअसल, जस्टिस (जांच) एक्ट के तहत लोकसभा अध्यक्ष की ओर से गठित समिति ने बुधवार को संसद के दोनों सदनों में अपनी रिपोर्ट सौंपी. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जस्टिस यशवंत वर्मा पर अधिक मात्रा में नकदी रखने, सबूतों से छेड़छाड़ करने और गोलमोल जवाब देने के आरोप ‘साबित’ हो गए हैं. यह मामला तब सामने आया था, जब 14 मार्च 2025 की रात उनके आवास पर आग लगी थी. आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को स्टोररूम में बड़ी मात्रा में आंशिक रूप से जले हुए नकदी के बंडल मिले थे. रिपोर्ट में समिति ने कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा नोटों के स्रोत, स्वामित्व या उनके वहां मौजूद होने को लेकर कोई विश्वसनीय स्पष्टीकरण नहीं दे सके. अब सवाल है कि आखिर जस्टिस वर्मा का क्या होगा?
अब जस्टिस यशवंत वर्मा का क्या होगा?इस बाबत एक्सपर्ट्स ने जो कहा है, यह जस्टिस वर्मा के लिए कहीं से भी सुखद नहीं है. जी हां, कानूनी विशेषज्ञों की मानें तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है. कारण कि कमेटी ने उन्हें कैश कांड में दोषी पाया है. हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जस्टिस यशवंत वर्मा के इस्तीफा देने के बाद महाभियोग की प्रक्रिया ‘अपने आप समाप्त’ हो गई है.
जस्टिस वर्मा पर दर्ज होगी एफआईआर?सीनियर एडवोकेट और संविधान विशेषज्ञ राकेश द्विवेदी ने कहा कि जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिकाएं खारिज किए जाने का किसी नए कदम पर असर नहीं पड़ेगा. उन्होंने कहा, ‘अब रिपोर्ट संसद में पेश हो चुकी है और उन्होंने (जस्टिस वर्मा) इस्तीफा भी दे दिया है, इसलिए उन्हें हटाया नहीं जा सकता. मेरी राय में महाभियोग प्रस्ताव अब निष्प्रभावी हो गया है, लेकिन रिपोर्ट के आधार पर निश्चित रूप से प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है.’
क्या महाभियोग भी चलेगा?वहीं, सीनियर एडवोकेट और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह ने कहा कि उनके विचार से इस्तीफा अभी स्वीकार नहीं किए जाने के कारण जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाया जा सकता है. उन्होंने कहा, ‘इस्तीफा देने की स्थिति में न्यायमूर्ति वर्मा को पेंशन पाने का अधिकार होगा, जबकि महाभियोग के जरिये हटाए जाने पर उन्हें पेंशन संबंधी लाभ नहीं मिलेंगे. और दूसरी बात अगर जांच समिति ने कहा है कि प्राथमिकी दर्ज होनी चाहिए, तो मुझे यकीन है कि प्राथमिकी दर्ज की जाएगी.’
कैश कांड में दोषी पाए गए जस्टिस वर्मा के सामने अब क्या विकल्प? FIR-महाभियोग पर एक्सपर्ट्स की राय
राजीव धवन की अलग थ्योरीसंविधान विशेषज्ञ और वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि जस्टिस यशवंत वर्मा का पद से इस्तीफा दे देने के बाद महाभियोग का सवाल ही नहीं उठता. उन्होंने कहा, ‘मेरे विचार से संसद का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो गया है. जहां तक प्राथमिकी का सवाल है, संसदीय कार्यवाही इसमें बाधा नहीं बनती. जब वह न्यायाधीश थे, तब प्राथमिकी के लिए भारत के प्रधान न्यायाधीश की अनुमति जरूरी थी, क्योंकि उन्हें न्यायाधीश के रूप में संरक्षण प्राप्त था. लेकिन अब वह संरक्षण समाप्त हो गया है.’ धवन ने कहा कि मामले में उचित जांच होनी चाहिए और यह केवल आपराधिक कार्यवाही के जरिये ही संभव है.
