जहां कभी गूंजती थीं तालियां, आज पसरा है सन्नाटा! बीकानेर का गंगा थियेटर सुनाता है सुनहरे दौर की दर्दभरी कहानी

Last Updated:July 08, 2026, 14:55 IST
Ganga Theatre Bikaner: बीकानेर का गंगा थियेटर कभी शहर की सांस्कृतिक और मनोरंजन गतिविधियों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था. एक समय ऐसा था जब यहां नई फिल्मों के प्रदर्शन पर दर्शकों की लंबी कतारें लगती थीं और तालियों की गूंज पूरे परिसर में सुनाई देती थी. बदलते समय, मल्टीप्लेक्स संस्कृति और डिजिटल मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के साथ इस ऐतिहासिक सिनेमा हॉल की रौनक धीरे-धीरे फीकी पड़ गई. आज गंगा थियेटर अपनी पुरानी चमक खो चुका है और सन्नाटे में बीते सुनहरे दौर की यादें समेटे खड़ा है. यह इमारत केवल एक सिनेमा हॉल नहीं, बल्कि बीकानेर की सांस्कृतिक विरासत और फिल्म प्रेमियों की अनगिनत यादों का प्रतीक है. स्थानीय लोग आज भी इसके स्वर्णिम दौर को याद करते हैं.
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बीकानेर. लाल बलुआ पत्थर से निर्मित गंगा थियेटर कभी बीकानेर की सांस्कृतिक पहचान और मनोरंजन का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था. जहां कभी नाटक, लोक कलाओं और फिल्मों की गूंज सुनाई देती थी, वहीं आज यह ऐतिहासिक धरोहर वीरानी और उपेक्षा का शिकार है. वर्ष 1924 में महाराजा गंगा सिंह द्वारा बनवाया गया यह थियेटर न केवल बीकानेर बल्कि पूरे उत्तर भारत की सांस्कृतिक धरोहरों में विशेष स्थान रखता है.
राजकीय डूंगर महाविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ. श्रीराम नायक ने बताया कि गंगा थियेटर राजस्थान का दूसरा थिएटर था. इससे पहले पहला थिएटर झालावाड़ में स्थापित हुआ था. महाराजा गंगा सिंह ने इस भवन का निर्माण किसी व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि कला और लोक संस्कृति के संरक्षण के उद्देश्य से कराया था. वे स्वयं कला के बड़े संरक्षक थे और बीकानेर के प्रसिद्ध अग्नि नृत्य सहित कई लोक कलाओं को उन्होंने संरक्षण दिया.
बीकानेर लोकनाट्य और रम्मत की समृद्ध परंपराडॉ. नायक ने बताया कि बीकानेर लोकनाट्य और रम्मत की समृद्ध परंपरा वाला क्षेत्र रहा है. स्थानीय कलाकारों को मंच उपलब्ध कराने के लिए गंगा थियेटर की स्थापना की गई थी. हालांकि भवन का निर्माण 1924 में पूरा हो गया था, लेकिन आमजन के लिए इसे वर्ष 1937 में खोला गया.
सबसे लोकप्रिय मनोरंजन केंद्र बन गयासमय के साथ यह थियेटर शहर का सबसे लोकप्रिय मनोरंजन केंद्र बन गया. फिल्मों के टिकट लेने के लिए लंबी-लंबी कतारें लगती थीं और नई फिल्मों के अधिकांश शो हाउसफुल रहते थे. वर्ष 1950 के दशक में इसे गोलछा ग्रुप को लीज पर दिया गया, लेकिन बाद के वर्षों में विभिन्न विवादों के चलते इसकी चमक फीकी पड़ती गई. आखिरकार वर्ष 2005 में इस ऐतिहासिक थियेटर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो गए.
उत्तर भारत की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहरआज भी इस भवन के भीतर पुरानी टिकट खिड़की, शो बोर्ड और दीवारों पर बनी आकर्षक कलाकृतियां उस स्वर्णिम दौर की गवाही देती हैं. लेकिन रखरखाव के अभाव में यह धरोहर धीरे-धीरे जर्जर होती जा रही है. डॉ. श्रीराम नायक का मानना है कि समय के अनुसार इस थियेटर का पुनर्विकास और संरक्षण बेहद आवश्यक है. उनका कहना है कि यह केवल बीकानेर ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर है. इसके ट्रस्टियों और संबंधित विभागों को इसे पुनर्जीवित करने की दिशा में गंभीर प्रयास करने चाहिए.
सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों की चमक छीन लीस्थानीय बुजुर्ग आज भी गंगा थियेटर से जुड़ी यादों को भावुक होकर याद करते हैं. उनके अनुसार, पहली फिल्म देखने का रोमांच, दोस्तों के साथ बिताए पल और सिनेमा के बाहर लगने वाली भीड़ आज केवल स्मृतियों में रह गई है. मल्टीप्लेक्स और मोबाइल मनोरंजन के दौर ने सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों की चमक छीन ली, लेकिन गंगा थियेटर आज भी बीकानेर के सांस्कृतिक इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता.
About the AuthorJagriti Dubey
Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें
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Bikaner,Rajasthan



