Rajasthan

नाहरगढ़ के नन्हे बाघों की दर्दभरी शुरुआत! मां ने छोड़ा, अब इंसानी हाथों में पल रही जिंदगी

Last Updated:May 09, 2026, 14:59 IST

Nahargarh Biological Park tiger cubs : जयपुर के नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में जन्मे दो बाघ शावकों का वीडियो सोशल मीडिया पर लोगों का दिल जीत रहा है, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर सवाल भी छिपा है. मां द्वारा शावकों को अपनाने से इनकार के बाद अब उनकी परवरिश इंसानी देखरेख में हो रही है. यह मामला कैप्टिव वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट और वन्यजीवों के बदलते व्यवहार पर नई बहस खड़ी कर रहा है.

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नाहरगढ़ के नन्हे बाघ मां से बिछड़े, अब इंसानी देखरेख में पल रही जिंदगीZoomदो नन्हे बाघ

जयपुर : जयपुर के नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क से सामने आया दो नन्हे बाघ शावकों का वीडियो पहली नजर में बेहद भावुक और प्यारा लगता है. वीडियो में दोनों शावक लड़खड़ाते कदमों से चलते, एक-दूसरे से लिपटते और आंखें खोलते दिखाई देते हैं. सोशल मीडिया पर लोग उन्हें “फाइटर” कह रहे हैं, लेकिन इस वीडियो के पीछे एक ऐसी हकीकत छिपी है जो कैप्टिव वाइल्डलाइफ सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करती है.

18 अप्रैल 2026 को बाघिन “भक्ति” ने दो शावकों को जन्म दिया था. जन्म के कुछ समय बाद ही बाघिन ने दोनों शावकों को दूध पिलाने और अपने पास रखने से इनकार कर दिया. वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार जन्म के शुरुआती दिनों में मां का दूध शावकों के लिए सिर्फ भोजन नहीं बल्कि जीवन रक्षा का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत होता है. इसी दूध से नवजातों को शुरुआती रोग प्रतिरोधक क्षमता मिलती है, जो उन्हें संक्रमण और बीमारियों से बचाने में मदद करती है.

मां का दूध नहीं मिला, अब मशीनों के सहारे जिंदगीस्थिति को गंभीर देखते हुए पशु चिकित्सा पॉलीक्लिनिक पांच बत्ती के मेडिकल बोर्ड ने दोनों शावकों को नियोनेटल केयर यूनिट में शिफ्ट करने का फैसला लिया. तब से शावकों की देखभाल वन विभाग और विशेषज्ञों की निगरानी में की जा रही है. उन्हें विशेष फॉर्मूला मिल्क दिया जा रहा है, जिसे वन्यजीवों के नवजात शावकों के लिए तैयार किया जाता है. यह मिल्क पोषण से भरपूर होता है, लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि यह मां के दूध का पूरी तरह विकल्प नहीं हो सकता.

नाहरगढ़ में क्यों बढ़ रहे हैं हैंड रियरिंग के मामले?नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में यह पहला मामला नहीं है. इससे पहले भी लेपर्ड, हायना, टाइगर और लायन शावकों को हैंड रियरिंग की जरूरत पड़ चुकी है. लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने विशेषज्ञों का ध्यान कैप्टिव वातावरण में वन्यजीवों के व्यवहारिक बदलावों की ओर खींचा है. वन्यजीव वैज्ञानिकों के मुताबिक जंगल में जानवर स्वाभाविक वातावरण में शिकार, मातृत्व और सामाजिक व्यवहार सीखते हैं, जबकि कैद में सीमित जगह, लगातार मानवीय गतिविधियां, कृत्रिम माहौल और तनाव उनके व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं.

तनाव या कैद? क्यों शावकों को ठुकरा रहीं मांएंकई बार प्रसव के दौरान असुरक्षा की भावना, हार्मोनल असंतुलन या मानसिक तनाव की वजह से मादा अपने शावकों को स्वीकार नहीं करती. हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि हर मामला एक जैसा नहीं होता. हाल ही में नाहरगढ़ की ही बाघिन “रानी” ने पांच शावकों को जन्म दिया और सामान्य तरीके से उनकी परवरिश कर रही है. इससे साफ है कि समस्या हर मादा में नहीं, बल्कि कुछ विशेष परिस्थितियों में सामने आती है.

मां की गोद नहीं, कैमरों के बीच पल रहे शावकवर्तमान में दोनों शावकों की हालत स्थिर बताई जा रही है और वन विभाग लगातार उनकी निगरानी कर रहा है. लेकिन यह मामला सिर्फ दो शावकों की जिंदगी तक सीमित नहीं है. यह सवाल अब गंभीर चर्चा का विषय बन चुका है कि क्या कैप्टिव वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट में ऐसा कुछ बदल रहा है, जो प्राकृतिक मातृत्व व्यवहार को प्रभावित कर रहा है. इन शावकों की जिंदगी फिलहाल सुरक्षित हाथों में है, लेकिन उनकी शुरुआत मां की गोद के बजाय मशीनों, कैमरों और इंसानी देखभाल के बीच हुई है. यही आधुनिक वन्यजीव संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौती भी मानी जा रही है.

About the AuthorRupesh Kumar Jaiswal

A Delhi University graduate with a postgraduate Diploma in Journalism and Mass Communication, I work as a Content Editor with the Rajasthan team at India Digital. I’m driven by the idea of turning raw in…और पढ़ें

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