23 साल की याशिका ने सिकल सेल बीमारी को दी मात, दिल्ली के ये डॉक्टर बने भगवान, अफ्रीका से आए बच्चों का भी किया इलाज

Last Updated:June 19, 2026, 03:15 IST
डॉ. गौरव खार्या ने बताया कि इस बीमारी में कम से कम 100 दिन तक ट्रांसप्लांट के बाद भी मरीज की मॉनिटरिंग की जाती है. 100 दिन बाद माना जाता है कि अब मरीज स्वस्थ है. बोन मैरो ट्रांसप्लांट के बाद सिकल सेल डिसीज दोबारा होने की संभावना कम हो जाती है, क्योंकि इसमें डीएनए बदल देते हैं और मरीज का पूरा इम्यूनिटी सिस्टम ही बदल जाता है. एक नया इम्यूनिटी सिस्टम….
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नई दिल्ली/अंजलि सिंह राजपूत: मध्य प्रदेश के भोपाल की रहने वाली 23 साल की याशिका पाटिल 10 साल की उम्र से सिकल सेल बीमारी से जूझ रही थी जिस वजह से उनका स्कूल बुरी तरह प्रभावित हुआ. शरीर में असहनीय दर्द ने उनके पूरे जीवन को जैसे मानो थाम सा दिया था. बार-बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ रहा था. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या बीमारी है. इसी तरह याशिका 22 साल की हो गई और उनकी मुलाकात हुई डॉक्टर गौरव खार्या से जोकि दिल्ली के अपोलो इंद्रप्रस्थ हॉस्पिटल में पीडियाट्रिक हेमेटोलॉजी, ऑन्कोलॉजी और इम्यूनोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट डॉक्टर हैं और सेंटर फॉर बोन मैरो ट्रांसप्लांट एंड सेल्यूलर थेरेपी के क्लीनिकल लीडर हैं.
डॉक्टर ने याशिका पाटिल को बताया कि उन्हें एक बेहद गंभीर बीमारी है, जिसे सिकल सेल डिजीज कहते हैं. इसमें बोन मैरो ट्रांसप्लांट करना पड़ता है जिसके लिए डोनर की जरूरत पड़ती है. ऐसे में याशिका के माता-पिता ने याशिका के भाई को डोनर के रूप में पेश किया और फिलहाल याशिका का सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट हुआ. अब याशिका पूरी तरह से स्वस्थ हैं और एक फाइटर बनकर उभरी हैं.
216 सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट हुएडॉ. गौरव खार्या ने बताया कि इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल ने लगभग 216 सिकल सेल डिजीज के बोन मैरो ट्रांसप्लांट किए हैं. सभी सफल रहे हैं. यह बीमारी जेनेटिक है और माता-पिता से ही बच्चों में होती है. इस बीमारी में रेड ब्लड सेल की संरचना और काम में जब गड़बड़ी पैदा हो जाती है तब यह बीमारी होती है. इसकी वजह से शरीर में खून की कमी, बार-बार दर्द होना, अंगों का खराब होना, स्ट्रोक और आयु घटना जैसा खतरा बढ़ जाता है. यह बीमारी भारत में मध्य, पश्चिमी और आदिवासी इलाकों में के साथ-साथ मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गुजरात, उड़ीसा और राजस्थान राज्यों में ज्यादा देखने के लिए मिलती है. उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 13% लोग या बच्चे इससे प्रभावित हैं. विदेश की बात करें तो अफ्रीका और उससे जुड़े हुए युगांडा, नाइजीरिया और केन्या जैसे देश बहुत प्रभावित हैं. हाल ही में उन्होंने अफ्रीका से अपोलो इंद्रप्रस्थ आए हुए बच्चों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया है, जिसमें एक 32 साल की महिला भी शामिल है.
ट्रांसप्लांट के बाद दोबारा नहीं होती यह बीमारीडॉ. गौरव खार्या ने बताया कि इस बीमारी में कम से कम 100 दिन तक ट्रांसप्लांट के बाद भी मरीज की मॉनिटरिंग की जाती है. 100 दिन बाद माना जाता है कि अब मरीज स्वस्थ है. बोन मैरो ट्रांसप्लांट के बाद सिकल सेल डिसीज दोबारा होने की संभावना कम हो जाती है, क्योंकि इसमें डीएनए बदल देते हैं और मरीज का पूरा इम्यूनिटी सिस्टम ही बदल जाता है. एक नया इम्यूनिटी सिस्टम शरीर में विकसित हो जाता है. उन्होंने बताया कि बिना डोनर के अभी संभव नहीं है. उन्होंने बताया कि भारत में लगभग सिकल सेल बोन मैरो ट्रांसप्लांट में 15 से 50 लाख रुपए तक का खर्चा आता है. आपको बता दें कि अपोलो इंद्रप्रस्थ अस्पताल ने यह जानकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दी है, जिसमें देश के जाने माने मशहूर डॉक्टर डॉ. बिपिन पुरी भी मौजूद रहे. आपको बता दें कि डॉक्टर डॉ. बिपिन पुरी लखनऊ किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर भी रह चुके हैं.
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