एक शिला में शिवलिंग के साथ रावण की मूर्ति, कोटा के 500 साल पुराने शिवालय की अनोखी कहानी जानकर रह जाएंगे हैरान

Last Updated:August 16, 2026, 19:49 IST
Kota 500 Year Old Shiva Temple: कोटा में स्थित करीब 500 साल पुराने एक प्राचीन शिवालय की अनोखी धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान लोगों को आकर्षित करती है. इस मंदिर की सबसे खास बात यहां मौजूद एक शिला है, जिसमें शिवलिंग के साथ रावण की दुर्लभ प्रतिमा होने की बात बताई जाती है. मंदिर की प्राचीनता और इसकी अनूठी शिल्पकला श्रद्धालुओं के साथ पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है. यहां आने वाले भक्त भगवान शिव के दर्शन करने के साथ इस अनोखी प्रतिमा को भी देखते हैं. स्थानीय मान्यताओं और मंदिर से जुड़ी परंपराओं के कारण इसकी खास पहचान बनी हुई है.
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कोटा: सावन के सोमवार पर भगवान भोलेनाथ के जयकारों से मंदिर और शिवालय गूंज उठे हैं. कोटा के नांता क्षेत्र में स्थित करीब 500 साल पुराना यह प्राचीन शिवालय अपनी अनूठी बनावट, धार्मिक मान्यताओं और दुर्लभ शिल्पकला के कारण श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. सावन के पूरे महीने यहां दर्शन और जलाभिषेक के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां एक ही विशाल शिला को तराशकर शिवलिंग और भगवान शिव को अपना शीश अर्पित करते रावण की प्रतिमा बनाई गई है. देशभर में इस तरह की प्रतिमा बेहद दुर्लभ मानी जाती है. प्रतिमा में रावण को अपने हाथों से स्वयं का शीश काटकर भगवान शिव के चरणों में समर्पित करते हुए दर्शाया गया है, जो उसकी कठोर तपस्या और शिवभक्ति का प्रतीक माना जाता है.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रावण ने भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए कैलाश पर्वत पर वर्षों तक कठिन तप किया. जब भगवान शिव प्रसन्न नहीं हुए तो उसने एक-एक कर अपने शीश अर्पित करने शुरू कर दिए. रावण की इस अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए, वरदान प्रदान किया और उसे चंद्रहास नामक दिव्य तलवार भेंट की. इसी कथा को इस मंदिर की शिल्पकला में जीवंत रूप दिया गया है.
ॐ नमः शिवाय के जयघोष से भक्तिमय हो उठताकरीब पांच सौ वर्षों से श्रद्धा का केंद्र बने इस शिवालय में जलाभिषेक की भी एक अनूठी परंपरा है. लगातार जल चढ़ाने से शिवलिंग का क्षरण न हो, इसलिए सावन के पहले सोमवार सहित विशेष अवसरों पर शिवलिंग को पीतल के पात्र से ढक दिया जाता है. श्रद्धालु उसी पात्र पर जल अर्पित करते हैं, जिससे शिवलिंग सुरक्षित भी रहता है और पूजा की परंपरा भी बनी रहती है.सावन के प्रत्येक सोमवार को यहां तड़के मंगला आरती से लेकर देर रात तक भक्तों का तांता लगा रहता है. दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, बेलपत्र, धतूरा और पुष्प अर्पित कर भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. मंदिर परिसर हर-हर महादेव और ॐ नमः शिवाय के जयघोष से भक्तिमय हो उठता है.
आस्था, इतिहास, पौराणिक मान्यताओं और अद्भुत शिल्पकला का संगम समेटे कोटा का यह प्राचीन शिवालय आज भी श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. सावन के पावन महीने में यहां पहुंचने वाला हर श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ की भक्ति में लीन होकर आध्यात्मिक शांति की अनुभूति का अनुभव करता है.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
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August 16, 2026, 19:49 IST



