न बिजली, न फ्रिज! मिट्टी और गोबर के ‘बिटोरा’ में सालों तक सुरक्षित रहता है सामान, गांव का अनोखा जुगाड़

Last Updated:May 04, 2026, 11:05 IST
Dholpur Hindi News: ग्रामीण भारत में आज भी कई पारंपरिक तकनीकें उपयोग में हैं, जो कम खर्च में शानदार परिणाम देती हैं. ‘बिटोरा’ ऐसी ही एक देसी स्टोरेज प्रणाली है, जिसे मिट्टी और गोबर से तैयार किया जाता है. यह प्राकृतिक गोदाम अनाज और अन्य सामान को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद करता है. इसकी खासियत यह है कि इसमें तापमान संतुलित रहता है और कीड़े-मकोड़ों से भी सुरक्षा मिलती है. बिना बिजली या आधुनिक उपकरणों के यह तरीका पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल है. गांवों में यह न सिर्फ स्टोरेज का साधन है, बल्कि संस्कृति और परंपरा का भी अहम हिस्सा है. आज के समय में जहां लोग महंगे स्टोरेज सिस्टम पर निर्भर हैं.
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धौलपुर: अगर आप राजस्थान के धौलपुर जिले के गांवों से होकर गुजरेंगे तो आपको रास्ते में छोटे-छोटे गोल, चौकोर या पिरामिड आकार के ढांचे दिखाई देंगे. पहली नजर में ये किसी झोपड़ी जैसे लगते हैं, लेकिन गांव की भाषा में इन्हें “बिटोरा” कहा जाता है. दरअसल, ये गांव के देसी गोदाम होते हैं, जहां गोबर के उपले यानी कंडों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाता है.
धौलपुर के मालोनी खुर्द गांव के ग्रामीण विशंभर दयाल शर्मा बताते हैं कि बिटोरा बनाने की परंपरा करीब 150 से 200 साल से अधिक पुरानी है. उनके दादा-परदादा के समय से गांवों में यह तकनीक इस्तेमाल होती आ रही है. उस समय गांवों में न सीमेंट था, न पक्के मकान और न ही आधुनिक गोदाम. ऐसे में ग्रामीणों ने मिट्टी, गोबर, लकड़ी और घास-फूस से यह देसी तरीका तैयार किया था, जो आज भी गांवों में पूरी तरह उपयोग में लिया जा रहा है.
बिटोरे के अंदर रखा सामान खराब नहीं होताग्रामीण इलाकों में आज भी ज्यादातर किसान खाना बनाने के लिए उपलों का इस्तेमाल करते हैं. हर घर में महिलाएं गोबर से कंडे बनाती हैं, लेकिन खुले में रखने पर बारिश और नमी से इनके खराब होने का खतरा रहता है. इसी वजह से किसान बिटोरा बनाते हैं, ताकि उपले सालों तक सुरक्षित रह सकें। खास बात यह है कि तेज बारिश, आंधी या तूफान में भी बिटोरे के अंदर रखा सामान खराब नहीं होता.
बारिश का पानी आसानी से नीचे फिसल जाताविशंभर दयाल शर्मा बताते हैं कि बिटोरा बनाने में ज्यादा खर्च नहीं आता. किसान खेतों और घरों के आसपास मिलने वाली मिट्टी, गोबर और घास-फूस को इकट्ठा करके इसे तैयार कर लेते हैं. इसकी छत ढालू बनाई जाती है, जिससे बारिश का पानी आसानी से नीचे फिसल जाता है और अंदर नमी नहीं पहुंचती.
महिलाओं की सबसे अहम भूमिका होतीबिटोरा बनाने में गांव की महिलाओं की सबसे अहम भूमिका होती है। इसे एक महिला अकेले नहीं बना सकती. गांव की चार से पांच महिलाएं मिलकर गोल पिरामिड आकार का बिटोरा तैयार करती हैं. खास बात यह भी है कि कई गांवों में इसे बनाने से पहले पंडित से शुभ मुहूर्त भी निकलवाया जाता है साथ ही हल्दी से बिटौरा का पूजन भी किया जाता है, बिटोरा से उपले या कंडे मंगलवार और बृहस्पतिवार को निकलना निषेध माना जाता था.
आज आधुनिक दौर में भी धौलपुर के गांवों में बिटोरा सिर्फ उपले रखने की जगह नहीं, बल्कि गांव की संस्कृति, परंपरा और देसी तकनीक की पहचान बना हुआ है और ये बिटोरा महिलाओं की मेहनत का प्रतीक भी माना जाता है.
About the AuthorJagriti Dubey
Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें
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Dhaulpur,Rajasthan



