भारत के FCRA पर हंगामा क्यों? विदेशी फंडिंग पर कहां-कहां सख्त कानून, अमेरिका का दोगलापन देखिए

FCRA News: भारत अब ‘फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट’ का नट-बोल्ट टाइट करने जा रहा है. एफसीआरए यानी फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट. हिंदी में इसे विदेशी अंशदान विनियमन कानून कहते हैं. सरकार ने एफसीआरए (FCRA) में संशोधन का प्रस्ताव लाया है. इस प्रस्ताव मात्र से ही अमेरिका को मिर्ची लग गई है. डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद राइली मूर तो जहर उगल रहे हैं. वह इसे ईसाई समुदाय पर हमला बता रहे हैं. भारत को गीदड़भभकी दे रहे हैं. मगर सवाल है कि क्या भारत ऐसा करने वाला दुनिया में अकेला देश है? क्या दुनिया के अन्य देशों में विदेसी फंडिंग पर कोई कानून नहीं है? चलिए इसकी पड़ताल करते हैं.
दरअसल, भारत में विदेशी अंशदान (विनियमन) कानून में किए गए हालिया बदलाव दुनिया के कई देशों के नियमों से काफी मिलते-जुलते हैं. केवल भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका से लेकर पूर्वी यूरोप तक कई देश विदेशी फंडिंग पर कड़ी नजर रख रहे हैं. मकसद यह सुनिश्चित करना है कि विदेश से आने वाला पैसा पूरी तरह पारदर्शी हो. उसका गलत इस्तेमाल न हो. कोई विदेशी संस्था या सरकार किसी देश की नीतियों या समाज को प्रभावित न कर सके. भारत के हालिया कानूनी बदलाव में सेंट्रलाइज़्ड ट्रैकिंग, असली डोनर की जानकारी देना और सख्त प्रशासनिक सीमाएं वाले प्रस्ताव हैं. यह दुनिया भर के बड़े लोकतंत्रों और अंतरराष्ट्रीय रेगुलेटर्स द्वारा अपनाए गए उपायों से सीधे मेल खाते हैं.
भारत में एफसीआरए के नए नियमों के तहत विदेशी फंड की निगरानी पहले से ज्यादा सख्त कर दी गई है. अब फंड का पूरा रिकॉर्ड रखना, असली दानदाता की जानकारी देना और पैसे के इस्तेमाल पर कड़ी नजर रखना जरूरी है. ऐसे ही नियम दुनिया के कई दूसरे देशों में भी लागू हैं.
अमेरिका में क्या हैं नियम?अमेरिका में विदेशी प्रभाव को ‘फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट’ (FARA) के जरिए रेगुलेट किया जाता है. एफएआरए (FARA) के तहत यह जरूरी है कि कोई भी संस्था या व्यक्ति जो विदेशी निर्देश या फंडिंग के तहत वकालत, लॉबिंग या पब्लिक रिलेशन का काम करता है, उसे डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस के पास सार्वजनिक रूप से रजिस्टर करना होगा. भारत के FCRA सिंगल-विंडो सिस्टम की तरह ही, अमेरिकी सिस्टम में भी पूरी वित्तीय जानकारी देना, ट्रांज़ैक्शन की विस्तृत रिपोर्टिंग और रियल-टाइम ऑडिटिंग जरूरी है. यानी उसे यह भी बताना होता है कि उसे कितना पैसा मिला, पैसा कहां से आया और उसका इस्तेमाल कैसे किया गया. दोनों सिस्टम इस सिद्धांत पर काम करते हैं कि विदेशी वित्तीय मदद सरकारी रेगुलेटर्स को पूरी तरह से दिखनी चाहिए ताकि कोई छिपा हुआ विदेशी हित घरेलू नीति या सार्वजनिक नैरेटिव को प्रभावित न कर सके.
पूर्वी यूरोप में भी सख्ती
स्लोवाकिया ने भी हाल ही में ऐसा कानून बनाया है, जिसके तहत अगर किसी गैर-सरकारी संगठन को विदेश से तय सीमा से ज्यादा पैसा मिलता है, तो उसे हर साल दानदाताओं की पूरी जानकारी सरकार को देनी होगी. यह कानून सरकारी अधिकारियों को रोजमर्रा के कामकाज पर नजर रखने, असली डोनर के स्रोतों की जांच करने और नियमों का पालन न करने वाली संस्थाओं पर जुर्माना लगाने का अधिकार देता है.
यह व्यवस्था भारत के FCRA नियमों से काफी मिलती है. भारत में भी विदेशी फंड को किसी दूसरी संस्था को आगे देने (सब-ग्रांट) पर रोक है और सरकार यह सुनिश्चित करती है कि पैसा उसी संस्था द्वारा इस्तेमाल किया जाए, जिसे वह मिला है.
जॉर्जिया में भी लागू हुआ नया कानूनइसी तरह जॉर्जिया ने हाल ही में अपना ‘फॉरेन इन्फ्लुएंस ट्रांसपेरेंसी लॉ’ लागू किया है. इसके तहत अपनी फंडिंग का 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेश से पाने वाले गैर-लाभकारी संगठनों और मीडिया आउटलेट्स को विदेशी-फंडेड संस्थाओं के तौर पर रजिस्टर करना जरूरी है. यह कानून अनिवार्य वित्तीय जानकारी देने, सरकार द्वारा अनुपालन ऑडिट और नियमों का पालन न करने पर भारी प्रशासनिक जुर्माना लगाने का प्रावधान करता है. भारत की खास रजिस्ट्रेशन जरूरतों की तरह ही जॉर्जिया का कानूनी ढांचा यह पक्का करता है कि विदेशी पूंजी पर अधिक निर्भर संस्थाएं सीधे रेगुलेटरी निगरानी में काम करें.
रूस में भी कड़े प्रावधानरूस में भी विदेशी फंडिंग को लेकर काफी सख्त नियम हैं. जी हां, रूस विदेशी योगदान को रेगुलेट करने के लिए एक व्यापक सिस्टम बनाए हुए है. इसके तहत विदेशी वित्तीय मदद पाने वाले संगठनों को रजिस्टर करना और सभी सार्वजनिक जानकारी में स्पष्ट रूप से लेबल लगाना जरूरी है. सरकारी एजेंसियां बिना पूर्व सूचना के उनके खातों और वित्तीय रिकॉर्ड की जांच कर सकती हैं. अगर नियमों का पालन नहीं किया जाता, तो संस्था का लाइसेंस रद्द किया जा सकता है या उसके कामकाज पर रोक लगाई जा सकती है.
भारत में भी कुछ ऐसे ही नियमभारत के FCRA में भी लाइसेंस का समय-समय पर नवीनीकरण, विदेशी फंड से बनी संपत्तियों पर सरकारी निगरानी और नियमों के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई जैसे प्रावधान मौजूद हैं. कुल मिलाकर, दुनिया के कई देशों का मानना है कि विदेशी फंडिंग पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए. भारत के FCRA में किए गए हालिया बदलाव भी इसी वैश्विक सोच का हिस्सा माने जा रहे हैं, जहां विदेशी धन के स्रोत और उसके इस्तेमाल पर सरकारें पहले से कहीं अधिक सख्त निगरानी रख रही हैं.



