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Papaya Cultivation in Udaipur | पपीता खेती का नया केंद्र बना उदयपुर | Udaipur Farmers Success Story

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उदयपुर के किसानों के लिए वरदान बनी पपीते की खेती, मावली-भटेवर बने नए हब

Last Updated:May 13, 2026, 10:08 IST

Papaya Farming in Udaipur: उदयपुर के मावली और भटेवर क्षेत्र में किसान पारंपरिक खेती छोड़ हाईटेक पपीता बागवानी से अपनी आय बढ़ा रहे हैं. ताइवान की रेडलेडी वैरायटी और मल्चिंग-ड्रिप तकनीक के इस्तेमाल से कम पानी में बंपर पैदावार हो रही है. जिले के 75 हेक्टेयर में हो रही इस खेती से किसान प्रति पौधा 80 किलो तक फल प्राप्त कर रहे हैं. स्थानीय बाजार में बढ़ती मांग और बिचौलियों की समाप्ति ने उदयपुर को पपीते का नया हब बना दिया है.

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Udaipur: झीलों की नगरी उदयपुर अब अपनी खूबसूरती के साथ-साथ कृषि क्षेत्र में भी नई पहचान बना रही है. दक्षिण राजस्थान में सिरोही के बाद अब उदयपुर जिला पपीता उत्पादन के एक बड़े केंद्र के रूप में उभर कर सामने आया है. जिले के मावली और भटेवर क्षेत्र के किसानों ने पारंपरिक फसलों के बजाय हाईटेक तरीके से पपीते की बागवानी शुरू की है. कम लागत, कम पानी और बाजार में लगातार बनी रहने वाली मांग ने इस फल को किसानों के लिए ‘नगदी खजाना’ बना दिया है.

वर्तमान में उदयपुर के करीब 75 हेक्टेयर क्षेत्र में पपीते की खेती हो रही है, जिससे 100 से अधिक प्रगतिशील किसान जुड़े हुए हैं. किसान मुख्य रूप से ताइवान की मशहूर ‘रेडलेडी’ वैरायटी उगा रहे हैं. इस किस्म की सबसे बड़ी खूबी इसकी कम ऊंचाई है, जिसकी वजह से तेज हवाओं और आंधियों में भी पौधों के टूटने का खतरा कम रहता है. पैदावार के मामले में भी यह वैरायटी बेजोड़ है. एक हेक्टेयर में लगभग 2500 पौधे रोपे जाते हैं और प्रत्येक पौधा 70 से 80 किलो तक फल देता है. औसतन एक पपीते का वजन डेढ़ से दो किलो तक होता है.

मल्चिंग और ड्रिप से बढ़ी पैदावारमावली और भटेवर के किसान अब आधुनिक कृषि तकनीकों का भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं. खेतों में मल्चिंग तकनीक (Mulching) अपनाई जा रही है, जिससे मिट्टी की नमी सुरक्षित रहती है और अनावश्यक खरपतवार नहीं उगते. इसके अलावा, ड्रिप सिंचाई प्रणाली (Drip Irrigation) के जरिए पानी की भारी बचत हो रही है. इस तकनीक की मदद से तरल खाद सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचती है, जिससे पौधों का विकास तेजी से होता है और लागत में भी कमी आती है.

कम समय में मोटी कमाई का जरियापपीता एक ऐसी नकदी फसल है जो बहुत जल्दी मुनाफा देना शुरू कर देती है. इसकी बुवाई अप्रैल और मई के महीनों में होती है और एक साल के भीतर ही फल तैयार हो जाते हैं. एक बार फसल तैयार होने के बाद यह करीब डेढ़ साल तक लगातार उत्पादन देती रहती है. उदयपुर उद्यान विभाग के उपनिदेशक डॉ. कैलाशचंद्र शर्मा का कहना है कि स्थानीय बाजार में पपीते की भारी मांग है. किसान अपनी उपज सीधे ग्राहकों और स्थानीय मंडियों में बेच रहे हैं, जिससे उन्हें बिचौलियों को कमीशन नहीं देना पड़ता और मुनाफे का बड़ा हिस्सा सीधे उनकी जेब में जा रहा है.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें

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