Opinion: थिएटर्स के बाद, कैसे OTT बन रहा टीवी के लिए खतरा?

नई दिल्ली. ट्रेडिशनल टीवी की सबसे बड़ी कमी उसका फिक्स्ड शेड्यूल रहा है. दर्शकों को अपने पसंदीदा शो के लिए रात 8 या 9 बजे तक इंतजार करना पड़ता था. अगर कोई एपिसोड छूट जाता था, तो उन्हें अगले दिन के रिपीट टेलीकास्ट पर निर्भर रहना पड़ता था. इसके उलट, OTT प्लेटफॉर्म ने दर्शकों को टाइम की पूरी आजादी दी है. बिंज-वॉचिंग के जमाने में दर्शक जब चाहें, कहीं भी और जितना चाहें कंटेंट देख सकते हैं. OTT जो फ्लेक्सिबिलिटी देता है, जैसे बस में सफर करते समय मोबाइल स्क्रीन पर बिंज-वॉचिंग करना या वीकेंड की रात को एक ही बार में पूरी सीरीज खत्म करना, उसकी बराबरी ट्रेडिशनल टीवी के फिक्स्ड शेड्यूल से कभी नहीं की जा सकती.
सास-बहू सीरियल बनाम ओरिजिनल और रोमांचक कहानियांटीवी चैनलों के टीआरपी-बेस्ड रेटिंग सिस्टम ने उनके कंटेंट को एक ही पैटर्न में बांध दिया है. सालों से चले आ रहे सास-बहू के ड्रामा, बेमतलब के ट्विस्ट और ओवर-ड्रामाटाइजेशन ने युवा और समझदार दर्शकों को टेलीविजन से पूरी तरह दूर कर दिया है. OTT ने भारतीय दर्शकों को ‘मिर्जापुर’, ‘पंचायत’, ‘पाताल लोक’ और ‘स्कैम 1992’ जैसे रियलिस्टिक, थ्रिलिंग और अलग-अलग तरह के कंटेंट का स्वाद चखाया है. दर्शक अब वही 20 साल पुराना सास-बहू का फॉर्मूला देखने के लिए अपने टीवी स्क्रीन पर वापस नहीं जाना चाहते.
कॉर्ड-कटिंग का नया दौरट्रेडिशनल टीवी पर 30 मिनट के सीरियल में से 12 से 15 मिनट कमर्शियल ऐड में चले जाते हैं. बार-बार ब्रेक और लंबे कमर्शियल देखने के एक्सपीरियंस पर बहुत बुरा असर डालते हैं. OTT पर बिना रुकावट (ऐड-फ्री सब्सक्रिप्शन ऑप्शन) कंटेंट देखने की आदत ने दर्शकों को टीवी ऐड से चिढ़ा दिया है. इस वजह से कॉर्ड-कटिंग का ट्रेंड भारत के छोटे शहरों और कस्बों में भी तेजी से फैल रहा है. अपने DTH को रिचार्ज करने के बजाय, लोग अपने स्मार्ट टीवी पर इंटरनेट कनेक्शन और 2-3 OTT ऐप्स का सब्सक्रिप्शन खरीदना ज्यादा सस्ता और फायदेमंद पा रहे हैं.
स्पोर्ट्स और लाइव इवेंट्सलंबे समय तक स्पोर्ट्स और बड़े लाइव अवॉर्ड शो पारंपरिक TV चैनलों के लिए सबसे मजबूत डिफेंस थे. यही वजह थी कि लोग अपने केबल कनेक्शन घर पर ही रखते थे. लेकिन जिओ सिनेमा और जिओ हॉटस्टार जैसी बड़ी कंपनियों ने लाइव स्पोर्ट्स के डिजिटल स्ट्रीमिंग राइट्स हासिल करके इस आखिरी गढ़ को भी खत्म कर दिया है. जब मोबाइल फोन और स्मार्ट टीवी पर लाइव 4K मैच स्ट्रीमिंग मुफ्त या बहुत कम कीमत पर उपलब्ध है, तो आम दर्शक स्पोर्ट्स के लिए अपना टीवी रिचार्ज क्यों करेंगे?
क्या टीवी का भी बदलेगा फॉर्मेट?यह कहना गलत नहीं होगा कि OTT न सिर्फ फिल्मों के लिए, बल्कि पूरी ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री के लिए एक अस्तित्व का खतरा बन गया है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पारंपरिक टीवी रातोंरात गायब हो जाएगा. ग्रामीण भारत में जहां डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी डेवलप हो रहा है, टीवी शायद कुछ समय तक बचा रहेगा. लेकिन अगर टीवी इंडस्ट्री को लंबे समय तक बने रहना है, तो उसे अपने कंटेंट की क्वालिटी सुधारनी होगी, एडवरटाइजिंग का बोझ कम करना होगा और डिजिटल फॉर्मेट को अपनाना होगा. नहीं तो, जैसे रेडियो कुछ खास ऑडियंस तक ही सीमित रहा है, वैसे ही आने वाले दशक में ट्रेडिशनल टीवी का भी यही हाल हो सकता है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए Hindi उत्तरदायी नहीं है.)