गोपाल शंकरनारायणन का अलग मतसीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि समिति की रिपोर्ट के आधार पर जस्यिस यशवंत वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है. उन्होंने कहा, ‘’ऐसा प्रतीत होता है कि समिति ने पूरी जिम्मेदारी न्यायमूर्ति वर्मा पर डाल दी है कि वह बताएं कि पैसा कहां से आया. अगर लुटियंस दिल्ली के एक एकड़ वाले बंगलों में रहने वाले सभी लोगों से उनके परिसरों में मिली हर वस्तु के बारे में जवाब मांगा जाए तो मेरा मानना है कि सैकड़ों प्राथमिकी दर्ज करनी पड़ सकती हैं.’
अन्य वकीलों की भी राय जानिएइलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल तिवारी ने कहा कि अब न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है. तिवारी ने कहा, ‘न्यायाधीशों को मिला संरक्षण उन्हें न्यायिक शक्तियों का स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल करने की अनुमति देता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे अपने घर में इतनी बड़ी मात्रा में नकदी रख सकते हैं. उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। अब सरकार को आगे बढ़ना चाहिए और कानून मंत्रालय को इस मामले में पहल कर प्राथमिकी दर्ज करनी चाहिए.’ एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल सोनी ने कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा अब न्यायाधीश नहीं हैं और उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर मामले की गहन जांच की जानी चाहिए.
संसदीय समिति की रिपोर्ट में क्या है?
रिपोर्ट में समिति ने कहा कि जस्टिस वर्मा नोटों के स्रोत, स्वामित्व या उनके वहां मौजूद होने को लेकर कोई विश्वसनीय स्पष्टीकरण नहीं दे सके. समिति ने बाद की जांच प्रक्रिया पर भी चिंता जताई. रिपोर्ट में कहा गया कि महत्वपूर्ण सबूतों को न तो सही तरीके से सुरक्षित रखा गया और न ही संरक्षित किया गया. स्टोररूम की स्थिति को कानूनी तौर पर सील कर जांच किए जाने से पहले ही बदल दिया गया था. रिपोर्ट में बरामद नकदी के गायब होने या उपलब्ध न होने पर भी सवाल उठाए गए हैं. समिति ने कहा कि भौतिक साक्ष्यों के गायब होने की वजह घटनास्थल को सुरक्षित रखने में लापरवाही और आवास से जुड़े कर्मियों द्वारा स्टोररूम में की गई गतिविधियां थीं.
रिपोर्ट में और क्या-क्या
हालांकि, समिति ने यह भी कहा कि उसे ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि न्यायमूर्ति वर्मा ने स्वयं नकदी हटाई थी. समिति ने न्यायमूर्ति वर्मा के जवाब और खासकर 22 मार्च 2025 को दिए गए उनके लिखित स्पष्टीकरण की आलोचना करते हुए कहा कि यह असंतोषजनक था और इसमें स्पष्टता, पारदर्शिता तथा संस्थागत जवाबदेही का अभाव था.
यह रिपोर्ट दो खंडों में तैयार की गई है, जिसमें जांच के दौरान दर्ज मौखिक गवाहियां और दस्तावेजी साक्ष्य शामिल हैं. इससे पहले तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा गठित आंतरिक जांच समिति ने भी निष्कर्ष निकाला था कि जिस स्टोररूम से नकदी मिली थी, उस पर न्यायमूर्ति वर्मा का प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण था.
उस समय दिल्ली हाईकोर्ट में कार्यरत न्यायमूर्ति वर्मा को विवाद के बाद उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद हाईकोर्ट वापस स्थानांतरित कर दिया गया था. बाद में संसद ने उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की थी. हालांकि, न्यायमूर्ति वर्मा के इस्तीफा देने के बाद यह प्रक्रिया प्रभावी रूप से समाप्त हो गई. (इनपुट भाषा-आईएएनएएस से भी)



