हार्ट स्टेंटिंग में इमेज गाइडेड तकनीक से इलाज हुआ ज्यादा सटीक, दोबारा ब्लॉकेज का खतरा कम

Last Updated:September 10, 2026, 22:30 IST
Heart Care Tips : हृदय रोगियों में स्टेंट डालने की प्रक्रिया अब आधुनिक इमेजिंग तकनीकों से अधिक सटीक हो गई है. IVUS और OCT जैसी तकनीकें स्टेंट के सही आकार और प्लेसमेंट में मदद करती हैं, जिससे भविष्य की जटिलताएं कम होती हैं. कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. सौम्यता सोमेंद्र शर्मा ने बताया कि पारंपरिक एंजियोग्राफी की कुछ सीमाएं हैं. सामान्य एंजियोग्राफी में एक्स-रे और कंट्रास्ट डाई के जरिए धमनी में मौजूद ब्लॉकेज को देखा जाता है.इमेज गाइडेड तकनीक से इलाज
जयपुर. हृदय रोगियों में स्टेंट डालने की प्रक्रिया अब सिर्फ बंद धमनी को खोलने तक सीमित नहीं रह गई है. आधुनिक इमेजिंग तकनीकों की मदद से डॉक्टर स्टेंट के सही आकार का चयन करने के साथ उसके पूरी तरह फैलने और धमनी की दीवार से सही तरह जुड़ने की भी जांच कर रहे हैं. इससे एंजियोप्लास्टी की प्रक्रिया को ज्यादा सटीक बनाने और भविष्य में होने वाली जटिलताओं के खतरे को कम करने में मदद मिल रही है.
जयपुर में आयोजित एक चिकित्सा जागरूकता सत्र में बॉम्बे हॉस्पिटल की वरिष्ठ इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. सौम्यता सोमेंद्र शर्मा ने बताया कि पारंपरिक एंजियोग्राफी की कुछ सीमाएं हैं. सामान्य एंजियोग्राफी में एक्स-रे और कंट्रास्ट डाई के जरिए धमनी में मौजूद ब्लॉकेज को देखा जाता है, लेकिन इससे धमनी की अंदरूनी दीवार की वास्तविक स्थिति, प्लाक कितना सख्त या घना है और उसमें कैल्शियम की मात्रा कितनी है, इसका सटीक आकलन हमेशा संभव नहीं होता.
इन तकनीकों की मदद से अंदर तक स्पष्ट तरीके से देख सकते हैं डॉक्टरडॉ. सौम्यता ने बताया कि ऐसे मामलों में इंट्रावैस्कुलर अल्ट्रासाउंड यानी IVUS और ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी यानी OCT जैसी इंट्राकोरोनरी इमेजिंग तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, इन तकनीकों की मदद से डॉक्टर धमनी के अंदर की स्थिति को ज्यादा स्पष्ट तरीके से समझ पाते हैं और उसी आधार पर स्टेंटिंग की योजना तैयार कर सकते हैं.
इस तरह से होती है आसानीजटिल और लंबे ब्लॉकेज के साथ अत्यधिक कैल्सिफाइड धमनियों वाले मरीजों में स्टेंट का सही आकार तय करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है. इमेजिंग तकनीक ऐसे मामलों में उपयुक्त आकार का स्टेंट चुनने में मदद करती है. इसके अलावा स्टेंट डालने से पहले यह भी पता लगाया जा सकता है कि धमनी में मौजूद कैल्शियम या सख्त प्लाक को हटाने अथवा तोड़ने की जरूरत है या नहीं. इससे स्टेंट लगाने से पहले धमनी को बेहतर तरीके से तैयार किया जा सकता है. स्टेंट लगाने के बाद भी इमेजिंग की भूमिका खत्म नहीं होती. प्रक्रिया के बाद यह देखना जरूरी होता है कि स्टेंट पूरी तरह खुला है या नहीं और वह धमनी की दीवार से ठीक तरह चिपका है या नहीं. यदि स्टेंट पूरी तरह नहीं खुलता या धमनी की दीवार से उसका जुड़ाव सही नहीं होता, तो आगे चलकर दोबारा ब्लॉकेज यानी री-स्टेनोसिस या स्टेंट थ्रोम्बोसिस, यानी स्टेंट में खून का थक्का बनने का जोखिम बढ़ सकता है. इमेजिंग तकनीक के जरिए ऐसी कमी का पता प्रक्रिया के दौरान ही लगाया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर उसी समय उसे ठीक किया जा सकता है.
विशेषज्ञों ने क्या बतायाविशेषज्ञों के मुताबिक, देश में कम उम्र के लोगों और डायबिटीज से पीड़ित मरीजों में कोरोनरी आर्टरी डिजीज यानी CAD के मामले बढ़ रहे हैं. ऐसे मरीजों में कई धमनियों में बीमारी और सख्त कैल्सिफाइड ब्लॉकेज की समस्या भी देखने को मिलती है. इन जटिल मामलों में इमेज गाइडेड तकनीक से स्टेंटिंग की सटीकता बढ़ाने में मदद मिल सकती है. चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक इमेजिंग तकनीकों के इस्तेमाल से प्रक्रिया के दौरान होने वाली जटिलताओं को कम करने और मरीज को लंबे समय तक बेहतर परिणाम देने में मदद मिलती है. हृदय रोग के आधुनिक उपचार में अब लक्ष्य केवल तत्काल राहत देना नहीं, बल्कि स्टेंटिंग को अधिक सटीक बनाकर भविष्य में होने वाली समस्याओं के जोखिम को भी कम करना है.
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आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अ…
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Jaipur,Jaipur,Rajasthan
First Published :
September 10, 2026, 22:30 IST



