ड्रैगन के साथ मतभेदों के बीच दलाई लामा ने दिया बड़ा संदेश, ‘संघर्ष के दौर में भी जिंदा रहेगा तिब्बत का मुद्दा’

रिपोर्ट:- जैस्मिन शर्मा
चीन के साथ तिब्बत का तनाव जगजाहिर है. वहीं धर्मगुरु दलाई लामा इस बारे में अक्सर खुलकर अपनी बात सामने रखते हैं. एक बार फिर तिब्बती धर्मगुरु ने तिब्बत को लेकर बड़ा संदेश दिया है. नेटवर्क18 से खास बातचीत में उन्होंने कहा है कि संघर्ष के दौर में भी तिब्बत का मुद्दा जिंदा रहेगा.
उन्होंने कहा कि देश के धर्म और संस्कृति को बचाना तिब्बत के भविष्य के लिए सबसे अहम है. दुनिया में जारी संघर्ष, बदलते भू-राजनीतिक हालात और भारत-चीन के बीच तनाव के बीच तिब्बत के भविष्य को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. ऐसे समय में तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने तिब्बत के लोगों को उम्मीद की किरण दिखाई है.
जब दलाई लामा से सवाल किया गया कि दुनिया में जारी संघर्ष और बदलते हालात के बीच तिब्बत के लोगों के लिए उन्हें क्या उम्मीद नजर आती है? तो इसके जवाब में उन्होंने कहा कि हालात चाहे जैसे भी हों, तिब्बत का मुद्दा जिंदा रहेगा. यह मुद्दा तिब्बत की गहरी सांस्कृतिक जड़ों, उसकी परंपराओं और धर्म को बचाए रखने से जुड़ा है.
यह संदेश ऐसे समय में आया है, जब तिब्बत की पहचान, धार्मिक स्वतंत्रता और दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर चीन के साथ मतभेद लगातार चर्चा में हैं.
तिब्बत का मुद्दा सिर्फ राजनीति नहीं, पहचान की लड़ाई भी
दलाई लामा के संदेश का सबसे अहम पहलू यह है कि तिब्बत का सवाल सिर्फ राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं है. इसके साथ तिब्बती लोगों की भाषा, संस्कृति, धार्मिक परंपराएं और उनकी अलग पहचान भी जुड़ी हुई हैं.
भारत में निर्वासन में रह रहे दलाई लामा
दलाई लामा 1959 से भारत में निर्वासन में रह रहे हैं. धर्मशाला तिब्बती निर्वासित समुदाय और उसके धार्मिक-राजनीतिक संस्थानों का एक प्रमुख केंद्र है. दशकों से तिब्बती समुदाय अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को बनाए रखने की कोशिश करता रहा है.
दलाई लामा के इस संदेश में उम्मीद का आधार भी यही है कि राजनीतिक हालात चाहे जितने बदलें, तिब्बत की संस्कृति और धर्म को बचाने की कोशिश जारी रह सकती है.
दलाई लामा के उत्तराधिकारी पर चीन से क्यों है टकराव?
तिब्बत के भविष्य से जुड़ा एक बड़ा सवाल दलाई लामा के उत्तराधिकारी का भी है. यह विवाद सिर्फ धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक और कूटनीतिक मायने भी हैं.
जुलाई 2025 में दलाई लामा ने स्पष्ट किया था कि उनके बाद भी दलाई लामा की संस्था जारी रहेगी. उन्होंने कहा था कि उनके अगले अवतार की पहचान करने का अधिकार केवल गदेन फोडरंग ट्रस्ट के पास होगा और इस प्रक्रिया में किसी दूसरे पक्ष को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है.
इसके उलट, चीन का कहना है कि अगले दलाई लामा की पहचान की प्रक्रिया चीनी कानूनों, धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक व्यवस्थाओं के अनुसार होनी चाहिए. बीजिंग का यह भी कहना है कि उत्तराधिकारी को चीन की केंद्र सरकार की मंजूरी मिलनी जरूरी है.
यानी एक तरफ दलाई लामा का संस्थान उत्तराधिकारी चुनने का अधिकार अपने पास रखता है, तो दूसरी तरफ चीन इस प्रक्रिया में अपनी भूमिका को जरूरी बताता है. यही विवाद तिब्बती समुदाय के भविष्य को लेकर सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है.
भारत और चीन के हालिया बयान क्या कहते हैं?
भारत और चीन के बीच तिब्बत से जुड़े मतभेदों की पृष्ठभूमि में सीमा विवाद भी अहम है. दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की कोशिशों के बावजूद क्षेत्रीय दावों को लेकर तनाव बना हुआ है.
भारत का हालिया रुख क्या है
13 अक्टूबर 2026 को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने लद्दाख पर चीन की टिप्पणियों का जवाब देते हुए कहा कि केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है. उन्होंने कहा कि चीन के इनकार से यह स्थापित तथ्य नहीं बदल सकता. यह बयान भारत की ओर से लद्दाख में 28 स्थानों और भौगोलिक विशेषताओं के नाम आधिकारिक भारतीय नक्शे पर दर्ज किए जाने पर चीन की आपत्ति के बाद आया.
चीन का हालिया रुख क्या है?
चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने भारत की ओर से लद्दाख के स्थानों के मानकीकृत नाम जारी करने का विरोध किया. चीन ने कहा कि वह लद्दाख को भारत के केंद्र शासित प्रदेश के रूप में मान्यता नहीं देता और संबंधित क्षेत्रों पर अपने दावे दोहराए. भारत ने इन दावों को खारिज कर दिया.
तिब्बत के भविष्य के लिए क्यों अहम है यह संदेश?
दलाई लामा का यह संदेश ऐसे समय में आया है, जब तिब्बती समुदाय के सामने अपनी धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने और सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने की चुनौती है. उनके उत्तराधिकारी को लेकर चीन और दलाई लामा के संस्थान के बीच मतभेद इस सवाल को और अहम बनाते हैं.
यह संदेश इस बात पर जोर देता है कि तिब्बत का मुद्दा केवल बदलते राजनीतिक समीकरणों से तय नहीं होगा. तिब्बती संस्कृति, धर्म और परंपराओं को बचाए रखने की कोशिश इस मुद्दे को जीवित रखेगी.
दलाई लामा के संदेश का मूल यही है कि दुनिया में संघर्ष और भू-राजनीतिक बदलाव जारी रह सकते हैं, लेकिन तिब्बत की पहचान और उसकी सांस्कृतिक विरासत का सवाल खत्म नहीं होगा.



